राज्य सूचना आयोग के मुख्य आयुक्त के नाम खुला पत्र

Sarokar

आयोग के गठन की निरर्थकता और दुर्दशा की द्विविधा का यथार्थ-परक निवारण करने के लिए यह खुला पत्र लिखने विवश हुआ हूँ ताकि, आयोग के मुखिया को यह सूचित हो कि उसके अपने ही कार्यालय में आयोग के साथ ही अधिनियम की भी सच्ची उपयोगिता को प्रमाणित करने की घड़ी एक बार फिर से आ खड़ी हुई है।

महोदय,

बीते दिनों भोपाल से प्रकाशित होने वाले एक राष्ट्रीय हिन्दी दैनिक में आपके हवाले से एक रपट-नुमा समाचार प्रकाशित हुआ था। समाचार को पढ़ने से आम नागरिक को यह दु:खद्‌ आभास हुआ है कि आयोग अपने द्वारा परित किये गये दण्डात्मक शैली के आदेशों की मर्यादा की रक्षा करने की स्थिति में बिल्कुल भी नहीं है। वैसे, किसी संवैधानिक संस्था के आदेश के पालन की उपेक्षा होना हमारे देश के लिए कोई अन-होनी बात नहीं है। और, इस उपेक्ष से पीड़ित हुए व्यक्ति में इच्छा-शक्ति के दृढ़ होने पर ऐसी अवज्ञा करने वाले को आदेश-पालन के लिए विवश भी किया जाता है। लेकिन, स्वयं आपके हवाले से प्रकाशित हुई उक्त खबर से निकला, आयोग के विशुद्ध रूप से नपुंसक से होने का, प्रत्यक्ष-परोक्ष भाव कुछ अधिक ही गम्भीर तथा अन-होना है क्योंकि, इससे यही झलकता दिखता है कि स्वयं नियामक संस्था में ही अपने आदेश के पालन के प्रति इच्छा-शक्ति का निरा अभाव है।

RTI-SCI_DB Star_Epaper_26 July 2015_Page-1स्वयं उसके मुखिया के हवाले से ‘आयोग के नपुंसक होने’ के इस संकेत ने आम जन के मन में गम्भीर चिन्ता तो पैदा की ही है, विधि-विधान के जानकारों को आयोग के गठन के औचित्य पर गम्भीर चिन्तन को भी बाध्य किया है। चिन्ता और चिन्तन, दोनों का ही, इकलौता कारण यह है कि ऐसा लग रहा है कि आपके नेतृत्व की छाँव में पूरे के पूरे म० प्र० राज्य सूचना आयोग ने सूचना का अधिकार अधिनियम, २००५ के अन्तर्गत्‌ बन्धन-कारी बनाये गये सूचना-प्रदाय के अधिकार को, प्रत्येक स्थिति में, सुनिश्चित करने के अपने दायित्व से साफ़-साफ़ पल्ला झाड़ रखा है। इस खबर में आपको जो कुछ भी कहते हुए उद्धृत किया गया है उसका निचोड़ यह है कि आयोग द्वारा पारित किये गये आदेशों के सहज पालन, और उनका पालन नहीं किये जाने पर आवश्यक वैधानिक कार्यवाही करने की भी, समस्त अधिनियमित जिम्मेदारी सम्बन्धित विभागों/कार्यालयों की ही है। इसके प्रति आयोग की अपनी बिल्कुल भी जिम्मेदारी नहीं है!

आपके द्वारा कही/बतलायी गयी उक्त टिप्पणी को मैं जितना समझ पाया हूँ उसका सीधा सा तात्पर्य यही है कि संवैधानिक प्रतिष्ठा से सुसज्जित कर, और सम्भवत: करोड़ों के बजट के उपभोग करने के अधिकारों के साथ, गठित किये गये म० प्र० राज्य सूचना आयोग का दायित्व केवल और केवल इतना ही है कि वह द्वितीय अपीली सुनवाइयाँ कर उनमें अपना आदेश परित कर दे! दूसरे शब्दों में, आपके नेतृत्व में आयोग के ‘अधिकारों’ के साथ ही उसके बजट की मलाई चट कर रही अधिकारियों की पूरी जमात यह मान कर चल रही है कि एक बार आदेश परित करने के बाद आयोग उस आदेश का प्रत्येक स्थिति में पालन होते देखने के दायित्व की, अधिनियम-विहित, अपनी सबसे महत्व-पूर्ण जिम्मेदारी से सर्वथा मुक्त हो जाता है! यह अलग बात है कि विधि-विधान के जानकार इसे अधिनियम और आयोग की बेहद भौंडी समीक्षा से हट कर और कुछ मानने को बिल्कुल भी तैयार नहीं हैं। उनका बेहद सीधा आरोप यह है कि ऐसी स्थिति में अधिनियम के परित किये जाने के साथ ही साथ उसके तहत्‌ सूचना आयोग का गठन किया जाना भी एकदम निरर्थक हो जाता है।

यहीं एक बात और। जहाँ तक मैं भोपाल से प्रकाशित होने वाले अखबारों को पढ़ पाया हूँ, आपकी ओर से उक्त खबर का कोई प्रत्यक्ष-परोक्ष खण्डन नहीं किया गया है।

अधिनियम और/अथवा आयोग की दुर्दशा की ऐसी किसी भी द्विविधा और/अथवा भ्रम की स्थिति के यथार्थ-परक निवारण करने के लिए मैंने आपके अपने ही आयोग के कार्यालय के लोक सूचना अधिकारी के सामने अधिनियम के प्रावधान के अन्तर्गत्‌ सूचना-प्रदाय का एक आवेदन लगाया है। दिनांक ३ अगस्त २०१५ को लगाये अपने इस आवेदन में मैंने निम्न सूचनाएँ उपलब्ध कराने का निवेदन किया है —

१.   आयोग के समक्ष आज दिनांक तक विचारार्थ प्रस्तुत किये गये द्वितीय अपीली आवेदनों की कुल संख्या;

२.   आयोग द्वारा आज दिनांक तक अन्तिम रूप से निराकृत कर दिये गये अपीली आवेदनों की कुल संख्या;

३.   आयोग द्वारा निराकृत किये गये उक्त समस्त आवेदनों में से जिन प्रकरणों में अधिनियम-दोषियों पर आर्थिक शास्तियाँ अधिरोपित की गयी हैं उनकी कुल संख्या;

४.   आयोग द्वारा निराकृत किये गये उक्त समस्त आवेदनों में से जिन प्रकरणों में अधिनियम-दोषी प्रत्यर्थियों की सेवा-पुस्तिका में विपरीत टिप्पणियाँ दर्ज करने के आदेश परित किये गये हैं उनकी कुल संख्या;

५.   आयोग द्वारा निराकृत किये गये उक्त समस्त आवेदनों में से जिन प्रकरणों में अधिनियम-दोषी प्रत्यर्थियों पर अनुशासनात्मक कार्यवाही करने के आदेश परित किये गये हैं उनकी कुल संख्या;

६.   आयोग द्वारा निराकृत किये गये उक्त समस्त आवेदनों में से जिन प्रकरणों में अधिनियम-दोषी प्रत्यर्थियों के विरुद्ध आवेदकों को हर्जा-खर्चा भी चुकाने के आदेश परित किये गये हैं उनकी कुल संख्या;

७.   आयोग द्वारा निराकृत किये गये उक्त समस्त आवेदनों में से जिन प्रकरणों में अधिनियम-दोषी प्रत्यर्थियों के विरुद्ध उनकी सेवा-पुस्तिका में विपरीत टिप्पणियाँ दर्ज करने के आदेश पारित किये गये हैं तथा जिनमें यह सुनिश्चित करने के लिए कि आयोग के आदेश का यथार्थ में पालन भी क्या गया है, आयोग द्वारा जमीनी स्तर पर वास्तव में वैधानिक कार्यवाहियाँ भी की गयी हैं; उन समस्त प्रकरणों में आयोग द्वारा की गयी बतायी जाने वाली ऐसी समस्त वैधानिक कार्यवाहियों के यथार्थ में भी किये जाने को प्रमाणित करने के लिए आयोग के पास उपलब्ध अभिलेखों की अधिनियम-सम्मत तरीके से तथा आवश्यकता पड़ने पर न्यायालयों में भी स्वीकार्य प्रमाणित/सत्यापित की गयी छाया-प्रतिलिपियाँ;

८.   आयोग द्वारा निराकृत किये गये उक्त समस्त आवेदनों में से जिन प्रकरणों में अधिनियम-दोषी प्रत्यर्थियों के विरुद्ध उनकी सेवा-पुस्तिका में विपरीत टिप्पणियाँ दर्ज करने के आदेश पारित किये गये तथा उनमें से कुल जितने प्रकरणों में आयोग के आदेश के पालन की अन-देखी/अवहेलना/अवज्ञा की गयी उन समस्त प्रकरणों में आयोग के आदेश की अवहेलना के लिए दोषी सम्बन्धित जिम्मेदार विभाग/कार्यालय/अधिकारी के विरुद्ध यदि आयोग द्वारा जमीनी स्तर पर कोई वैधानिक कार्यवाहियाँ की गयी हैं तो आयोग की इन समस्त कार्यवाहियों को प्रमाणित करने के लिए आयोग के पास उपलब्ध अभिलेखों की अधिनियम-सम्मत तरीके से तथा आवश्यकता पड़ने पर न्यायालयों में भी स्वीकार्य प्रमाणित/सत्यापित की गयी छाया-प्रतिलिपियाँ;

९.   आयोग द्वारा निराकृत किये गये उक्त समस्त आवेदनों में से जिन प्रकरणों में अधिनियम-दोषी प्रत्यर्थियों के विरुद्ध आर्थिक जुर्माना भरने और/अथवा सम्बन्धित आवेदक को क्षति-पूर्ति देने के आदेश पारित किये गये हैं तथा जिनमें यह सुनिश्चित करने के लिए कि आयोग के आदेश का यथार्थ में पालन भी क्या गया है, आयोग द्वारा जमीनी स्तर पर वास्तव में वैधानिक कार्यवाहियाँ भी की गयी हैं; उन समस्त प्रकरणों में आयोग द्वारा की गयी बतायी जाने वाली ऐसी समस्त वैधानिक कार्यवाहियों के यथार्थ में भी किये जाने को प्रमाणित करने के लिए आयोग के पास उपलब्ध अभिलेखों की अधिनियम-सम्मत तरीके से तथा आवश्यकता पड़ने पर न्यायालयों में भी स्वीकार्य प्रमाणित/सत्यापित की गयी छाया-प्रतिलिपियाँ;

१०.  आयोग द्वारा निराकृत किये गये उक्त समस्त आवेदनों में से जिन प्रकरणों में अधिनियम-दोषी प्रत्यर्थियों के विरुद्ध आर्थिक जुर्माना भरने और/अथवा सम्बन्धित आवेदक को क्षति-पूर्ति देने के आदेश पारित किये गये उनमें से कुल जितने प्रकरणों में आयोग के आदेश के पालन की अन-देखी/अवहेलना/अवज्ञा की गयी उन समस्त प्रकरणों में आयोग के आदेश की अवहेलना के लिए सम्बन्धित जिम्मेदार व्यक्तियों के विरुद्ध यदि आयोग द्वारा जमीनी स्तर पर कोई वैधानिक कार्यवाहियाँ की गयी हैं तो आयोग की इन समस्त कार्यवाहियों को प्रमाणित करने के लिए आयोग के पास उपलब्ध अभिलेखों की अधिनियम-सम्मत तरीके से तथा आवश्यकता पड़ने पर न्यायालयों में भी स्वीकार्य प्रमाणित/सत्यापित की गयी छाया-प्रतिलिपियाँ;

११.  प्रस्तुत आवेदन में विशेष रूप से रेखांकित किये गये समाचार को पढ़ने से आम नागरिक को, मुख्य सूचना आयुक्त के हवाले से, यह आभास होता है कि आयोग द्वारा परित किये गये उपरोक्त शैली के आदेशों के सहज पालन, और उनका पालन नहीं किये जाने पर आवश्यक वैधानिक कार्यवाही करने की भी, समस्त अधिनियमित जिम्मेदारी सम्बन्धित विभागों/कार्यालयों की ही है। मुख्य सूचना आयुक्त महोदय के हवाले के साथ प्रकाशित हुए उक्त समाचार से यह निहितार्थ स्वत: ही अवक्षेपित होता है कि एक बार आदेश परित करने के बाद आयोग उस आदेश का प्रत्येक स्थिति में पालन होते देखने के दायित्व की, अधिनियम-विहित, अपनी जिम्मेदारियों से सर्वथा मुक्त हो जाता है। आयोग के गठन की ऐसी निरर्थकता और/अथवा दुर्दशा की किसी भी द्विविधा और/अथवा भ्रम की स्थिति के यथार्थ-परक निवारण करने के लिए, अधिनियम की एतद्‌ धाराओं, उपधाराओं और/अथवा प्रावधानों की अधिनियम-सम्मत तरीके से तथा आवश्यकता पड़ने पर न्यायालयों में भी स्वीकार्य प्रमाणित/सत्यापित की गयी छाया-प्रतिलिपियाँ;

आयोग को लेकर मेरा अभी तक का अनुभव मुझे अभी से ही चेता रहा है कि मुझे मेरी वांछित सूचनाएँ उपलब्ध नहीं करायी जायेंगी। और, अन्तत: जो स्थिति बनेगी वह यही होगी कि मुझे आयोग के सामने द्वितीय अपील लगानी पड़ेगी। यही नहीं, पता नहीं कितने सालों के बाद, आयोग में जब यह अपील सुनवाई सुनवाई के लिए नियत की जायेगी और यदि अपीली आदेश सूचना देने के पक्ष में आ भी जायेगा तब आयोग क्या इतना सक्षम/समर्थ भी होगा कि अपने ऐसे आदेश का पालन सचमुच ही करा पाये?

और इसीलिए, आपके नाम यह खुला पत्र लिखने विवश हुआ हूँ ताकि आयोग के मुखिया के रूप में आपको यह सूचित हो कि आपके अपने ही कार्यालय में आयोग के साथ ही अधिनियम की भी सच्ची उपयोगिता को प्रमाणित करने की घड़ी एक बार फिर से आ खड़ी हुई है। और, इस बार तो आपको यह प्रमाणित करना ही है कि कम से कम आपका अपना कार्यालय तो एक ऐसा कार्यालय है जहाँ केवल लोक सूचना अधिकारी से लगा कर प्रथम अपीली अधिकारी तक ही नहीं बल्कि द्वितीय अपीली निर्णयों को लागू करवाने वाली प्रक्रिया से लगा कर इसे लागू करवाने के लिए जिम्मेदार बनाये गये अधिकारी गण भी अधिनियम की मर्यादा की रक्षा के प्रति शत्‌-प्रतिशत्‌ समर्पित हैं। वह भी, बिना किसी शर्त।

भोपाल,
दिनांक ०६ अगस्त २०१५

(डॉ० ज्योति प्रकाश)
जी-३ सहगल टॉवर, ए/१५ हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी, कोह-ए-फ़िज़ा, भोपाल

(०९ अगस्त २०१५)