राज्य सूचना आयोग : क्या स्वयं आयोग के भीतर है अधिनियम की सही समझ?

Sarokar

अधिनियम के बन्धन-कारी पालन की दुर्भाग्य-जनक उपेक्षा के लिए क्या केवल विभिन्न सरकारी विभाग ही जिम्मेदार रहे हैं? क्या म० प्र० राज्य सूचना आयोग की अपनी भूमिका इस जिम्मेदारी से कतई मुक्त रही है? सम्भवत:, ऐसी ही किसी सामाजिक पीड़ा के मूल्यांकन के बाद इस पुरातन उक्ति ने जन्म लिया था कि ‘पर उपदेश, कुशल बहुतेरे!’

इसी ७ जुलाई को मध्य प्रदेश राज्य सूचना आयोग द्वारा द्वितीय अपील में पारित हुए एक आदेश की खबर छपी थी। लब्बो-लुबाब यह था कि एक सूचना आयुक्त ने अपीलकर्ता के पक्ष में जो आदेश पारित किया उसमें उन्होंने यह तल्ख टिप्पणी भी की कि नागरिक आपूर्ति निगम के लोक सूचना अधिकारी के साथ ही उसके अपीली अधिकारी को भी सूचना का अधिकार अधिनियम की जानकारी नहीं है। इसी आदेश में आयुक्त महोदय ने निगम के एमडी को यह निर्देश भी दिया कि वे अधिकारियों का प्रशिक्षण करायें।

इस खबर को पढ़ कर मुझे आयोग से यह एक पलट-सवाल करने की सूझी थी कि क्या आयोग के अपने ही अधिकारियों में अधिनियम की ठीक-ठीक समझ है? मेरे मन में यह उलट-सवाल इसलिए उठा था क्योंकि मुझे, और आयोग की अन्तर्कथा से अच्छी तरह परिचित रहने वाले मुझ जैसे अन्य व्यक्तियों को भी, इसके बारे में पर्याप्त आशंका रही आयी है।

किन्तु जब अपना यह पलट-सवाल मैंने १३ जुलाई को सोशल मीडिया पर उठाया तब मुझसे और मेरे सामाजिक लेखन से परिचित मीडिया के मेरे मित्रों ने दूर-भाषीय चर्चा में मेरी आशंका को सिरे से नकार दिया। इन विद्वान मित्रों का मानना था कि अधिनियम के नियमों के पालन को सुनिश्चित करने की वैधानिक जिम्मेदारी के साथ संवैधानिक रूप से गठित हुए म० प्र० राज्य सूचना आयोग को लेकर ऐसी आशंका पालनी ही नहीं चाहिए। मेरे यह पूछने पर कि वे इतने आश्वस्त कैसे हुए हैं, मेरे यह मित्र कोई प्रामाणिक कारण नहीं दे पाये। बस, यही कहते मिले कि उन्हें ‘भरोसा’ है! और इसलिए, इनके बारे में मैं केवल इतना ही कहना चाहूँगा कि वे अत्यन्त भोले हैं। इतने भोले कि मेरी आशंका के आधारों का मूल्यांकन करने के अपने बन्धन-कारी नैतिक दायित्व का भी निर्वाह करने की आवश्यकता नहीं समझ पाये।

पलट-सवाल की मेरी गुत्थी को समझने और सुलझाने के लिए सबसे पहले यह जान लेना आवश्यक है कि अधिनियम ने अपने तहत्‌ राज्य सूचना आयोग में आयुक्तों की नियुक्ति के लिए ‘पात्रता’ के क्या आधार निर्धारित किये हैं? अधिनियम के अनुसार, राज्य मुख्य सूचना आयुक्त तथा राज्य सूचना आयुक्त विधि, विज्ञान और प्रौद्योगिकी, समाज-सेवा, प्रबन्ध, पत्रकारिता, जन-सम्पर्क माध्यम या प्रशासन और शासन में व्यापक ज्ञान और अनुभव वाले समाज में प्रख्यात व्यक्ति होंगे। सरल शब्दों में इसका तात्पर्य यह है कि अधिनियम अपने आयुक्तों से विधि-विधान की क्लिष्टताओं की विशेषज्ञता नहीं बल्कि औसत व्यवहारिक समझ तथा न्याय-पूर्ण चरित्र की ही अपेक्षा रखता है। अधिनियम के केवल इसी आधार-भूत प्रावधान से स्पष्ट हो जाता है कि आयुक्त की तरह नियुक्त हो जाने मात्र से किसी के नियम-कानून अथवा विधान-संविधान के ‘विशेषज्ञ’ अथवा ‘श्रेष्ठ समीक्षक’ होने का दावा नहीं किया जा सकता है।

अधिनियम के ध्येय तथा उसकी प्रकृति को देखते हुए, उसके इस प्रावधान में कोई गम्भीर दोष भी नहीं है। वह इसलिए कि, आयोग में पीठासीन हो कर बैठने वाले आयुक्त को अपने समक्ष प्रस्तुत हुए द्वितीय अपीली प्रकरण में ऐसी कोई गहरी वैधानिक समीक्षा नहीं करनी होती है जो उसके लिए विधि, विधान अथवा संविधान की ‘विशेषज्ञ’ और/अथवा ‘श्रेष्ठ समीक्षक’ जैसी महारत को आवश्यक बनाये। इसके उलट, उसे तो अधिनियम के सीमित दायरे में रहते हुए उसके प्रावधानों की किसी स्व-विवेकी समीक्षा से कतई मुक्त ‘सपाटता’ की समझ ग्रहण करने का प्रशिक्षण लेने की आवश्यकता रहेगी ताकि वह उसके सम्मुख प्रस्तुत हुए तथ्यों को झुठलाने के किसी भी जाल-साजी भरे प्रयास को ‘पकड़’ सके। दरअसल, यही अधिनियम की विशिष्टता है। उसकी यथार्थ ताकत भी।

अधिनियम की यही विशिष्टता जरूरत-मन्द को उसके लिए आवश्यक हो गयी सूचना को, बिना किसी कानूनी पेंचीदगियों के तथा पर्याप्त त्वरित गति से भी, सुलभ कराती है; किसी भी कानूनी दाँव-पेंच के बिना। और, न्याय-पीठ के सम्मुख उपस्थित हो कर दूसरों की पैरवी करने का अधिकार पा चुके किसी कानूनी विशेषज्ञ अथवा सलाह-कार के बिना भी। क्योंकि, अपीली प्रकरण में अधिनियम के अन्तर्गत्‌ वांछित सूचना को बाधित रखने दोष के लिए नामित किया गया कोई जिम्मेदार अधिनियमित कर्मचारी पीठासीन आयुक्त के समक्ष ऐसा कोई कथन करता है जिनकी अधिनियम-सम्बन्धी ग्राह्यता की कानूनी बारीकियों को ले कर किसी तार्किक समीक्षा की आवश्यकता पड़े तो, प्रथम-दृष्ट्या, यह पीठासीन आयुक्त का ही अपना अधिनियमित दायित्व है कि वह उनके औचित्य को तौले व परखे। यही नहीं, भूले-भटके यदि कोई ऐसी स्थिति निर्मित होती है जिसमें पीठासीन आयुक्त को अधिनियम में लिखित रूप से किये गये प्रावधानों से इतर विधि, विधान अथवा संविधान की किसी तकनीकी बारीकी की समझ की कोई विशेष आवश्यकता उपस्थित भी हो जाये तो इस बारे में आयुक्तों की सहायता के लिए आयोग में ‘विधि अधिकारी’ अलग से नियुक्त है। और हाँ, मुख्य सूचना आयुक्त भी जिसके लिए परम्परा बन गयी है कि इस पद पर न्यायिक सेवा में रहे किसी व्यक्ति को ही नियुक्त किया जाये।

वैसे, राज्य सूचना आयोग की विधि और विधान की ऐसी ही ‘समझ-दारी’ पर, अपना यह ताजा उलट-सवाल उठाने से पहले भी मैं, इसी जगह हाल ही में दो बार और भी, बिल्कुल सीधे प्रश्न खड़े कर चुका हूँ। पहली बार एक संक्षिप्त टिप्पणी ‘यह कैसी लोक अदालत’ (२ जुलाई २०१५) के माध्यम से और दूसरी बार एक विस्तृत आलेख ‘राज्य सूचना आयोग : लोक अदालत के नाम पर अधिनियम से ही जाल-साजी’ (८ जुलाई २०१५) में। इन दोनों की विषय-वस्तु एक ही रही — क्या सूचना-प्रदाय को नकारने के मामलों के अपने यहाँ लम्बित अपीली प्रकरणों को लोक-अदालत लगा कर सुलह-सफाई करवाने जैसा कोई प्रत्यक्ष-परोक्ष अधिकार सूचना का अधिकार अधिनियम के अन्तर्गत्‌ गठित हुए किसी भी सूचना आयोग को उपलब्ध है? वैसे तो, इसका दो-टूक जवाब ‘नहीं’ में है किन्तु म० प्र० का राज्य सूचना आयोग यह विधि-दूषित भ्रम पाले हुए है कि उसको ऐसी लोक-अदालत लगाने का लायसेंस मिला हुआ है। और तो और, यह आयोग तो यह भी मानता है ऐसा अधिकार उसे उस स्थिति में भी प्राप्त है जब अपीलकर्ता लोक अदालत में आने को न तो सहमत हुआ हो और ना ही उत्सुक। उसकी यह भ्रमित मति अपने आप में इस दुर्भाग्य-जनक सचाई का प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं तो और क्या है कि आयोग के अपने भीतर ही अधिनियम के नियमों तथा प्रावधानों की समझ का टोटा असीमित रूप से पसरा हुआ है?

Cover page-1_No Commentsइससे पहले भी मैंने म० प्र० राज्य सूचना आयोग में अधिनियम की खुले आम धज्जियाँ उड़ाये जाने पर एक विस्तृत रपट तैयार की थी। प्रकरण-दर-प्रकरण, विशुद्ध दस्तावेजी तथ्यों के आधार पर, लिखी उक्त रिपोर्ट को गैर सरकारी सामाजिक संगठन सजग ने पुस्तकाकार रूप में छापा था। ‘नो कमेण्ट्स’ के नाम से २००९ में प्रकाशित हुई उस पुस्तक के एक भी तथ्य को, आज तक, न तो आयोग ने और ना ही उसके ऐसे आयुक्तों में से एक ने भी कभी चुनौती दी जिनके नामों के बिल्कुल स्पष्ट उल्लेख के साथ उनकी अधिनियम की ‘समझ’ को या तो चुनौती दी गयी थी या फिर उन पर गम्भीर आरोप लगाये गये थे।

Cover page-4_No Commentsऔर, आयोग को लेकर मेरा यह मूल्यांकन किसी भी पूर्वाग्रह से प्रेरित या प्रभावित नहीं अपितु नि:सन्देह रूप से तथ्य-परक है। दरअसल, यह तो अधिनियम की उस विशुद्ध वैधानिक समझ का निचोड़ है जो बतलाती है कि सूचना आयोगों का गठन, केवल और केवल, इन दो बिल्कुल स्पष्ट पारिस्थितिक मूल्यांकनों और उन्हीं के आधार पर किये गये दो-टूक निर्णायक ‘न्यायिक’ निराकरणों के लिए ही हुआ है कि विधि-अनुकूल रूप से माँगी कोई सूचना आवेदक को अधिनियम-निर्देशित समय-सीमा में प्रदान की गयी है या नहीं? इस दो-टूक निराकरण के अलावा, बीच का कोई रास्ता तलाशती, या कहें कि ‘बिचौलिये’ की भूमिका निभाने वाली, सूचना आयोग की कोई लोक-अदालत अधिनियम के आधार-भूत प्रावधानों की अन-देखी तो करती ही करती है, उसकी आत्मा को भी रसातल में गाड़ती है।

इ-पेपर - Bhopal, Tuesday 07-July-2015दुर्भाग्य से, आयोग से नियमित सुनवाई के बाद आ रहे फैसलों की ताजी खबरें भी इसी आशंकित मूल्यांकन की पुष्टि करती दिख जाती हैं। उदाहरण के लिए, प्रकारान्तर से ही सही, भोपाल से प्रकाशित होने वाले एक हिन्दी दैनिक में छपे राज्य सूचना आयोग से आये इस ताजे फैसले ने भी, अन-जाने में ही, यही सवाल अलाप दिया है कि क्या कहीं स्वयं आयोग के भीतर भी तो अधिनियम के नियमों की जानकारी का अभाव तो नहीं है?

यों, अधिनियम के बारे में अपनी समझ को ले कर मैं पूरी तरह से आश्वस्त हूँ। और, अपनी इसी आश्वस्ति के आधार पर बरसों से आयोग में अपने मामलों की अपीली बहसें स्वयं ही करता आया हूँ। यही नहीं, मैंने यह भी पाया है कि मेरी दलीलों के आगे पीठसीन आयुक्त किंकर्तव्य-विमूढ़ हो निरुत्तर भी हुए हैं। ऐसे प्रत्येक अवसर पर मुझे यह भी समझ आया है कि उनकी यह किंकर्तव्य-विमूढ़ता अधिनियम और उसके पालन के आयोग के बन्धन-कारी दायित्व से इतर, उन्हें ही ज्ञात, अन्य कारणों से प्रकट हुई है।

आगे और भी बहुत कुछ हुआ है किन्तु उस सब के उल्लेख के स्थान पर यहाँ मैं केवल इतना कहना चाहता हूँ कि किसी से भी मिले, मुझमें यह पाठ ग्रहण कर लेने के प्रति किंचित्‌ भी दुराग्रह नहीं है कि मैंने अधिनियम, उसके ध्येय और उसके प्रावधानों को समझने में कोई कसर छोड़ रखी है। किन्तु, पूरी विनम्रता के साथ मेरा यह आग्रह भी प्रबल है कि अपने ‘ज्ञान’ से मुझे ज्ञानी बनाने की ललक पालने वाले, अधिनियम से जुड़े मेरे निहायत ‘अज्ञान’ को दूर करने के अपने पाठ मुझको पढ़ाने से पहले, अपने उस पाठ को अधिनियम की वैधानिक बारीकियों की तराजू तथा सर्वथा अकाट्य तथ्यों की कसौटी पर कस कर स्वयं ही निश्चिन्त हो लें।

चलिये, मोटे-मोटे आधारों पर अपनी ताजी बात को बिन्दु-वार रखने का प्रयास करता हूँ —

नागरिक आपूर्ति निगम से जुड़ी उस खबर का मीडिया को लुभाने वाला तत्व यह था कि अपने दिये फैसले में पीठासीन आयुक्त महोदय ने यह तल्ख टिप्पणी भी की कि नागरिक आपूर्ति निगम के लोक सूचना अधिकारी के साथ ही उसके अपीली अधिकारी तक को भी सूचना का अधिकार अधिनियम की जानकारी नहीं है। और इसी आधार, उन्होंने निगम के एमडी को यह निर्देश भी दिया कि वे अधिकारियों का प्रशिक्षण करायें। फैसले के इस बिन्दु को यहाँ उठाते समय, मैं पीठासीन आयुक्त के इस निष्कर्ष पर कोई प्रत्यक्ष-परोक्ष सवाल खड़े करने की मंशा नहीं रखता हूँ कि अपीलीय निराकरण के समय अपीली पीठ के सामने जवाब-देही के लिए रेखांकित हुए निगम के अधिकारी गण अधिनियम की ठीक-ठीक समझ रखते थे या नहीं? यह इसलिए कि अधिकांश प्रकरणों में यही यथार्थ होता है।

किन्तु, मैं इससे आगे का एक अधिक गहरा यह सवाल अवश्य उठाना चाहता हूँ कि २००५ में अधिनियम के लागू हो जाने के बाद से २०१५ के उक्त फैसले के आने के दिन तक, १० सालों की एक पर्याप्त लम्बी अवधि के बीत जाने के बाद भी, अधिनियम के बन्धन-कारी पालन की ऐसी दुर्भाग्य-जनक उपेक्षा के लिए क्या केवल विभिन्न सरकारी विभाग ही जिम्मेदार रहे हैं? क्या लोक सूचना अधिकारियों और प्रथम अपीली अधिकारियों के इस दोष के पल्लवित, पुष्पित तथा फलीभूत होने की इस दुर्दशा के पीछे आयोग की अपनी कोई जिम्मेदारी कतई नहीं रही है?

इसी सन्दर्भ में, मेरा एक दूसरा सवाल और है — अपने अपीली फैसलों के माध्यम से ऐसे तमाम गैर-जिम्मेदार, बल्कि अधिनियम के वैधानिक अपराधी, विभागों और उनके अधिकारियों को स्वयं ही प्रशिक्षित होने को बाध्य करने के स्थान पर क्या आयोग को केवल इससे ही ईमान-दार सन्तुष्टि मिल जाती है कि उसने सरकारी विभागों के प्रमुखों को ‘अपने अधिकारियों को प्रशिक्षित करने’ के कोरे कागजी निर्देश दे दिये हैं?

सम्भवत:, ऐसी ही परिस्थितियों से उपजी सामाजिक पीड़ा के मूल्यांकन के बाद हिन्दी की इस पुरातन उक्ति ने जन्म लिया था कि ‘पर उपदेश, कुशल बहुतेरे!’ यद्यपि, समीक्षा केवल इतने संक्षेप में पूरी नहीं होती है। फैसले से जुड़ी खबर के कुछ और भी गम्भीर पक्ष हैं —

जैसे, अखबार में छपी खबर का लगभग उपेक्षित छोड़ दिया गया, किन्तु यथार्थ में सबसे महत्व रखने वाला पक्ष यह है कि इसी मामले में २८ अगस्त २००९ में अपनी द्वितीय अपीली सुनवाई के बाद आयोग के पीठासीन आयुक्त ने निगम के लोक सूचना अधिकारी को आदेश दिया था कि वह आवेदक को समस्त वांछित सूचना ४५ दिनों की अवधि में नि:शुल्क उपलब्ध करा दे। लेकिन, उक्त आदेश की खुली अवहेलना करते हुए आवेदक को वांछित सूचना नहीं दी गयी थी।

उल्लेखनीय है कि मामले में नाम-जद तत्कालीन लोक सूचना अधिकारी का नाम के० एल० पडोले बताया गया है किन्तु, २००९ की सुनवाई के बाद आयोग द्वारा परित हुए आदेश में उक्त अधिकारी के विरुद्ध निजी रूप से किसी आर्थिक और/अथवा प्रशासनिक शास्ति का उल्लेख होने के संकेत अखबार में प्रकाशित खबर में नहीं हैं। लग तो यह भी रहा है कि, उसके द्वारा पक्ष-पात पूर्ण अपीली निर्णय देने के अधिनियम-विपरीत व्यवहार के लिए, सम्बन्धित प्रथम अपीली अधिकारी को तो छुआ भी नहीं गया था। यही नहीं, प्रबल सम्भावना है कि सूचना-प्रदाय के आवेदन की प्रस्तुति के लगभग ढाई-तीन साल के बाद पारित हुए उक्त द्वितीय अपीली आदेश में इतनी लम्बी अवधि तक सूचना से वंचित रखने के अधिनियम के सबसे गम्भीर अपराध के लिए भी निगम के अधिकारियों को पूरी माफ़ी दे दी गयी थी! वह भी तब, जब अधिनियम के प्रावधानों में अपीली सुनवाई पीठ के पास ऐसा कोई अधिकार उपलब्ध ही नहीं है जिसकी आड़ ले कर वह अधिनियम के प्रमाणित दोषी को उसके लिए निर्धारित होने वाले आर्थिक अथवा प्रशासनिक दण्ड से पूरी माफ़ी देना तो दूर रहा, लेश-मात्र छूट तक दे सके।

इसी का परिणाम था कि निगम के लोक सूचना अधिकारियों से लगा कर समस्त जिम्मेदार उच्चस्थ अधिकारियों तक में यह दुस्साहस फलीभूत हुआ कि उन्होंने आयोग के अपीली आदेश का पालन करने से मुँह फेरे रखा और आवेदक को वांछित सूचना नहीं दी।

यही नहीं, आयोग के आदेश की अवहेलना की सूचना के साथ इसी मामले में जब अपीलार्थी ने दो-बारा आयोग का दरवाजा खट-खटाया और परिणाम में २८ मार्च २०१५ को सुनवाई निर्धारित होने के बाद आदेश पारित हुआ तब भी उसमें आयोग से, कम से कम निम्न, ऐसी चूकें हुई हैं जिनसे परिचित होने के बाद यह दुर्भाग्य-जनक आशंका जन्मती है कि आयोग के अपने भीतर ही अधिनियम के प्रावधानों का आभाव पसरा हुआ है —

खबर की विषय-वस्तु को अधिनियम की समुचित समझ के साथ पढ़ने पर समझा जा सकता है कि दूसरे दौर की अपीली/शिकायती सुनवाई में आयोग ने अपीलकर्ता द्वारा उसे दी गयी इस महत्व-पूर्ण सूचना को सम्भवत: सिरे से अन-देखा तथा अन-सुना कर दिया कि २००९ में आयोग द्वारा सूचना देने का आदेश परित कर दिये जाने के बाद भी उसे ‘अभिलेख का अवलोकन करने’ कार्यालय बुलाया गया था! यही नहीं, दूसरे दौर की सुनवाई के बाद आयोग ने जिम्मेदार अधिकारी पर जो आर्थिक शास्ति लगायी है वह केवल १२,५००/- ही है! जबकि अधिनियम के जानकारों के लिए यह समझ पाना एक असाध्य पहेली है कि, प्रकरण के तथ्यों तथा परिस्थितियों को देखते हुए, इसका २५,०००/- से एक रु० भी कम किया जाना अधिनियम के साथ छल करने जैसा अत्यन्त गम्भीर अपराध है

अधिनियम की समझ के इस पेंच के उलझाव को समझने के लिए उसकी धारा २० की उपधारा (१) के प्रावधान को, उसकी किसी भी सन्देह से परे की गयी समीक्षा के प्रकाश में, देखना होगा। अधिनियम की यह धारा कहती है कि सूचना-प्रदाय का दोषी ठहरा दिये गये लोक सूचना अधिकारी पर, उसके द्वारा सूचना प्रदान करने में की गयी देर के प्रत्येक दिन के लिए, २५०/- रु० की आर्थिक शास्ति लगायी जायेगी। इसके साथ ही इसी धारा में यह प्रावधान भी है कि कुल शस्ति की अधिकतम्‌ सीमा पच्चीस हजार रुपये होगी। स्पष्ट है, अधिकतम्‌ सीमा का यह प्रावधान केवल इस स्पष्टता के लिए ही है कि प्रत्येक दिन के लिए २५०/- रु० की गणना के आधार पर शास्ति-राशि के पच्चीस हजार से अधिक हो जाने पर आर्थिक शस्ति को उसकी अधिकतम्‌ सीमा २५,०००/- के पार जाने से रोक लिया जाये। अर्थात्‌, शास्ति राशि अधिरोपित करते समय ‘अधिकतम्‌’ आर्थिक दण्ड का यह विशेष प्रावधान ‘पच्चीस हजार तक’ वाले भारतीय दण्ड विधान के उस भाव में बिल्कुल नहीं है जिसमें आयोग, अपने विवेक-जनित विशेषाधिकार का प्रयोग करते हुए, दिनों की गणना और दैनिक शास्ति के विशुद्ध गणित से निकली राशि के २५,०००/- के अंक को पार कर लेने के बाद भी, सर्वथा स्वच्छन्द रूप से मन-माने किसी निचले स्तर पर निर्धारित करने की छूट ले सके।

यही नहीं, जो खबर छपी है उसमें यदि आयोग द्वारा परित आदेश के सभी महत्व-पूर्ण बिन्दुओं को समाहित किया गया है तो किसी भी संशय से परे यहाँ यह और जोड़ा जा सकता है कि आयोग के भीतर अधिनियम के प्रावधानों को समझने की दिशा में एक और गम्भीर कमी परिलक्षित हुई है। दरअसल, अधिनियम की धारा २० की उपधारा (२) के अनुसार जब आयोग आश्वस्त हो जाये कि किसी लोक सूचना अधिकारी ने माँगी गयी सूचना को जान-बूझ कर दबाये रखा था तो वह उस अधिकारी के विरुद्ध लागू सेवा-नियमों के अधीन अनुशासनिक कार्यवाही के लिए अनुशंसा करेगा। और, फैसले के बारे में जो खबर छपी है उससे स्पष्ट है कि फैसला देते समय आयोग के सामने, किसी भी संशय से परे, यह तथ्य स्थापित हो चुका था कि सम्बन्धित अधिकारी ने जान-बूझ कर अधिनियम के प्रावधानों की अवहेलना की थी। फिर भी, आयोग द्वारा अधिनियम की धारा २० की उपधारा (२) के पालन में ऐसी किसी अनुशंसा के किये जाने का कोई उल्लेख खबर में नहीं था!

तो क्या, अधिनियम की ठीक-ठीक समझ रखने वालों के मन में यह यक्ष-प्रश्न उठना अनुचित है कि कहीं स्वयं आयोग के ही भीतर अधिनियम की ‘ठीक’ समझ का अभाव तो नहीं है?

(०१ अगस्त २०१५)