खेत बदौलत जिये इन्सान, फिर क्यों भूखा मरे किसान?

Sarokar

राजधानी भोपाल की हुजूर तहसील में अधिकांश ग्राम पंचायतों में किसानों की खरीफ फसल प्राकृतिक आपदा का शिकार हो चुकी है। यहाँ ऐसे किसान उँगलियों पर ही गिने जा सकेंगे जिनकी खरीफ फसलें खेतों से खलिहानों तक पहुँचेंगी। और, पहुँचेंगी भी तो इतनी जिसे ठीक-ठाक कहा जा सके। किसानों ने खड़ी फसल के खेतों को भी हाँकना शुरू कर दिया है।

राहत के निर्धारण के लिए नुकसानी का सर्वेक्षण करने एक प्रभावित गाँव पहुँची सरकारी टोली ने दबी जुबान में यह बात कबूल की कि जन-दबाव में शासन ने सर्वे की औपचारिकता को तो स्वीकार लिया है लेकिन ‘ऊपर’ से उन्हें यही साफ निर्देश है कि वे अधिकतर खेतों में ‘कोई नुकसान नहीं होने’ और थोड़े से मामलों में ‘मामूली सा ही नुकसान होने’ का ही रिकॉर्ड तैयार करें।

बीते दिनों प्रदेश की राजधानी भोपाल की हुजूर तहसील के किसानों ने भारी संख्या में जिला कलेक्टरेट पर दो बार प्रदर्शन किया, कलेक्टर से मिल कर ज्ञापन दिये और अपनी फसलों की बरबादी से उनके सामने उत्पन्न हुए भीषण आर्थिक संकट में राहत पहुँचाने की गुहार लगायी। लेकिन जब यह लगने लगा कि राज्य सरकार किसानों के हित में कुछ भी ठोस कदम उठाने से पहले इतना समय यों ही बेकार में नष्ट कर देने की सोची-समझी रण-नीति पर चल रही है जितने में खेतों पर खड़ी दिखती उनकी फसलों के होने अथवा उनके प्राकृतिक आपदा के कारण बुरी तरह से बरबाद होने के सारे प्रमाण, प्राकृतिक कारणों और अगली फसल की तैयारी के मिले-जुले प्रभाव में, मिट से जायें तो आक्रोषित किसानों ने अपने-अपने गाँवों में विरोध के सुर मुखरित करने आरम्भ कर दिये। इसी क्रम में ४ सितम्बर को सूखी निपानियां पंचायत के ग्राम मनीखेड़ी में भोपाल जिला प्रशासन और राज्य के राजस्व व कृषि विभागों के मिले-जुले प्रतीक एक पुतले का दहन भी किया गया।

उल्लेखनीय है कि भोपाल जिले की तहसील हुजूर की सूखी निपनियां, चंदेरी, कुठार, खजूरी राताताल, बगोनियाँ, रायपुर, निपनियां जाट, खेजडा देव, गोंदरमऊ, खामखेडा आदि ग्राम पंचायतों में इस साल के खरीफ मौसम में भी प्राकृतिक आपदा ने कहर ढाया है। इन पंचायतों के अनेक गाँवों के अधिकांश रकबे में सोयाबीन, उड़द, मूँग जैसी खरीफ फसलें असामान्य मौसम तथा इल्ली और कीट के प्रकोप के कारण पूरी तरह से नष्ट हो चुकी हैं। खरीफ फसलों के पौधे इल्ली व कीट के खाये जाने से छलनी हो चुके हैं। और, जिन खेतों में देखने वालों को फसल के पौधे लह-लहाते दिख रहे हैं उनमें भी पौध में फलियों का नामोनिशान नहीं है। किसानों को भारी आर्थिक क्षति पहुँची है तथा वे गम्भीर संकट में हैं। पीड़ित किसानों के लिए फसल की लागत निकलना तो बहुत दूर की बात है, अपने खेत से उपज के कुछ दाने घर ले कर आना भी मुश्किल हो गया है।

राष्ट्रीय जागरण मंच म० प्र० के नेतृत्व में भोपाल कलेक्टरेट पर प्रदर्शनकलेक्टर को दिखाने सोयाबीन के पौधे उखाड़ कर लाये थे किसानप्रदर्शन-कारियों ने भोपाल कलेक्टर को ज्ञापन दिया

हालत अब यह हो गयी है कि इसके कारण आये गम्भीर आर्थिक संकट से आगामी रबी फसलों की बोनी कर पाना भी किसानों के लिए असम्भव हुआ दिखायी दे रहा है। इन परिस्थितियों में पीड़ित किसान अपना जीवन-यापन किस प्रकार कर पायेगा यह सोच पाना भी बहुत मुश्किल हो गया है। लगातार लम्बे समय से फसलों के खराब होते जाने से लुटा-पिटा किसान खाद, बीज और कीट-नाशकों के लिए लिये गये नये कर्ज के बोझ के नीचे और ज्यादा दब गया है। किसान की मनः स्थिति भी आज बिल्कुल ठीक नहीं है। डर है कि दो जून की रोटी तक के लिये भी मोहताज हो चुके छोटे किसान अपना मानसिक संतुलन खो कर कोई अन-होनी न करने लगें। ऐसे हालातों में समय की माँग है कि सरकार किसानों के साथ खड़ी हो। उसे अविलम्ब समुचित राहत तो पहुँचाये ही, कर्ज के जाल से मुक्त करते हुए उसे अगली फसल के लिए तकनीकी मार्ग-दर्शन के साथ ही आर्थिक मदद भी पहुँचाये ताकि वह पुनः एक बार फिर से खड़ा हो सके।

लेकिन इस नैतिक-सामाजिक अपेक्षा के ठीक उलट, प्राकृतिक आपदा के कारण भीषण आर्थिक संकट की आशंका से घिरे भोले भाले किसान अब शासन द्वारा किये जा रहे छल-कपट की दोहरी मार से भी प्रताड़ित किये जा रहे हैं। शासन किसानों को हुए नुकसान के सर्वेक्षण का दिखावा तो कर रहा है लेकिन इस कथित सर्वे की सचाई बड़ी भयावह है। इस सर्वे में किसानों के प्रति सहानुभूति का थोड़ा सा भी भाव नहीं है। उल्टे, यह पीड़ित किसानों का खुला मजाक बनाता दिख रहा है।

१ सितम्बर को अपनी माँगों की तखियाँ उठाये भोपाल कलेक्टरेट पहुँचे पीड़ित किसानों ने एक स्वर में बतलाया था कि इसी २६ अगस्त को जब वे एक ज्ञापन लेकर जिला कलेक्टर के कार्यालय पहुँचे थे और प्रदर्शन करने के बाद अपनी माँगों वाला ज्ञापन सौंपा था तब पीड़ित किसानों से उनकी आप-बीती सुन कर उन्हें अश्वस्त किया गया था कि जिला प्रशासन की ओर से सभी आवश्यक कदम तत्काल उठाये जायेंगे। लेकिन, सर्वे के लिए नामांकित राजस्व अधिकारियों की टीम ने २८ अगस्त को ग्राम सूखी निपानियां पहुँच कर जो कुछ किया उसने शासन की नीयत पर गम्भीर सवालिया निशान लगा दिये हैं।

किसानों का आरोप है कि २८ अगस्त को गाँव पहुँचे राजस्व तथा कृषि अमले के अधिकारियों के व्यवहार से साफ हो गया है कि राहत के लिए जमीनी सर्वेक्षण के नाम पर यह अधिकारी केवल अपनी मर्जी के चुनिन्दा गाँव ही जायेंगे। और, वहाँ भी वे खेतों का जमीनी सर्वे करने की ईमान-दारी अपने-अपने कार्यालयों की खूँटियों पर ही टाँग कर पहुँचेंगे। सरकारी अमले के इस व्यवहार से खुद को लुटा-पिटा महसूस करने वाले ग्राम सूखी निपानियां के किसान इस बात से आक्रोषित हैं कि कृषि विभाग के अधिकारी पटवारी के साथ पहुँचे जरूर थे लेकिन उनकी नीयत सर्वे कर सचाई दर्ज करने की नहीं थी। हाथों में अपने-अपने खेतों से उखाड़े सोयाबीन के पौधे लहराते हुए कलेक्टरेट पहुँचे इन किसानों का आक्रोष इस कारण और बढ़ गया है कि इस सरकारी टोली ने दबी जुबान में उनसे यह बात कबूल भी कर ली कि जन-दबाव में शासन ने सर्वे की औपचारिकता करना तो स्वीकार लिया है लेकिन ‘ऊपर’ से उन्हें यही साफ निर्देश है कि वे अधिकतर खेतों में ‘कोई नुकसान नहीं होने’ और थोड़े से मामलों में ‘मामूली सा ही नुकसान होने’ का ही रिकॉर्ड तैयार करें।

किसानों ने आरोप लगाया कि सर्वे करने के दिखावे के लिए उनके ग्राम पहुँची इस टोली ने सबसे पहले गाँव के ऐसे उस इकलौते खेत को ढूँढ़ा जिसमें सोयाबीन कि फसल कुछ ठीक-ठाक थी। फिर इस एक खेत की खड़ी फसल की विडियो शूटिंग कर वहीं से पूरे गाँव की सर्वे रिपोर्ट बनाने का कार्य आरम्भ कर दिया। इस एक खेत की आड़ ले कर बाकी के सारे खेतों की पूरी तरह से बर्बाद हो चुकी फसलों को बिल्कुल ठीक-ठाक बताने का प्रयास किया।

बरबाद हुई फसलें दिखाने सर्वेक्षण दल पर अपने-अपने खेत पर चलने का दबाव डालते किसानपीड़ित किसान आज भी यही बतला रहे हैं कि उनके खेतों की बर्बादी देखने शासन का कोई सर्वेक्षण दल उनके गाँव तो नहीं पहुँचा है लेकिन उनके खेतों में फसलों के स्वस्थ होने और भरपूर लह-लहाने की सरासर झूठी बातें सरकारी फाइलों में दर्ज अवश्य की जा रही हैं। उनकी इस बुरी नीयत के समझ में आते ही चौकन्ने ग्राम वासियों ने जमीनी सर्वे के नाम पर उनसे खिलाफ किये जा रहे इस षडयन्त्र का विरोध किया और कहा कि वे सारे खेतों पर जा कर ही फील्ड का सही-सही सर्वे करें और तभी उसके बारे में कोई रिपोर्ट शासन को सौंपें। इस पर अधिकारी आक्रोषित किसानों के अनुरोध को ठुकरा कर कोई सर्वे किये बिना ही गाँव से भाग खड़े हुए।

सर्वे टोली के ऐसे व्यवहार से चकित हुजूर तहसील के पूर्व जनपद अध्यक्ष श्याम सिंह मीणा के नेतृत्व में तहसील कार्यालय पहुँचे और वहाँ राजस्व अधिकारियों से अपनी व्यथा-कथा बतला कर शिकायत की। इस पर वहाँ मौजूद अधिकारियों ने सरकारी दल का पक्ष लेते हुए कहा कि जैसा आप लोग चाह रहे हैं अगर शासन उसी तरह से सर्वे कर राहत बाँटने बैठेगा तो फिर तो तहसील भर के किसान राहत का हक जताने प्रशासन के सिर पर खड़े हो जायेंगे।
इल्ली तथा कीट के प्रकोप से नष्ट हुई सोयाबीन की फसललह-लहाती दिखती फसल की पोल खोलते उसी खेत से उखाड़े सोयाबीन के पौधेलह-लहाते दिख रहे खेत में सोयाबीन की पौध में फलियों के नदारत रहने से अपनी किस्मत पर रोता किसानग्राम निपानियां जाट के किसान और राष्ट्रीय जागरण मंच भोपाल के महासचिव अजय गौड़

तथा-कथित राहत-सर्वेक्षण पर स्थानीय किसान और राष्ट्रीय जागरण मंच मध्य प्रदेश के महासचिव अजय गौड़ ने एक बड़े मार्के की गम्भीर टिप्पणी की है। उनका कहना है कि निपानियां जैसे सर्वे में विडियो शूटिंग में खेतों के ‘लाँग शॉट्स’ ले कर सर्वे दलों द्वारा भले ही यह दिखला दिया जाये कि खेतों में खड़ी फसलें लह-लह रही हैं। लेकिन सूखी निपानियां का विडियो शूट इसका जीता-जागता प्रमाण है कि इन विडियो शूट्स से यह कहीं नहीं प्रमाणित होगा कि फसलों के लह-लहते दिखते इन पौधों में फलाव भी स्वाभविक रूप से लह-लहा रहा है। सरल शब्दों में इसका मतलब यह है कि दूर से बेहतर दिखने वाले खेत के सोयाबीन के पौधों में भी या तो फलियाँ सिरे से नदारत हो सकती हैं या यदि पौधों में इक्का-दुक्का फलियाँ दिख भी रहीं हों तब भी हो सकता है कि उनमें लगे सोयाबीन के दाने मसूर जितने भी नहीं बढ़ पाये हों। और, यह दाने किड़ चुके हुए भी हो सकते हैं।

जाहिर है, निपानियां से आयी सारी बातें तो बानगी भर हैं। सचाई यह है कि राजस्व अधिकारियों द्वारा किया जाने वाला इस तरह का सर्वे केवल दिखाने के लिए ही कागजों का पेट भर रहा है। कहने के लिए नुकसानी के सर्वे भी हो जायेंगे और राहत के हकदार किसानों से उनका जायज हक़ भी छीन लिया जायेगा। साल दर साल आखिर यही तो होता आ रहा है। किसान होतम सिंह ठाकुर कहते हैं कि फसलों को हुए नुकसान का पता लगाकर उसका सर्वे कराना और किसानों तक सहायता पहुंचाना शासन-प्रशासन की ऐसी जिम्मेदारी है जिससे वह मुँह नहीं मोड़ सकता है पर बड़े ही खेद कि बात है कि उसने इस जिम्मेदारी से अपना पल्ला झाड़ लिया है।

ग्राम पंचायत कुठार के पूर्व सरपंच रामजीवन मीणा से हुई बात से जिला प्रशासन की नीयत का एक दूसरा प्रमाण सामने आया। उन्होंने बतलाया कि जब वे फसलों को हुए नुकसान में राहत देने की बात करने भोपाल के जिलाध्यक्ष से मिले तो उन्हें बड़े प्रेम से यह समझाइश दी गयी कि वे शासन से राहत की माँग करने के स्थान पर पीड़ित किसानों की सारी ताकत को बीमा-राशि उपलब्ध कराने पर लगायें। कलेक्टर महोदय ने तर्क रखा था कि राहत की राशि तो नाम-मात्र की ही रहती आयी है। पीड़ित किसानों की असली भर-पायी तो नुकसानी के ऐवज में मिलने वाली बीमा की राशि से होगी। कुटिल प्रशासनिक चालों से अनजान रामजीवन मीणा जैसे भोले किसानों के लिए कलेक्टर की सलाह एकदम जायज थी। वे इसके झाँसे में आते दिख भी रहे हैं क्योंकि उन्हें इसका बिल्कुल भी अनुमान नहीं है कि बीमा-राशि के निर्धरण के लिए भी फसलों की बरबादी का एकदम ईमानदार सर्वेक्षण ही पहली शर्त है। यदि सर्वे में लीपा-पोती होगी तो बीमा की राशि भी या तो नदारत हो जायेगी या फिर मिली भी तो वह ऊँट के मुँह में जीरे जितनी ही रहेगी।
खड़ी फसल वाले खेत को ट्रैक्टर चलवा कर हकवाता किसानआक्रोषित किसानों द्वारा जिला प्रशासन के पुतले का दहन

सरकारी अमले द्वारा सर्वे के किये जाने की राह देखते किसान अब निराश होने लगे हैं। इसलिए जिन खेतों में फलियों से बाँझ पौध खड़ी है उनके मालिक किसानों ने या तो अपने मवेशी चरने के लिए खेतों में छोड़ने शुरू कर दिये हैं या फिर वे ट्रैक्टर लगा कर खड़ी फसल के खेतों को हाँकने लगे हैं। वे ऐसा इसलिए कर रहे हैं क्योंकि जिनकी क्षमता हो वे इन खेतों में अगली फसल की तैयारियाँ तो करने लगें। राज्य सरकार की इस सोची-समझी पैंतरे-बाजी से आक्रोषित किसानों ने गाँवों के स्तर पर भी विरोध-प्रदर्शन आरम्भ कर दिया है। रैलियाँ निकाली जा रही हैं जिनमें जिला प्रशासन, राजस्व विभाग तथा कृषि विभाग के खिलाफ नारे-बाजी की जा रही है। कुछ जगहों पर इनके प्रतीक पुतलों का दहन किये जाने के भी समाचार हैं। खबरें यह भी हैं कि जागरूक किसानों द्वारा आह्वान किया जा रहा है कि पीड़ित किसान १४ सितम्बर को एक बार फिर से भोपाल में इकट्‍ठे हों। और यदि ऐसा हुआ तो ये किसान अपनी माँगों को मनवाने का दबाव डालने एक रैली निकालेंगे जिसके बाद उनका एक प्रतिनिधि मण्डल प्रदेश के राजस्व मन्त्री से मिलेगा और उन्हें अपनी माँगों का एक ज्ञापन भी सौंपेगा।

(१२ सितम्बर २०१५)