फिर से फन उठाता खेसारी का जहर

Sarokar

आधी-अधूरी और अपुष्ट सूचनाएँ उपलब्ध करा खेसारी दाल की खेती को कानूनी मान्यता देने की खबर है। खबर के साथ सोचे-समझे कुतर्क फैलाये जा रहे हैं। खेसारी से जिनके व्यापारिक स्वार्थ जुड़े हैं उनके द्वारा भी, कुछ तथा-कथित कृषि-विज्ञानियों द्वारा भी और शासन-प्रशासन तन्त्र से जुड़े निहित स्वार्थी तत्वों द्वारा भी।

इण्डियन काउन्सिल ऑफ़ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) के हवाले से आई एक खबर ने प्रिण्ट तथा इलेक्ट्रोनिक मीडिया में बराबरी से हल-चल मचा दी है। खबर है कि आईसीएमआर ने, स्वास्थ्य विज्ञानियों के बीच भयंकर रूप से नुकसान-देह मानी जा चुकी, खेसारी दाल को स्वास्थ्य के लिए पक्की तौर पर सुरक्षित घोषित करते हुए उसकी खेती पर लगे प्रतिबन्ध को उठाने की सिफारिश की है।

दुर्भाग्य की बात है कि आईसीएमआर ने आधी-अधूरी और अपुष्ट वैज्ञानिक सूचनाएँ उपलब्ध करा कर देश के शासन-प्रशासन को बरगलाने का दुष्प्रयास किया है। और, निहित स्वार्थी घटकों ने उसके इस प्रयास का अपने पक्ष में यथा-सम्भव दोहन कर लेने की जुगतें भी भिड़ानी आरम्भ कर दी हैं। कोई अचरज नहीं कि इस सिफारिश के पीछे इन्हीं निहित-स्वार्थी पक्षों की बरसों से काम करती आ रही लॉबी ने अपनी भूमिका अदा की हो। यही नहीं, क्योंकि देश के राजनैतिक मुखिया भी इसमें अपनी भलाई देख रहे हैं, वे भी अपने-अपने निहित-स्वार्थी कुतर्कों को फैलाते पाये जाने लगे हैं।
Lathyrus sativus (Khesari dal) plant
इस सब के बीच महत्व-पूर्ण खबर यह भी है कि फुड सेफ्टी एण्ड स्टैण्डर्ड अथॉरिटी ऑफ इण्डिया (एफएसएसएआई) ने निर्णय लिया है कि वह अपने स्तर पर, स्वतन्त्र रूप से, पहले यह जाँचेगी कि खेसारी मानव-खाद्य के लिए सच में सुरक्षित है या नहीं? उसका कहना है कि अपने इस मूल्यांकन के बाद ही वह खेसारी की खेती पर से प्रतिबन्ध उठाने की इण्डियन काउन्सिल ऑफ एग्रिकल्चर रिसर्च (आईसीएआर) तथा आईसीएमआर की अनुसंशाओं को अपनी सहमति देगी।
Lathyrus sativus (Khesari dal)
जैसा कि हमारे देश में सदा से होता आया है, एफएसएसएआई पर प्रत्यक्ष-परोक्ष दबाव बढ़ाने का घ्रणित खेल भी आरम्भ हो गया है। वायदा बाजार के आसरे देश में दालों की क्रत्रिम रूप से फैलायी गयी कमी को खेसारी के सहारे दूर कर पाने का कुतर्क इस खेल का ऐसा आसान हथियार है जिससे औसत भारतीय बिना सोचे-विचारे तत्काल प्रभावित होगा। यह एक ऐसा हथियार है जिसका सहारा ले कर जन मानस को खेसारी के पक्ष में आसानी से उद्वेलित किया जा सकेगा। और तब, जन-दबाव की आड़ ले, खेसारी पर प्रतिबन्ध को उठाने की विवशता दिखाना बहुत सरल हो जायेगा। वहीं दूसरी ओर, यह एक ऐसा हथियार भी है जिसे स्वास्थ्य-विज्ञान के ठोस तर्कों से काट पाना केवल इस कारण कठिन होगा क्योंकि छलावे वाले इस हथियार के साथ उसका कोई ठोस वैज्ञानिक तर्क कभी रखा ही नहीं जायेगा। कठिन इसलिए नहीं कि खेसारी को मानव-खाद्य के रूप में प्रयोग करने का विरोध करते वैज्ञानिक तर्कों में कोई धार नहीं है; बल्कि इसलिए कि आम आदमी तक न तो इन वैज्ञानिक तथ्यों की पहुँच सम्भव होगी और ना ही देश का औसत नागरिक इन तथ्यों को, उनकी वास्तविक गहराई में उतर कर, समझ पाने की योग्यता रखता है।

इसी बीच लोक जन-शाक्ति पार्टी के अध्यक्ष और केन्द्रीय खाद्य तथा नागरिक आपूर्ति मन्त्री रामविलास पासवान ने यह वक्तव्य दे कर राज-नेताओं के झूठे चरित्र का गुब्बारा हवा में उछाल दिया है कि वे बीते पन्द्रह सालों से नियमित रूप से खेसारी दाल का सेवन करते आये हैं और उन्होंने पाया है कि मानव-खाद्य के रूप में खेसारी पूरी तरह से ‘सुरक्षित’ है।

रामविलास पासवान किस दुनिया में रहते हैं यह तो मैं नहीं जानता लेकिन मैं इतना अवश्य जानता हूँ कि देश का आम आदमी मूर्खों की दुनिया में बिल्कुल नहीं रहता है।

पासवान भूल रहे हैं कि, अतीत में, देश की संसद में वह स्वयं खेसारी की खेती को पूरी तरह से प्रतिबंधित करने की वकालत कर चुके हैं। वह भी, पूरे जोर-शोर से।

लेकिन, तब यह विरोध उन्होंने शायद इसलिए किया था क्योंकि तब वह महज सांसद के लिए आबण्टित सीट पर पाये जाते थे और उन दिनों खुद को दलितों और गरीबों का उभरता हुआ मसीहा साबित करने का प्राण-पण से प्रयास कर रहे थे। मुझे लगता है कि उनके बर्ताव में आज का यह बदलाव इसलिए आया है क्योंकि यह मान कर चल रहे हैं कि अब तो वह दलितों तथा दुखियारे गरीबों के स्थापित नेता बन चुके हैं। उनके चरित्र में यह बदलाव सम्भवत: इसलिए भी आया होगा कि खेसारी-समर्थक ताजे वक्तव्य वाले उनके चारित्रिक बदलाव से, सत्ता-सुख के सदा भरे रहने वाले सकोरे पर, उनकी पकड़ को भर-पूर मदद मिलेगी।

(२६ जनवरी २०१६)