सुन-बहरे को सुनाई पड़ जाना!

Sarokar

संकेत हैं कि आयोग की कन-पटी पर ‘जूँ के रेंगने’ जैसा कुछ न कुछ प्रभाव तो पड़ा ही है। यों आयोग ने, केवल दिखावे के लिए ही, एक तरह से मुखौटा लगाया है। लेकिन, किसी सुन-बहरे को इसके लिए विवश कर पाने को कि वह स्वीकारे कि बहरा-पन उसका कोरा दिखावा रहा क्या कोई नगण्य उपलब्धि है?

मध्य प्रदेश राज्य सूचना आयोग में ‘सब कुछ’ ठीक नहीं चल रहा है। यों, यह कुछ ना कुछ ‘ठीक नहीं’ तो हर कहीं होता है। लेकिन, राज्य सूचना आयोग में इस ठीक नहीं होने का बवाल केवल निचले स्तर पर ही सीमित नहीं है। उच्च स्तर पर भी बहुत कुछ झमेले में है। और यह झमेला केवल कार्यालयीन अव्यवस्था तक सीमित नहीं है। यह तो सूचना का अधिकार अधिनियम, २००५ से जुड़ी आधार-भूत समझ और जिम्मेदारियों के निर्वाह को ही ले कर है।

अपनी निजी हैसियत के साथ ही गैर शासकीय सामाजिक संगठन सजग तथा राष्ट्रीय जागरण मंच के बैनर के तले भी मैं इस मुद्दे पर लम्बे समय से आयोग को सवालों के कट-घरे में खड़ा करते आ रहा हूँ। अपने इन सवालों को उठाने के लिए हमने जहाँ आयोग के प्रकाश में आये फैसलों को ही आधार बनाया है वहीं हमारे उठाये सवाल बड़े तीखे और गम्भीर रहे हैं। हमने ढेरों फैसलों को सामने रख कर यह प्रमाणित किया है कि विभिन्न सरकारी विभागों तथा कार्यालयों पर सूचना का अधिकार अधिनियम की ठीक-ठीक समझ नहीं होने का ठीकरा फोड़ने वाले राज्य सूचना आयोग के ही भीतर अधिनियम की समझ का टोटा है।

जन-आन्दोलनों में सक्रिय, मीडिया-कर्म में लगे और वकालत के पेशे से जुड़े मेरे अलग-अलग मित्र गम्भीरता के साथ पूछ रहे हैं कि मैं यह सब क्यों कर रहा हूँ? अपनी पूरी भल-मन साहत के साथ वे जानना चाहते हैं कि मुझे इस सब से आखिर क्या हासिल होने वाला है? हमेशा की तरह इस बार भी अपने इन मित्रों से मेरा यही कहना है कि हमारी मान्यता है कि हमारे द्वारा इन सवालों के उठाये जाने से अधिनियम को ले कर आयोग की दयनीय गुणवत्ता में इतना सुधार तो लाया ही जा सकेगा जिससे वह सरकारी कार्यालयों के सूचना अधिकारियों और प्रथम अपीली अधिकारियों के साथ ही विभाग के जिम्मेदार प्रमुखों को भी सीख देने की सच्ची हैसियत पा सके। और, जिस दिन यह सच-मुच सम्भव हो पायेगा, व्यापक जन-हित की दिशा में यह एक वास्तविक उपलब्धि होगी।

इसलिए, इसी क्रम में सजग तथा राष्ट्रीय जागरण मंच ने इसी साल ४ जून को, संयुक्त रूप से, राज्य सूचना आयोग को एक ज्ञापन सौंप कर दावा किया था कि विभिन्न सरकारी कार्यालयों में सम्पूर्ण पार-दर्शिता लागू करवाने के लिए गठित किये गये आयोग की अपनी ही कार्य-शैली सन्देह-जनक रूप से पर्याप्त अपार-दर्शी है। इसी ज्ञापन में मुख्य सूचना आयुक्त से माँग की गयी थी कि वे आयोग को पार-दर्शी बनायें। लेकिन ऐसा एक भी संकेत नहीं मिला है कि आयोग ने अपनी कार्य-शैली को पार-दर्शी बनाने के दायित्व को निभाने की दिशा में एक छोटा सा भी कदम आगे बढ़ाया है। इसके उलट, आयोग ने लीपा-पोती करने के ढेरों असफल प्रयास अवश्य किये हैं। वह भी, अपने काले-पीले को छिपाने की नीयत से प्रत्यक्ष-परोक्ष तरीकों से मीडिया के लिए जारी की गयी विभिन्न खबरों के माध्यम से।

साथ ही, ३ अगस्त २०१५ को मैंने राज्य सूचना आयोग के लोक सूचना अधिकारी के समक्ष सूचना-प्रदाय का एक आवेदन प्रस्तुत किया। इस आवेदन के माध्यम से मैंने आयोग-कार्यालय से कुछ आधार-भूत जानकारियाँ चाहीं। लेकिन लगता है कि इन अत्यन्त सहज जानकरियों को सार्वजनिक कर देने में आयोग को पसीने छूट रहे हैं। स्पष्ट दिख रहा है कि आयोग को यह पसीने इसलिए छूट रहे हैं कि दूसरों को पार-दर्शी होने की बन्दर-घुड़की दे रही उसकी आन्तरिक व्यवस्था स्वयं पूरी तरह से अपार-दर्शी है। सरल शब्दों में, राज्य सूचना आयोग के पास अपने अस्तित्व के औचित्य को सिद्ध कर पाना, शाब्दिक रूप से, कतई असम्भव हो चुका है।

ऐसे में मैंने ६ अगस्त २०१५ को मुख्य आयुक्त के नाम एक खुला पत्र (राज्य सूचना आयोग के मुख्य आयुक्त के नाम खुला पत्र) लिखा है। इस पत्र में मैंने मुख्य आयुक्त को सचेत किया है कि उनके अपने ही कार्यालय में अधिनियम के प्रावधानों की धज्जियाँ उड़ायी जा रही हैं। उन्हीं के कार्यालय के एक-दम सटीक तथ्य को रख कर मैंने उन्हें बतलाया है कि ऐसा जान-बूझ कर भी किया जा रहा है और यह आयोग के भीतर, उच्च स्तर पर, अधिनियम के वैधानिक पक्षों की समझ की कमी से भी हो रहा है। आयोग की चौखट के भीतर अधिनियम की ऐसी स्वेच्छा-चारी व्याख्याएँ की जा रही हैं जो ‘अन्धा बाँटे रेवड़ी, चीन्ह-चीन्ह कर देय’ वाली उक्ति के बहुत नजदीक हैं।

इस खुले पत्र में मैंने न केवल राज्य सूचना आयोग के कार्यालय के भीतर ही अधिनियम की जा रही दुर्गति को पूरी प्रामाणिकता के साथ स्वयं उसके सर्वोच्च अधिकारी के सामने रखा है। बल्कि, उन्हें एक तरह से चुनौती भी दी है कि दूसरे कार्यालयों पर अधिनियम की उपेक्षा करने और अधिनियम की समझ नहीं होने के आरोपों को लगाने से पहले वे स्वयं अपने ही अधीन आयोग-कार्यालय में यह सारी योग्यताएँ ला कर दिखायें।

RTI_Agniban_13 August 2015_Page-6और, संकेत हैं कि हमारे यह प्रयास कतई निरर्थक नहीं गये हैं। इसी १४ अगस्त को प्रदेश के एकाधिक शहरों से प्रकाशित होने वाले एक सांध्य-दैनिक के भोपाल संस्करण में आयोग के मुख्य आयुक्त के हवाले से एक समाचार प्रकाशित हुआ है। इसे पढ़ कर भरोसा होता है कि सूचना-प्रदाय के मेरे आवेदन के कारण, और मुख्य सूचना आयुक्त को सम्बोधित कर भेजे गये मेरे पत्र के कारण भी, आयोग की कन-पटी पर ‘जूँ के रेंगने’ जैसा कुछ न कुछ प्रभाव तो पड़ा ही है। यों, जो कुछ भी छपा है उसे देख कर केवल इतना ही कहा जा सकता है कि आयोग ने एक तरह से मुखौटा लगा कर यह प्रदर्शित करने का प्रयास किया है कि उसे अधिनियम की समझ भी है और वह उसके पालन के प्रति प्रतिबद्ध भी है। किन्तु किसी सुन-बहरे को इसके लिए विवश कर पाने को कि वह स्वीकारे कि बहरा-पन उसका कोरा दिखावा रहा है क्योंकि यथार्थ में तो उसे सब कुछ साफ-साफ सुनाई दे जाता है; क्या कोई नगण्य उपलब्धि है?

स्पष्ट है, ३ अगस्त के मेरे ताजा आरटीआई आवेदन से उठे गम्भीर सवालों से पिण्ड छुड़ाने के लिए अब कुछ कागज गढ़ना आरम्भ किया जा रहा है। किन्हीं काल्पनिक पिछली तारीखों में। देखने और देख कर उसे समझने को तैयार व्यक्ति देख-समझ पा रहे हैं कि सूचना-प्रदाय के लिए मेरे लगाये इस आवेदन के कारण उपस्थित हो गयी अन-अपेक्षित परिस्थिति में, सूचना का अधिकार अधिनियम की नियामक संवैधानिक संस्था के रूप में, आयोग की कार्य-शैली तथा नीयत की कलई उतर जाने की निश्चित-प्राय सम्भावना से घबरा कर अब ‘पैच-वर्क’ की शैली में रिपेयरिंग-प्रक्रिया आरम्भ की जा रही है। वह भी सम्भवत: केवल दिखावे के लिए। ताकि, ले-दे कर फाइलों का पेट भर दिया जाये। और इस प्रकार से, आयोग की नीति तथा नीयत पर चस्पा होने वाले एक ज्वलन्त प्रश्न के विकराल ताप को किसी तरह ठण्डा किया जा सके!

नीयत चाहे जो हो, आयोग की ओर से प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से जारी हुई यह खबर जन-आन्दोलनों में सक्रिय, मीडिया-कर्म में लगे और वकालत के पेशे से जुड़े व्यक्तियों के अलावा, म० प्र० राज्य सूचना आयोग की रीति-नीति से निराश होते जा रहे आरटीआई कार्य-कर्ताओं को भी खुला सन्देश देती है कि निरन्तर खोदने से जमीन ही नहीं, चट्‍टानी पहाड़ों में भी अच्छी-खासी सुरंग बनायी जा सकती है।

(भोपाल, १५ अगस्त २०१५)