स्वयं को अधिनियम से ऊपर मानने लगा है म० प्र० राज्य सूचना आयोग

Sarokar

न्यायिक इतिहास का यह पहला अवसर था जब न्यायिक निराकरण का संवैधानिक अधिकार प्राप्त कोई पीठ किसी प्रकरण में अपना अन्तिम निराकरण आदेश परित कर देने के बाद, स्वत: प्रेरित और/अथवा स्फूर्त हो कर उसी प्रकरण की सुनवाई को नये सिरे से आरम्भ करने वाली थी।

सूचना का अधिकार अधिनियम, २००५ के अन्तर्गत्‌ गठित हुए म० प्र० राज्य सूचना आयोग की कार्य-शैली लगभग आरम्भ से ही गम्भीर विवादों से घिरी रही है। संवैधानिक प्रतिष्ठा से मण्डित न्यायिक संस्थानों के इतिहास में यह राज्य सूचना आयोग इस अर्थ में सम्भवत: सबसे अनूठा है कि इसकी कार्य-प्रणाली तथा मंशा के विधिक औचित्य पर सबसे अधिक उँगलियाँ उठायी गयी हैं। यहाँ तक कि, पूर्व मुख्य सूचना आयुक्त पद्मपाणि तिवारी के नेतृत्व-काल में स्वयं उनके अलावा दो अन्य आयुक्तों की बलात्‌ पद-मुक्ति की याचिका तक तत्कालीन महामहिम राज्यपाल के सम्मुख प्रस्तुत की गयी थी। यह अलग बात है कि उन्हें ही बेहतर ज्ञात कारणों से महामहिम ने इस गम्भीर यचिका को बर्फीले बस्ते में कहीं पटक दिया था।

ऐसा प्रतीत होता है कि उसके बाद से समय तो बदल चुका है किन्तु आयोग की कार्य-शैली से जुड़ी परिस्थितियों में कोई बदलाव नहीं आया है। इसका एक सम्भावित कारण राज-भवन का सुन-बहरापन वाला समझा नहीं जा सका वह व्यवहार भी हो सकता है जिसने आयोग के भीतर पनपी अनैतिकता के विस्तार को प्रश्रय दिया। पर्याप्त संकेत हैं कि आयोग के जिम्मेदार कर्मचारी व अधिकारी नैतिकता को इस सीमा तक तिलांजलि दे चुके हैं कि अब तो उन्हें ‘अधिनियम जाये चूल्हे में’ के साथ ही ‘न्याय के स्थापित सिद्धान्त जायें भाड़ में’ जैसी स्तब्ध कर देने वाली मानसिकता के बैनर को लहराने के लिए मिले प्रत्येक अवसर को भुनाने तक में कोई संकोच नहीं हो रहा है।

दूसरों के बारे में मेरी जानकारी केवल समाचार-पत्रों में प्रकाशित समाचारों पर आधारित है। इन समाचारों में आयोग के व्यवहार पर संशय के बादल घिरे दिखते तो हैं किन्तु देखने वाला व्यक्ति-गत्‌ रूप से यह सुनिश्चित करने की स्थिति में नहीं होता है कि वह अपने आभास को ठोस तत्यों की कसौटी पर कस कर स्वयं कैसे परखे? मैंने भी ऐसे बहुतेरे वैधानिक प्रयास किये किन्तु असफल रहा। मैं असफल इस कारण नहीं रहा कि मेरे प्रयासों की दिशा में कोई खोट था। अपितु, मैं सफल इसलिए नहीं हो पाया क्योंकि पारदर्शिता की वैधानिक पराकाष्ठा को सुनिश्चित करने की मंशा से पारित सूचना का अधिकार अधिनियम की अस्मिता को सुरक्षित करने के लिए गठित म० प्र० राज्य सूचना आयोग ने अपने ही भीतर पारदर्शिता को किसी गहरे अँधेरे तहखाने में बन्धक बना कर आम जन की पहुँच से दूर छिपा रखा है।

आयोग के भीतर अनैतिकता किस स्तर पर पहुँच चुकी है, इसका एक सबसे ताजा उदाहरण, अपनी पूरी प्रामाणिकता के साथ, उजागर हुआ है। मेरे लिए प्रामाणिकता इसलिए है क्योंकि जो भी हुआ, मैं स्वयं उसका एक पक्ष हूँ।

संक्षेप यह कि २१ सितम्बर २०१० को मैंने तहसीलदार एवं कार्यपालन दण्डाधिकारी देवास (म० प्र०) के लोक सूचना अधिकारी के सामने अधिनियम के अन्तर्गत्‌ जानकारी देने का अपना एक आवेदन प्रस्तुत किया था। मैंने जो जानकारी चाही थी उसके सार्वजनिक होने से सम्बन्धित कार्यालय की प्रशासनिक तथा अर्ध-न्यायिक अधिकारों से जुड़ी मन-मानियों और उनकी आड़ में होने वाले सम्भावित शोषण की खबरों का या तो तथ्य-परक खण्डन हो सकता था या फिर पुष्टि। और, ऐसी समस्त जानकारी अधिनियम के अन्तर्गत्‌ देय है। किन्तु, मुझे जानकारी नहीं दी गयी। इसलिए विवश हो कर मैंने प्रथम अपील प्रस्तुत की। जब इसकी कोई सुनवाई नहीं हुई तब मैंने आयोग में द्वितीय अपील लगा कर जानकारी उपलब्ध कराने तथा दोषी अधिकारियों को अधिनियम के प्रावधानों के अन्तर्गत्‌ दण्डित करने की माँग की।

पाँच साल से अधिक समय के बीत जाने के बाद भी आयोग ने मेरी इस अपील की कोई सुधि नहीं ली। लेकिन फिर १३ अप्रैल २०१५ को आयोग ने, अचानक ही, अपनी एक लोक अदालत की सूचना मुझे भेजी। लोक अदालत २ मई २०१५ को उज्जैन में आयोजित की जने वाली थी। इसी सूचना-पत्र में मुझसे कहा गया था कि यदि मैं उक्त लोक अदालत के माध्यम से अपने अपीली प्रकरण का निराकरण कराने को तैयार हुँ तो आयोग द्वारा साथ में भेजे गये प्रपत्र पर अपनी सहमति आयोग में जमा करवा दूँ।

किन्तु, मैं इस दृढ़ मत का हूँ कि अधिनियम अपने प्रावधानों के अन्तर्गत्‌ सूचना-प्रदाय के किसी भी आवेदन के प्रस्तुत किये जाने और फिर सूचना के बाधित रखे जाने को ले कर किसी विवाद के वैधानिक रूप से निराकरण के लिए प्रस्तुत हो जाने के बाद प्रकरण में किसी तरह के किसी ‘समझौते-भरे’ विकल्प की तलाश की अनुमति नहीं देता है। इसलिए मैंने न तो ऐसी कोई सहमति आयोग को प्रेषित की और ना ही उक्त लोक अदालत में उपस्थित हुआ। मेरी इस धारणा के इसके दो सरल वैधानिक आधार हैं —

(१) आवेदक और/अथवा लोक सूचना अधिकारी में से किसी एक, अथवा दोनों, ओर से ऐसी किसी तलाश के आरम्भ किये जाने की स्थिति अधिनियम के प्रावधानों के खुले दुरुपयोग करने की श्रेणी में आती है; और

(२) अपीली प्राधिकारी की ओर से की गयी ऐसी कोई पहल अधिनियम के मूल ध्येय के साथ ही साथ उसके प्रावधानों की हत्या करने तुल्य नैतिक व वैधानिक अपराध की श्रेणी में आती है।

किन्तु, १४ मई २०१५ को मैं उस समय आश्चर्य-चकित रह गया जब मुझे तहसीलदार एवं कार्यपालन दण्डाधिकारी देवास (म० प्र०) के वर्तमान लोक सूचना अधिकारी द्वारा भेजा गया एक पत्र (क्र० ७८०/रीडर-१/२०१५ दिनांकित ०८/०५/२०१५) प्राप्त हुआ। इसके माध्यम से मुझे सूचित किया गया था कि आयोग ने उज्जैन में आयोजित अपनी लोक अदालत में मेरी सम्बन्धित दूसरी अपील का निराकरण करते हुए आदेश पारित कर दिया था।

क्योंकि इस पत्र ने मुझे स्तब्ध व अचम्भित कर दिया था, मैंने १९ मई २०१५ को ही आयोग के कार्यालय में एक आवेदन प्रस्तुत किया और आयोग से लोक अदालत के उक्त धटना-क्रम से जुड़े कुछ दस्तावेजों की ऐसी सत्यापित प्रति-लिपियों की माँग की जो न्यायालय में न्यायिक दस्तावेजों के रूप में स्वीकार्य हों। यही नहीं, चूँकि आयोग के साथ अभी तक हुए अपने अनुभवों के आधार पर मेरा निष्कर्ष यह रहा है कि पारदर्शिता के धरातल पर आयोग कार्यालय कतई अविश्वसनीय प्रमाणित हुआ है; मैंने अपने इस आवेदन के साथ ही सत्यापित प्रतिलिपियों के वैधानिक शुल्क के अग्रिम भुगतान के रूप में पचास रुपये कीमत का एक भारतीय पोस्टल ऑर्डर भी जमा करा दिया था। ऐसा इसलिए कि अयोग के पास टाला-मटोली या बहाने-बाजी का कोई अवसर शेष नहीं रहे।

आवेदन में माँगे गये दस्तावेजों की सत्यापित प्रति-लिपियाँ तो आयोग की ओर से प्रदान नहीं की गयी लेकिन, उसके उलट, २० नवम्बर २०१५ को उसी प्रकरण की सुनवाई नये सिरे से आरम्भ किये जाने की एक नयी सूचना अवश्य आयोग ने मुझे भेज दी। मेरे ज्ञान में, न्यायिक इतिहास का यह पहला अवसर था जब न्यायिक निराकरण का संवैधानिक अधिकार प्राप्त कोई पीठ किसी प्रकरण में अपना अन्तिम निराकरण आदेश परित कर देने के बाद, स्वत: प्रेरित और/अथवा स्फूर्त हो कर उसी प्रकरण की सुनवाई को नये सिरे से आरम्भ करने वाली थी।

ऐसी अनोखी परिस्थिति में, १७ नवम्बर २०१५ को मैंने आयोग में एक आवेदन प्रस्तुत किया जिसमें आयोग से १९ मई २०१५ के अपने आवेदन के माध्यम से चाहे गये दस्तावेजों के साथ ही, बिना किसी छिपाव-दुराव के, उन समस्त तथ्यों व परिस्थितियों के सम्पूर्ण ज्ञान व दस्तावेजी प्रमाण उपलब्ध कराने की भी माँग की जिनके कारण आयोग ने (१) मेरी सम्बन्धित दूसरी अपील का अन्तिम निराकरण उज्जैन की अपनी लोक अदालत में कर दिया गया था तथा (२) लोक अदालत में निराकृत किये जा चुके मेरे उसी प्रकरण की अब नये सिरे से सुनवाई करने का निर्णय था। आवेदन में जहाँ मैंने यह लिखा था कि उक्त परिस्थितियों में यह मेरा विधि-सम्मत प्राकृतिक अधिकार है कि नये सिरे से आरम्भ की जाने वाली मेरे प्रकरण की इस सुनवाई से पूर्व आयोग मुझे इन सभी तथ्यों तथा परिस्थितियों से अवगत्‌ कराये वहीं मैंने उससे यह माँग भी की कि जब तक मुझे समस्त वांछित जानकारी उपलब्ध नहीं करा दी जाती है, आयोग की सुनवाई स्थगित रखी जाये।

यहाँ यह उल्लेख करना अन्यथा नुक्ता-चीनी करना नहीं है कि २० नवम्बर की सुनवाई की तिथि के स्थान पर मैंने अपना उपर्युक्त आवेदन १७ नवम्बर को ही, अग्रिम रूप से, लगा दिया था। मैंने ऐसा इसलिए किया था क्योंकि मुझे लगा था कि अपने वैध अधिकारों की वैधानिक रक्षा के अपने प्राकृतिक अधिकार को सुरक्षित करने के लिए मेरा ऐसा करना आवश्यक था। इसका प्रत्यक्ष लाभ भी मुझे मिला — सुनवाई की तिथि को आगे बढ़ाने का मेरा आवेदन मेरी प्रकरण-नस्ती में बाकायदा दर्ज हो गया। और जब, तमाम शंका-कुशंका से घिरा हुआ, २० नवम्बर को मैं आयोग के निर्धारित सुनवाई-कक्ष पहुँचा तो सुनवाई की प्रक्रिया के आरम्भ होने के पहले ही मुझे सूचित किया गया कि मेरे प्रकरण की सुनवाई स्थगित की जा चुकी है। और, सुनवाई की अगली तिथि की सूचना मुझे लिखित रूप से दे दी जायेगी।

रोचक यह है कि सुनवाई बढ़ जाने की सूचना देने वाले अधिकारी ने लगे हाथों प्रपत्र जैसा एक कागज थमाया था जिसमें मुझसे चाहा गया था कि मैं यह भर कर दे दूँ कि मुझे वांछित जानकारी मिल चुकी है, नहीं मिली है, अपूर्ण मिली है या मैं सन्तुष्ट हूँ या फिर असन्तुष्ट हूँ? आयोग की प्रक्रिया से सालों से परिचित रह चुकने के कारण आयुक्त सुखराज सिंह के कोर्ट में उपयोग में लिये जाने वाले इस सर्वथा अनोखे प्रपत्र ने मुझे अचम्भित कर दिया था। निहितार्थ अनेक हो सकते हैं। विशेष रूप से इसलिए भी कि जब मैंने आयुक्त महोदय के उक्त मातहत से उस प्रपत्र की एक प्रति रिकार्ड हेतु अपने साथ ले जाने के लिए माँगी तब उन्होंने बिल्कुल सपाट लहजे में उसे देने से मना कर दिया था।

(२१ नवम्बर २०१५)