यथार्थ में भारत-वंशी हैं आज के अधिकांश यूरोपीय

Atithi-Vichar

बीती ५ दिसम्बर को भोपाल में धर्मपाल शोध-पीठ, मध्य प्रदेश ने अपने तत्वावधान में आमन्त्रित अतिथियों के बीच एक अनौपचारिक बात-चीत का आयोजन किया था। वैश्विक ताकतों की स्व-हितैषी नीति के विशेष परिप्रेक्ष्य में विशेष रूप से भारतीय हितों को संरक्षित करने के लिए विभिन्न व्यक्तियों तथा स्थानीय संगठनों को बौद्धिक रूप से सचेत और सक्रिय करने की नीयत से आयोजित इस बात-चीत में एक विषय यह भी उठा था कि ‘बेहतर नस्ल’ होने का यूरोपीय दावा कितना खोखला है।

क्योंकि औसत पठन-पाठन तक ही अपनी पहुँच सीमित रख पाने वाला औसत भारतीय, असत्य इतिहास-लेखन और इस मानसिकता से लिखी तथा प्रकाशित की गयी पुस्तकों के प्रभाव में, इस खोखले दावे से पर्याप्त प्रभावित है; इस बात-चीत में इस मिथक पर भी चर्चा हुई कि कथित ‘यूरोपीय नस्ल’ सभ्यता-विकास के क्रम में आखिर किस मूल से जुड़ी है। धर्मपाल शोधपीठ, म० प्र० की निदेशक डॉ० कुसुमलता केडिया ने इस सन्दर्भ में अपना निम्न आलेख हमें प्रेषित किया है —

आधुनिक पुरातात्विक और वैज्ञानिक खोजों के आधार पर यूरोप में यह तथ्य सामने आ रहे हैं कि अतीत में शक्ति-शाली रहे यूरोप के सभी समूह वस्तुत: भारत-वंशी थे। यह भारत के पश्चिमोत्तर क्षेत्र में शताब्दियों तक प्रभाव-शाली रहने वाले वे भारतीय क्षत्रिय थे जो वहाँ से ही, अपने शक्ति-बल का प्रदर्शन करते हुए, ये यूरोप में फैले थे।

पिछले दिनों अटलबिहारी वाजपेयी हिन्दी विश्वविद्यालय में वंश-लेखकों के एक अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन हुआ था। इसमें इंग्लैण्ड, फ्रांस सहित अनेक यूरोपीय देशों का भ्रमण कर चुके कई महत्व-पूर्ण भारतीय वंश-लेखकों के साथ ही देश के प्रत्येक क्षेत्र से परम्परागत्‌ वंश-लेखकों का एक वृहद् समूह सह-भागी हुआ था। इसमें वंश-लेखकों ने बताया कि किस प्रकार यूरोप में रह रहे ड्यूड, बल्गार, केल्त, हूण, हंगार, जर्मेन आदि अनेक समूह भारत आते हैं और यहाँ अपने मूल की खोज के प्रयास करते हैं। कई भारतीय वंश-लेखकों ने बताया कि उनके पास ऐसे अनेक घरानों की पीढ़ी दर पीढ़ियों के दस्तावेज हैं और उनमें यह तथ्य अंकित है कि उनमें से कुछ के वंशज समय-समय पर किस प्रकार इंग्लैण्ड, आयरलैण्ड, स्वीडन, फ्रांस, जर्मनी, स्विट्जरलैण्ड आदि में जाकर बसे। जिन्हें यूरोप में जट या जूट कहा जाता है उनका सम्बन्ध भारतीय जट्ट या जाटों से है, यह तथ्य जाटों के इतिहास में अंकित है। इसी तरह हूण नामक एक क्षत्रिय जाति के वंश का अभिलेख राजस्थान के चारणों के पास है। टॉड ने भी राजपूताने के इतिहास में यह तथ्य लिखा है कि हूण एक भारतीय क्षत्रिय जाति माने जाते हैं।

दूसरी ओर विगत डेढ़ शताब्दियों तक साम्राज्य-वादियों के द्वारा अचानक विश्व के अनेक देशों में थोड़े समय के लिए सफलता पाने के दौरान नस्लवाद का प्रचार किया गया। यह कहा जाने लगा कि यूरोपीय व्यक्ति एक भिन्न नस्ल के हैं। इसी के साथ, ऐसे दावे भी बहुत किये गये कि यह कथित यूरोपीय नस्ल एक श्रेष्ठतर नस्ल है, और इस कारण से, यह नस्ल विश्व पर आधिपत्य करने और उसका मार्ग-दर्शन करने का नैसर्गिक अधिकार रखती है। इसी दावे को आधार बना कर व्हाइट मैन्स बर्डन’ (अर्थात्‍ दायित्व का भार सफेद चमड़ी वालों पर है) जैसी निहित-स्वार्थी धारणा वह भी फैलायी गयी जिसमें सफेद चमड़ी वालों को कहा गया कि प्रकृति ने उन्हें दुनिया भर की दूसरी चमड़ी वाले व्यक्तियों पर शासन करने का अधिकार दिया है। परन्तु, विज्ञान और पुरातात्विक खोजों में हुई प्रगति के कारण, अब स्वयं यूरोप में ही यूरोपीय व्यक्तियों के मूल पूर्वजों की खोजें तेजी से की जा रही हैं। और, ऐसी खोजें मुख्यत: उनके एशियाई मूल के होने की ओर संकेत कर रही हैं। इस प्रकार, नस्लवाद का सारा यूरोपीय ठाठ अब बिखर रहा है क्योंकि यदि एशियाई लोगों का उल्लेखनीय समूह ही यूरोप में जा कर बसा था तब फिर यह कहना अर्थ-हीन हो जाता है कि ‘पूरब, पूरब है जबकि पश्चिम, पश्चिम; और इसलिए, दोनों कभी मिल नहीं सकते हैं।’

यूनिवर्सिटी कॉलेज, लंदन के पीटर हीदर ने दि पीपुल्स ऑफ़ यूरोप’ नामक शृंखला में ‘गोथों’ का इतिहास लिखा है। ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय द्वारा भी पीपुल्स ऑफ़ यूरोप’ सीरीज़ पर काम किया जा रहा है। जेम्स कैम्पबेल और बैरी क्यूनलिफ़ इस पूरी शृंखला के प्रधान सम्पादक हैं। शृंखला में अब तक हूणों, गोथों, मंगोलों, जिप्सियों तथा आरम्भिक जर्मनों और लम्बार्डों, ब्रेटनों, फ़्रेंकों आदि पर अलग-अलग खण्ड प्रकाशित हो चुके हैं। कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से भी हूणों से यूरोप के उद्भव के सम्बन्ध पर ह्यून जिन किम की एक पुस्तक प्रकाशित हुई है। इस प्रकार, ये सारे प्रयास यह तथ्य बताते हैं कि आधुनिक पुरातात्विक और वैज्ञानिक खोजों के आधार पर यूरोप में ये तथ्य सामने आ रहे हैं कि यूरोप में पहुँचे हुए लोग मूलत: हूण और शक रहे हैं।

‘कम्पलीट हिस्ट्री ऑफ़ दि वर्ल्ड’ (सम्पादक रिचर्ड ओवरी और प्रकाशक हार्पर कॉलिन्स, लन्द; पृष्ठ १०८-१०९) में प्रकाशित मान-चित्र में यह दर्शाया गया है कि ईस्वी सन् के प्रारम्भ से भी बहुत पहले से हूणों के समूह पश्चिमी यूरोप में आ कर बस चुके थे। यद्यपि सम्पादक ने इन्हें ‘जर्मेनिक बस्तियाँ’ कहा है परन्तु सर्व-विदित तथ्य है कि स्वयं जर्मन अपने आप को हूण ही कहते रहे हैं। इन हूणों के ही एक प्रतापी पुरुष को पहले ‘हर्मेन’ और फिर ‘जर्मेन’ कह कर उसके ही वंशजों को ‘जर्मेनिक’ कहा गया। यह एटलस अनेक तीरों के संकेत द्वारा यह दर्शाता है कि एशियाई क्षेत्र से उनके हूण और अबार, गोथ, विसिगोथ, स्लाब, जट, ब्रेटन, एंगिल्स आदि समूह किस प्रकार आ कर पश्चिमी यूरोप में बसे थे। सम्पादक यह तो कहते हैं कि ये लोग ठीक-ठीक किस स्थान से आये यह सुनिश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता है परन्तु वे जो संकेत देते हैं वह अवश्य मध्य एशिया और एशियाई रूस के क्षेत्र की ओर जाता है।

दि रिवेन्ज़ ऑफ़ ज्यॉग्रफ़ी’ के लेखक राबर्ट कप्लान (रेण्डम हाउस; न्यूयॉर्क) का कहना है कि यूरोप के राष्ट्र-राज्यों का उदय वस्तुत: एशियाई राज्यों और समूहों के आक्रमण से अपनी रक्षा के क्रम में हुआ था। वह यह भी बतलाते हैं कि वस्तुत: यूरोप की नियति ऐसी प्रतीत होती रही है कि मानो प्रथम सहस्त्राब्दी में जर्मनों यानी हूणों द्वारा शासित होना ही यूरोप की नियति रही थी। (भूमिका; पृष्ठ – १७)

इसी पुस्तक में लेखक ने यह भी दर्शाया है कि प्रशान्त महासागर से कैस्पियन सागर तक, कहीं-कहीं उससे आगे भी, और दोनों के मध्य क्षेत्र के उत्तर तथा दक्षिण में घास का एक विस्तृत और विशाल मैदान है, जहाँ सभ्यता के प्रारम्भ से ही हूणों, मंगोलों और शकों (सीथियन्स) के राज्य रहे हैं। कम से कम, ईस्वी सन् के प्रारम्भ से तो इनके राज्य रहे ही हैं। अतीत के रोमन साम्राज्य में भी आधे राजा शकों के वंशज ही थे और रोमनों के सेनाध्यक्ष, कोषाध्यक्ष तथा वरिष्ठ बड़े अधिकारी शक एवं हूण ही होते रहे हैं। यूरोपीय इतिहास यह भी बतलाता है कि रोमन साम्राज्य को शक सम्राट अतिबल (अत्तिला) ने पराजित किया था।

इन सब तथ्य रूपी मणियों को यदि एक सूत्र में पिरोयें तो निम्न तथ्य हमारे सामने उभर कर आते हैं —

१.   यूरोप के यह सभी शक्ति-शाली समूह वस्तुत: भारत-वंशी हैं। जो जट अर्थात्‌ जाट और शक, हूण आदि हैं। ये सभी समूह भारत के पश्चिमोत्तर क्षेत्र में शताब्दियों तक प्रभाव-शाली भारतीय क्षत्रिय रहे हैं और वहाँ से ही, अपने शक्ति-बल का प्रदर्शन करते हुए, ये यूरोप में फैले थे।

२.   यह हूण आदि वे ही भारत-वंशी क्षत्रिय हैं जिनका उल्लेख वाल्मीकि रामायण में ‘महर्षि वशिष्ठ की गऊ अर्थात्‌ गाय की रक्षा के लिए उत्पन्न क्षत्रियों’ के रूप में हुआ है।

३.   महाभारत में भी शकों, हूणों, दरदों, बाह्लीकों, तुरुषकों आदि को भारतीय क्षत्रिय ही बताया गया है। इन सभी क्षत्रिय सम्राटों ने महाभारत युद्ध में भाग लिया था।

४.   यह भारत-वंशी समूह आज भी महाकाल की उपासना करते हैं। आराध्य महाकाल का एक चित्र ‘कुबलई खान’ नामक पुस्तक में दिया भी गया है।

५.   इन सभी शकों और हूणों के आराध्य देव देवराज इन्द्र, भगवती दुर्गा और महाकाल हैं।

६.   उन सभी क्षेत्रों में स्थान-स्थान पर गुफाओं और भित्ति-चित्र हैं जिनमें शेष-शायी विष्णु, भगवान शिव, सिंह-वाहिनी दुर्गा, चतुर्मुख ब्रह्मा और श्री गणेश तथा कुमार कार्तिकेय के चित्र उसी शैली में उकेरे गये हैं, जैसे अजन्ता में।

७.   इसके पूर्व भी पणि, द्रह्यु आदि क्षत्रिय एवं व्यापारी समूह यूरोप के विभिन्न क्षेत्रों में जाकर प्रभाव विस्तार करते रहे हैं। ड्रयूड पुरोहित वस्तुत: द्रह्यु पुरोहित ही रहे हैं।

इस प्रकार स्पष्ट होता है कि यह सब भारत-वंशी समूह हैं। धुँधली ही सही, यूरोप में जिन भारत-वंशी व्यक्तियों की स्मृतियाँ अभी भी शेष हैं, वे सब भी अब अपनी जड़ों को धीरे-धीरे भारत में ढूँढ़ रहे हैं। इस दृष्टि से, भारतीय वंश लेखकों का योग-दान अतुलनीय हो सकता है क्योंकि वे ही इन्हें इनके मूल कुलों और उनकी वास्तविक जड़ों से सम्बद्ध कर सकते हैं। और जब इन्हें अपने मूल उद्गम और कुलों का ज्ञान हो जायेगा और वे भारत से अपने सम्बन्ध को स्पष्ट रूप से जान जायेंगे तब १९ वीं शती ईस्वी के उत्तरार्ध से लगा कर सम्पूर्ण २० वीं शती ईस्वी में जो एक काल्पनिक नस्ल-वाद फैलाया गया और उसके सहारे जो यह मिथक रचा गया कि पूर्व, पूर्व है और पश्चिम, पश्चिम जिस कारण से यह दोनों परस्पर नितान्त भिन्न और विपरीत हैं; वह स्वत: ही टूट जायेगा। वैसे भी, स्वयं यूरोप में ही, इस विषय में अब निरन्तर शोध और अध्ययन हो रहा है। अनेक प्रामाणिक पुस्तकें भी उपलब्ध हो चुकी हैं। वंश लेखकों की अक्षुण्ण परम्परा के महान्‌ पुरुषार्थ के फल-स्वरूप इन सभी भारत-वंशी यूरोपीय जनों को अपने भारत-वंशी मूल का ज्ञान हो जायेगा।

(३० दिसम्बर २०१५)