मध्य प्रदेश राज्य सूचना आयोग : काम के ना धाम के, अढ़ाई मन अनाज के!

Sarokar

लगता है कि म० प्र० राज्य सूचना आयोग में या तो अधिनियम की वैधानिक समझ के लिए आवश्यक रहने वाली आधार-भूत योग्यता के स्थान पर अ-योग्य और अ-पात्रों की भी नियुक्तियाँ हुई हैं या फिर ऐसे सारे व्यक्ति जानते-समझते हुए अधिनियम के ध्येय, मंशा और प्रावधानों की पूर्ति में अड़ंगा डालने की नीयत से कार्य कर रहे हैं।

मध्य प्रदेश राज्य सूचना आयोग के हवाले से आयी एक ताजी खबर ने फिर से इसे सफेद हाथी ठहराने का अवसर पैदा किया है। या शायद, उससे भी ज्यादा ऐसा कुछ जो ‘काम के ना धाम के, अढ़ाई मन अनाज के!’ को इतनी गम्भीरता से व्यक्त करता हो कि संविधान के प्रावधानों में फेर-बदल करने का अधिकार रखने का दम्भ भरने वालों को कुछ न कुछ कर ही डालने को विवश कर सके।

RTI_Bhaskar Bhopal_Epaper_13-09-2015_Page-9 यों, इस प्रकार की खबरों को ‘रोचक’ कहना बहुत आम है। लेकिन इस खबर को भी रोचक कह देना आयोग के भीतर मची अन्धेर-गर्दी को प्रकारान्तर से बढ़ावा देने जितना घोर निन्दनीय कृत्य होगा। दरअसल, इस खबर का होना अपने-आप में बहुत दुर्भाग्य-जनक है क्योंकि इसका गूढ़ निचोड़ हमारी उन आनुवांशिक प्रवृत्तियों को तार-तार करने वाला है जो प्राजातान्त्रिक मूल्यों के नाम पर कड़वे सच की अन-देखियों का समर्थन करने को ही बढ़ावा देती हैं। और, लगातार संकेत आ रहे हैं कि मध्य प्रदेश राज्य सूचना आयोग हमारी इसी राष्ट्रीय कमजोरी की प्रत्येक बूँद का दोहन करने में प्राण-पण जुटा है। सन्दर्भित खबर में आयोग द्वारा अपनी भूमिका के बारे में की गयी कथित समीक्षा का अखबारी निष्कर्ष ऐसे संकेतों की ताजी कड़ी भर है।

हो सकता है कि आयोग इसे सिरे से ही नकार दे कि उसने बीते दो सालों की ऐसी कोई एक-मुश्त औपचारिक समीक्षा की है। तब इसका स्वाभाविक तात्पर्य यह हो सकता है कि आयोग में बीते दो सालों की अनौपचारिक समीक्षा हुई हो। या फिर, यह भी कि आयोग की अन्दरूनी कोटरी में सीमित अवधि के सन्दर्भों में नियमित अन्तरालों से ऐसी समीक्षाएँ की जाती हों जिनमें इस तरह के आँकड़े परस्पर साझा किये जाते हों। यही नहीं, खबर में एक सूचना आयुक्त का बाकायदा नाम-जद रूप से उल्लेख भी है जो यह मान लेने को पर्याप्त आधार देता है कि नीयत चाहे जो रही हो, स्वयं आयोग के भीतरी सूत्रों की ओर से ही खबर को ‘लीक’ किया गया है। चाहे जो हो, अकाट्य सचाई है कि देश के जिम्मेदार समझे जाने वाले एक राष्ट्रीय हिन्दी दैनिक में छपी इस खबर का आयोग ने अभी तक कोई अधिकृत खण्डन नहीं किया है।

इसीलिए यहाँ मेरा, और आरटीआई के अधिनियम की यथार्थ शक्तियों को ले कर सजग रहने वाले मेरे जैसे प्रत्येक व्यक्ति का, दो टूक सवाल है कि क्या आयोग ने सच में ही कभी ऐसी कोई समीक्षा की है? या इस तरह से, बिना सिर-पैर वाली खबर को लीक करते हुए, क्या आयोग ने अपने भीतर फैली स्वेच्छा-चारी गन्दगी की लीपा-पोती करने की कोई बड़ी चतुर चाल चली है?

खबर के अनुसार आयोग का निष्कर्ष है कि प्रदेश के सूचना अधिकारी ‘चाहे जो हो जाये’, जानकारी को छिपाये ही रखना चाहते हैं। और अधिकांश मामलों में, सम्भवत:, वे सफल भी हुए हैं! लेकिन, ऐसे किसी भी निष्कर्ष से यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि अधिनियम के अन्तर्गत्‌ माँगी गयी सर्वथा देय सूचना आवेदक को उपलब्ध कराने को सुनिश्चित करने के लिए आयोग ने अभी तक कुल कितने और कौन-कौन से वैधानिक कदम उठाये हैं? बल्कि, मूल प्रश्न तो यही है कि उसने कोई कदम उठाये भी हैं, या नहीं?

यह दोनों प्रश्न किसी भी सूचना आयोग के गठन के साथ ही उसके अस्तित्व के औचित्य की केवल वैधानिकता से ही नहीं बल्कि नैतिकता से भी जुड़ा है। दरअसल, यह तो आयोग के गठन व उसके अस्तित्व से जुड़ा वह आधार-भूत प्रश्न है जिससे आँखें मूँदे रखने का परामर्श देने का तात्पर्य, केवल और केवल, यही है कि ऐसा परामर्श देने वाला देश की विधायी मंशाओं को बधिया करने में लगी शक्तियों के हाथों बिक चुका है। वह भी, पूरी तरह से।

खबर में आयोग द्वारा की गयी कथित समीक्षा का जो हवाला है उसमें निम्न तीन अन्य तथ्य भी उभर कर सामने आये दिखते हैं —

१.   बीते दो सालों में आयोग ने कुल दो दर्जन से कुछ अधिक प्रकरणों में सूचना अधिकारियों पर जुर्माना ठोका है;

२.   इनमें से कुछ मामलों में हर्जाने के साथ ही अनुशासनात्मक कार्यवाही करने के आदेश भी परित किये हैं; और

३.   समीक्षा के बारे में छापी गयी खबर से यह बिल्कुल भी उजागर नहीं होता है कि बीते दो सालों में आयोग ने कुल उतने ही मामलों में फैसले सुनाये हैं या फिर उनसे अधिक मामलों का निराकरण किया है? या यदि अधिक मामलों का निराकरण किया है तो, क्या केवल उतने ही मामलों में सूचना अधिकारियों को सूचना-प्रदाय नहीं करने का दोषी पाया गया है? और यदि आयोग ने अधिक मामलों में सूचना अधिकारियों को सूचना-प्रदाय नहीं करने का दोषी ठहराया है तो फिर उसने केवल उतने से ही दोषियों पर जुर्माना, हर्जाना या फिर अनुशासनात्मक कार्यवाही करने के आदेश क्यों पारित किये हैं?

यहाँ यह चार अन्य महत्व-पूर्ण तथ्यों का उल्लेख करना भी आवश्यक है — पहला यह कि, आयोग की कार्य-शैली की पोल खोलने की नीयत से मैंने ३ अगस्त २०१५ को आयोग के लोक सूचना अधिकारी के सामने सूचना-प्रदाय का एक आवेदन लगाया था; दूसरा यह कि, इस अवेदन में मैंने आयोग से ऐसी, सर्वथा देय, सूचनाएँ माँगी थीं जिनके सामने आने पर निकाले जा सकने वाले निष्कर्ष आयोग द्वारा की गयी उक्त कथित समीक्षा से गिनती में कहीं अधिक, सचाई में कहीं अधिक गहरे और आयोग के अस्तित्व की गुण-वत्तात्मक समीक्षा में कहीं अधिक गम्भीर होते; तीसरा यह कि, सम्भवत: यही कारण है कि आयोग के लोक सूचना अधिकारी ने उनसे माँगी गयी उक्त सूचना को दे देने के स्थान पर उसे दबाये रखना अधिक उचित समझा; और चौथा यह कि, यह सब तब भी हुआ जबकि ६ अगस्त २०१५ को उनके नाम लिखे अपने खुले पत्र (राज्य सूचना आयोग के मुख्य आयुक्त के नाम खुला पत्र) में मैंने मुख्य सूचना आयुक्त को प्रत्यक्ष-परोक्ष चुनौती भी दी थी कि वे सुनिश्चित करें कि उनके अपने कार्यालय का सूचना अधिकारी मुझे माँगी गयी समस्त जानकारी अवश्य प्रदान करे। वह भी समय से। लेकिन माँगी गयी जानकारियाँ मुझसे छिपायी गयीं हैं।

इन स्थितियों में, समीक्षा के नाम पर जो जानकारी लीक हुई है उसका अर्थ यही है कि आयोग सूचना-प्रदाय के ३ अगस्त २०१५ के मेरे आवेदन को, अधिनियम के ध्येय तथा उसकी भावना के विपरीत जा कर, दबाये रखने के अपने स्पष्ट षडयन्त्र की लीपा-पोती करने के सस्ते रास्ते ढूँढ़ रहा है।

माँगी गयी जानकारी से जान-बूझ कर वंचित रखने और फिर मामले की लीपा-पोती भी करने के अपने इस आरोप का बिल्कुल ठोस आधार मेरे पास है। दरअसल, मैंने जो जानकारी आयोग के सूचना अधिकारी से माँगी थी उससे यह दुर्भाग्य-जनक सचाई सामने आने वाली थी कि राज्य सूचना आयोग बीते कुछ समय से लोक सूचना अधिकारियों तथा सरकारी कार्यालयों के सामने अपने एकदम बेबस होने का जो ‘अति भोला’ रोना रोते आ रहा है, वास्तव में उसमें और बुरी नीयत के लिए वर्णित घड़ियाली रुदन में रत्ती भर भी अन्तर नहीं है।

अधिनियम के ध्येय, मंशा और प्रावधानों का ज्ञान हो तो मेरी इस बात को कोई भी समझ सकता है। जहाँ तक अधिनियम के ध्येय और मंशा की बात है, यदि उसे एक वाक्य में समझाना हो तो कहा जा सकता है कि संविधान, संसद्‌, राज्य विधान मण्डल अथवा सरकार के अधीन या इनके द्वारा वैधानिक रूप से गठित संस्थानों, निकायों अथवा स्वायत्त संस्थाओं की कार्य-शैली में पार-दर्शिता और उत्तर-दायित्व को सुनिश्चित करना ही अधिनियम का मूल ध्येय तथा उसकी यथार्थ मंशा है। इसके बाद मेरी उपर्युक्त बात को समझने के लिए केवल सूचना का अधिकार अधिनियम, २००५ के अध्याय में प्रावधानित धारा १८ की उपधारा में किये गये निम्न प्रावधान को समझ लेना पर्याप्त होगा —

धारा १८ की उपधारा के अनुसार किसी मामले में जाँच करते समय (केन्द्रीय या राज्य) आयोग को वही शक्तियाँ प्राप्त हैं जो निम्न-लिखित मामलों के सम्बन्ध में किसी वाद का विचारण करते समय सिविल प्रक्रिया संहिता, १९०८ के अधीन सिविल न्यायालय में निहित होती हैं —

  • सम्बन्धित व्यक्तियों को समन करना और उन्हें शपथ पर मौखिक या लिखित साक्ष्य देने के लिए तथा दस्तावेज या चीजें पेश करने के लिए विवश करना;
  • दस्तवेजों के प्रकटीकरण और निरीक्षण की अपेक्षा करना;
  • शपथ-पत्र पर साक्ष्य को अभिग्रहित करना;
  • किसी न्यायालय या कार्यालय से किसी लोक अभिलेख या उसकी प्रतियों को माँगना;
  • साक्षियों या दस्तवेजों की परीक्षा के लिए समन जारी करना; और
  • कोई अन्य विषय, जो विहित किया जाये।

अधिनियम के ध्येय, मंशा और प्रावधानों की पूर्ति के सन्दर्भ में आयोग को मिली हुई अपार शक्तियों को समझने के लिए अधिनियम की उपर्युक्त धारा १८ की उपधारा ३(क) का वह अंश बहुत महत्व-पूर्ण है जिसके अनुसार दस्तावेज या चीजें पेश करने के लिए आयोग व्यक्तियों (अर्थात्‌ सम्बन्धित लोक सूचना अधिकारियों तथा उनके नियोक्ता विभागों, संस्थानों और/अथवा कार्यालयों के जिम्मेदार अधिकारियों) को विवश कर सकता है

स्पष्ट है, वांछित सूचनाएँ प्रदान नहीं करने वाले या अधिनियम के अन्तर्गत्‌ आयोग द्वारा दिये गये सुसंगत्‌ आदेशों-निर्देशों की उपेक्षा करने वाले व्यक्तियों और/अथवा संस्थानों के खिलाफ सूचना आयोगों को पर्याप्त शक्तियों से सम्पन्न किया गया है। और इन शक्तियों के होते हुए, मध्य प्रदेश राज्य सूचना आयोग की ओर से, अपनी असहायता का रोना रोते रहना यही दिखलाता है कि या तो यहाँ अधिनियम की वैधानिक समझ के लिए आवश्यक रहने वाली आधार-भूत योग्यता रखने वालों के स्थान पर सर्वथा अ-योग्य और अ-पात्र व्यक्तियों तक की नियुक्तियाँ हुई हैं या फिर यह कि ऐसे व्यक्ति जानते-समझते हुए भी अधिनियम के ध्येय, मंशा और प्रावधानों की पूर्ति में अड़ंगा डालने की नीयत से कार्य कर रहे हैं।

सम्भवत: ऐसों का ही शाब्दिक चित्रण करने के लिए हिन्दी में यह मुहावरा गढ़ा गया था — ‘काम के ना धाम के, अढ़ाई मन अनाज के!’

(२० सितम्बर २०१५)