खेसारी की खेती को कानूनी मंजूरी का मतलब जन-स्वास्थ्य से छलावा

Sarokar

खेसारी का जहर नये सिरे से फन उठा रहा है। इसे कुचलना ही होगा। नहीं तो, ऐसा अनर्थ होगा जिससे मुक्ति की कोई राह कभी नहीं ढूँढ़ी जा सकेगी। एक अनर्थ को रोक सकने की तन्त्र की असमर्थता उस अनर्थ को सामाजिक और कानूनी मान्यता देने की अपनी बद-नीयती को जायज कैसे ठहरा सकती है?

इण्डियन काउन्सिल ऑफ़ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) के हवाले से आई एक खबर ने प्रिण्ट तथा इलेक्ट्रोनिक मीडिया में बराबरी से हल-चल मचा दी है। खबर है कि आईसीएमआर ने, स्वास्थ्य विज्ञानियों के बीच भयंकर रूप से नुकसान-देह मानी जा चुकी, खेसारी दाल को स्वास्थ्य के लिए पक्की तौर पर सुरक्षित घोषित करते हुए उसकी खेती पर लगे प्रतिबन्ध को उठाने की सिफारिश की है।

दुर्भाग्य की बात है कि आईसीएमआर ने आधी-अधूरी और अपुष्ट वैज्ञानिक सूचनाएँ उपलब्ध करा कर देश के शासन-प्रशासन को बरगलाने का दुष्प्रयास किया है। और, निहित स्वार्थी घटकों ने उसके इस प्रयास का अपने पक्ष में यथा-सम्भव दोहन कर लेने की जुगतें भी भिड़ानी आरम्भ कर दी हैं। कोई अचरज नहीं कि इस सिफारिश के पीछे इन्हीं निहित-स्वार्थी पक्षों की बरसों से काम करती आ रही लॉबी ने अपनी भूमिका अदा की हो। यही नहीं, क्योंकि देश के राजनैतिक मुखिया भी इसमें अपनी भलाई देख रहे हैं, वे भी अपने-अपने निहित-स्वार्थी कुतर्कों को फैलाते पाये जाने लगे हैं।

देशी खबरों के संसार में खेसारी दाल (लेथाइरस सेटाइवस) के तपेले में जिस प्रकार एकदम नये सिरे से उबाल आ रहा है उसे देख कर जहाँ पुरानी पीढ़ी के लोगों के बीच यह सवाल उठना सहज-स्वाभाविक है कि स्थापित हो चुके एक जहरीले खाद्य को लोगों की रसोई तक पहुँचाने की इतनी हाय-तौबा आखिर किसलिए? वहीं नयी पीढ़ी के लोगों के बीच उत्सुकता का केन्द्र इस सवाल पर टिका है कि खेसारी के मानव-खाद्य के रूप में ‘पूरी तरह से सुरक्षित होने’ के नित नये आ रहे ‘दावों’ में ऐसे क्या खोट हैं जो, उन्हें सिरे से नकारते हुए, इसकी खेती को प्रतिबन्धित रखना ही होगा?

पीढ़ियों के अन्तर से उठे यह दोनों सवाल सरसरे तौर परस्पर विपरीत भले लगते हों, लेकिन यथार्थ में तो, दोनों एक-दूसरे के इतने पूरक हैं कि इनमें से किसी एक का भी पूरी ईमान-दारी से भरा जवाब, स्वत: ही, दूसरे के समूचे यथार्थ से परिचय करा देगा।

क्योंकि, पुरानी पीढ़ी के लोग खेसारी को खाने से होने वाले भयावह नुकसान से जुडी अतीत की उस बहस के गवाह रहे हैं, खेसारी के इन नुकसानों के इतिहास और भूगोल से कतई अनभिज्ञ नई पीढ़ी की उत्सुकता से जुड़े पक्ष से ही शुरुआत करना अधिक उचित रहेगा।

यों, खेसारी दाल (अर्थात्‌ तिवड़ा) से जुड़े ज्ञान-विज्ञान के धरातल पर, केन्द्रीय खाद्य तथा नागरिक आपूर्ति मन्त्री रामविलास पासवान किसी भी स्तर की किसी समझ के अधिकृत दावेदार नहीं हैं लेकिन ताजी हवा में भागीदारी के लिए उन्होंने एक वक्तव्य ठोंक दिया है कि वे बीते पन्द्रह सालों से नियमित रूप से खेसारी दाल का सेवन करते आये हैं और उन्होंने पाया है कि मानव-खाद्य के रूप में खेसारी पूरी तरह से ‘सुरक्षित’ है। और, जिन व्यक्तियों ने खेसारी से जुड़े विभिन्न वैज्ञानिक पक्षों को कभी सुना ही नहीं है उनके लिए पासवान का यह वक्तव्य बड़ा महत्व रखता है। इसलिए उस वक्तव्य की जमीनी सचाई की समीक्षा लगे हाथों कर लेने में भलाई ही है।

खेसारी के सुरक्षित खाद्य होने के पासवान के इस दावे को मौटे तौर पर तीन धरातलों पर तौला जाना चाहिए —

पहला यह कि, अतीत में, वह स्वयं खेसारी की खेती को पूरी तरह से प्रतिबन्धित करने की वकालत पूरे जोर-शोर से करते दर्ज हो चुके हैं। वह भी राजनीति की किसी नुक्कड़-सभा में नहीं बल्कि देश की संसद में। लेकिन हाँ, तब यह विरोध उन्होंने शायद इसलिए किया था क्योंकि तब वह महज सांसद के लिए आबण्टित सीट पर पाये जाते थे और उन दिनों खुद को दलितों और गरीबों का उभरता हुआ मसीहा साबित करने का प्राण-पण से प्रयास कर रहे थे। उनके बर्ताव में आज का यह बदलाव इसलिए आया होगा क्योंकि वे यह मान कर चल रहे हैं कि अब तो वह दलितों तथा दुखियारे गरीबों के स्थापित नेता बन चुके हैं। उनके चरित्र में यह बदलाव सम्भवत: इसलिए भी आया होगा क्योंकि खेसारी-समर्थक ताजे वक्तव्य वाले उनके चारित्रिक बदलाव से, सत्ता-सुख के सदा भरे रहने वाले सकोरे पर, उनकी पकड़ को भर-पूर मदद मिलेगी।

दूसरा यह कि खेसारी और एक खास तरह के लँगड़ेपन (स्पास्टिक पैराप्लीजिया ऑफ़ लोअर लिम्ब यानि लेथाइरिज़्म) के बीच परस्पर सम्बन्ध होने के तथ्य न केवल आधुनिक विज्ञान में बल्कि आयुर्वेद के दो प्राचीन ग्रन्थों तक में बाकायदा दर्ज हैं। भाव प्रकाश निघण्टू और माधव निदान नामक इन प्रसिद्ध ग्रन्थों में खेसारी को ‘त्रिपुटा’ और उससे होने वाली बीमारी को ‘कलायखञ्ज कहा गया है।

एक तीसरा पक्ष और भी है। इसके अनुसार, मन्त्री जी आज के जिन तथा-कथित विज्ञानियों और उनके किये दावों के समर्थन में अपना मन-गढ़न्त और सरासर असत्य दावा कर गये हैं, स्वयं उनका सार है कि हाल ही में खेसारी की कुछ ऐसी ‘ताजा’ किस्में खोजी गयी हैं जिनमें खेसारी का विषैला तत्व मौजूद तो है किन्तु उसकी मात्रा ‘न्यूनतम्‌’ है!

Lathyrus sativus (Khesari dal) plant

क्योंकि, न्यूनतम्‌ विष नाम की यह छछूंदर खेसारी घोटाले की महत्व-पूर्ण कड़ी है, कड़ियों के इसी छोर से बात को आगे बढ़ाना उचित होगा। अतीत में एक बार और भी ऐसी ही एक छछूंदर, मीडिया के माध्यम से, आम आदमी के बीच छोड़ी गयी थी। केवल और केवल नुकसान-देह खेसारी को स्वीकृति दिलाने की नीयत से। तब भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद्‌ (आईसीएआर) ने दिल्ली के अपने पूसा केन्द्र के माध्यम से दावा किया था कि उसने नुकसान-कारी खेसारी दाल की ऐसी परिष्कृत किस्म विकसित की है जिसमें विषैले तत्व की मात्रा केवल ०.२४ प्रतिशत्‌ ही है। आम तौर पर उपयोग में लायी जाने वाली सरल भाषा में इस विष को बीटा ऑक्ज़ेलिल अमीनो एलानाइन (बीओएए) के नाम से पुकारा जाता है। क्योंकि प्रचलित खेसारी की सामान्य किस्मों में, औसतन, तीन से पाँच प्रतिशत्‌ तक बीओएए पाया जाता रहा है पूसा-२४ नाम की घोषित हुई यह नयी किस्म सच में ‘बहुत कम’ विषैली रही होनी चाहिए। ‘रही होनी चाहिए’ इसलिए क्योंकि जब पूसा जा कर मैंने, खेतों में वास्तविक प्रयोग के लिए, इस किस्म के बीजों के नमूनों की माँग की तब बड़े खेद-प्रकाश के साथ सूचित किया गया कि संस्थान के पास, प्रायोगिक उपयोग हेतु देने के लिए, पूसा-२४ का एक बीज भी मौजूद नहीं है। बात बीती सदी के अस्सी वाले दशक के आरम्भिक सालों की है।

चौंकाने वाले इस अनपेक्षित खुलासे से मेरी तलाश इस दिशा में मुड़ी कि यदि पूसा-२४ की इस किस्म के कोई प्रयोग किन्हीं अधिकृत प्रायोगिक खेतों में कभी हुए हों तो उनके परिणामों की रपट ही पा ली जाये। काफी खोज-बीन के बाद ऐसे कुछ दस्तावेज मेरे हाथ लग भी गये। इन दस्तावेजों से खुलासा हुआ था कि देश के स्थापित पाँच विश्व-स्तरीय कृषि-संस्थानों में पूसा-२४ की फील्ड ट्रायल में पाया गया कि मूल बीज से आरम्भ कर क्रमिक रूप से तीसरी फसल लिए जाने पर खेसारी की इस कथित न्यूनतम्‌ विषैली किस्म पूसा-२४ की जो फसल काटी गयी उसमें जहरीले बीओएए का प्रतिशत्‌ ०.२४ से बढ़ कर ३.५% से ५.५% तक पहुँच गया था!

संक्षेप में, उत्तरोत्तर अगली फसलों में खेसारी के घातक विष के लगातार बढ़ते जाने की इस चौंकाने वाली खबर ने पूसा के पास, स्वयं अपनी ही विकसित किस्म का, एक भी बीज मौजूद नहीं होने का खुला स्पष्टीकरण उपलब्ध करा दिया था। आईसीएआर आज जिन तीन विकसित किस्मों का दावा कर रहा है उनका भविष्य भी इससे भिन्न कभी नहीं रहेगा। गेहूँ से लगा कर खेतिहर पैदावार में लगने वाले किसी भी ‘उन्नत’ बीज को प्रयोग करने वाला औसत से औसत किसान भी इस तथ्य की पुष्टि कर देगा। जहाँ इसके विशुद्ध वैज्ञानिक तर्क व आधार उन्नत मास्टर बीज को बनाने की प्रक्रिया में निहित हैं वहीं यह भी उतनी ही बड़ी वैज्ञानिक सचाई है कि खेतों की मिट्‍टी की जैविक तथा रासायनिक संरचना की भिन्नता भी पुन: अधिकतम्‌ के स्तर तक बढ़ते जाने वाले इस विकार का दूसरा बड़ा कारक होती है। ऐसी कारक, जिस पर किसी का भी कोई नियन्त्रण नहीं होता। कभी हो भी नहीं पायेगा।

Lathyrus sativus_Flower

खेसारी को ले कर परोसे जाने वाले झूठों की फेहरिस्त अन्त-हीन है। जैसे, अपने में मौजूद बीओएए के कारण खेसारी, लाख प्रयासों के बाद भी, जब नुकसान-दायक होने की अपनी सदियों पुरानी पहचान से मुक्ति नहीं पा सकी तो इसको सुरक्षित बताने में जुटी लॉबी ने यह बात फैलाने में एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया कि खेसारी में नुकसान-दायी बीओएए होता ही नहीं है। दावा किया जाने लगा कि, असल में तो, खेसारी में ओडीएपी (ऑक्जेलिल डाईअमीनो प्रोपियॉनिक एसिड) नामक रसायन होता है। यह खेसारी को, पिछले दरवाजे से, लँगड़ा बनाने की जिम्मेदारी से मुक्त कराने का एक सोचा-समझा षडयन्त्र था। बीओएए के खेसारी में पाये जाने तथा इसके लँगड़ा बना देने वाले दुष्प्रभाव पर पर्याप्त ठोस वैज्ञानिक आधारों को इकट्‍ठा कर चुके होने से मेरा चौंकना स्वाभाविक था। तब, आगे की जाँच-पड़ताल से पता चला कि खेसारी-समर्थक लॉबी की सुविधा के लिए, वैज्ञानिकों ने परस्पर मिली-भगत कर, बीओएए को ओडीएपी वाला एक नया नाम दे दिया था।

राजनेताओं की बेबसी तो फिर भी समझी जा सकती है। लेकिन वैज्ञानिकों की…?

कृषि तथा पोषण विज्ञानियों की खेसारी समर्थक लॉबी से मिली-भगत को खेसारी घोटाले की दूसरी महत्व-पूर्ण कड़ी कहा जा सकता है। बिना कोई प्रयोग किये कथित प्रयोग के महत्व-पूर्ण परिणामों को पा लेने से लगा कर अपनी ही रिसर्च से निकले परिणामों को नकार देने तक इस मिली-भगत की एक लम्बी सूची है। और, चोटी के समझे जाने वाले देश के विज्ञानी इसमें शामिल घपले-बाजों के सिर-मौर रहते आये हैं। बीती सदी में अनेक अन्तर्राष्ट्रीय फोरमों में, इन विज्ञानियों की पूरी की पूरी कच्ची कलई उतारी भी जा चुकी है। देश के योजना आयोग में भी ऐसे विज्ञानियों के घिनौने कृत्यों पर अनेक महत्व-पूर्ण अधिकृत दस्तावेज जमा किये जा चुके हैं। उस दौर में खेसारी की कथित शोधों से जुड़ा एक भी नामी-गिरामी विज्ञानी आयोग को सन्तुष्ट नहीं करा पाया था कि खेसारी की खेती या फिर खेसारी का खाना मानव-स्वास्थ्य के लिए पूरी तरह से सुरक्षित है।

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खेसारी को ले कर दशकों तक छिड़ी रही बहस से कतई अन-भिज्ञ नयी पीढ़ी के लिए यह तथ्य चौंकाने वाला होगा कि आज जिस ‘पोषण-विज्ञानी’ डॉ० शान्तिलाल कोठारी का नाम खेसारी की खेती को प्रतिबन्ध से मुक्ति दिलाने वाले ‘हीरो’ की तरह सुर्खियों में है; वह, अपनी तमाम शैक्षणिक योग्यताओं तथा महिमा-मण्डित विशेषज्ञताओं के साथ, बीती सदी में छिड़ी तीखी बहसों के बीच उस समय भी मौजूद थे जब योजना आयोग अपने उपाध्यक्ष डॉ० एमजीके मेनन के निजी दिशा-निदेशन में खेसारी की सचाई को उसकी जड़ तक तलाशने में जुटा हुआ था। लेकिन भूख-हड़ताल की सार्वजनिक धमकियों से आगे, उनके पास ऐसा एक भी ठोस वैज्ञानिक तर्क अथवा तथ्य नहीं था जो आयोग को खेसारी की खेती के पक्ष में सन्तुष्ट करा पाया हो। इसके उलट, कोठारी महाशय आज भी खेसारी की खेती और खेसारी के कारण लँगड़े-पन से प्रभावित व्यक्तियों को ले कर ऐसे-ऐसे कुतर्क देते मिल जाते हैं जिन्हें सुन कर, चिकित्सा, विष-विज्ञान तथा कृषि-विज्ञान के जानकार या तो उनकी नीयत पर नही तो फिर उनकी शैक्षणिक योग्यताओं पर ही प्रश्न-चिन्ह जड़ने को विवश हो जाते हैं।

फिर भी, खेसारी का जहर नये सिरे से फन उठा रहा है। इसे कुचलना ही होगा। नहीं तो, ऐसा अनर्थ होगा जिससे मुक्ति की कोई राह कभी नहीं ढूँढ़ी जा सकेगी। एक अनर्थ को रोक सकने की तन्त्र की असमर्थता उस अनर्थ को सामाजिक और कानूनी मान्यता देने की अपनी बद-नीयती को जायज कैसे ठहरा सकती है? फिर, यह तर्क भी अपने आप में एक छलावा है कि खेसारी आम आदमी को भोजन में प्रोटीन की कमी से मुक्ति दिलायेगी। क्योंकि, यह तथा-कथित मुक्ति उतनी सीधी व सरल नहीं है जितनी कि उसे दर्शाया जा रहा है। दरअसल, खेसारी में ट्रिप्सिन इन्हिबिटर नामक एक विशिष्ट रसायन प्राकृतिक रूप से होता है। यह रसायन शरीर के पाचन-तन्त्र में मौजूद ट्रिप्सिन नामक उस एन्जाइम को अपना काम करने से रोकता देता है जो भोजन में शामिल प्रोटीन को पचाने की क्रिया में अहम्‌ भूमिका निभाता है। सरल शब्दों में इसका इकलौता तात्पर्य यही है कि खेसारी में चाहे जितना भी प्रोटीन क्यों ना हो, सामान्य घरेलू स्थितियों में खायी जाने वाली यहमहान्‌ समृद्ध दाल शरीर के लिए निरी निरुपयोगी ही रहेगी। क्योंकि, शरीर उसके प्रोटीन-भण्डार को ग्रहण ही नहीं कर पायेगा।

वहीं, इस महत्व-पूर्ण सवाल पर भी दावे-दारों ने अपने ओंठ सिले हुए हैं कि समेकित (क्‍यूमिलेटिव, यानि धीरे-धीरे शरीर में इकट्‍ठे हो कर) असर करने वाली खेसारी में ‘नगण्‍य’ जहर का क्‍या मतलब होगा? यहाँ ‘समेकित प्रभाव’ को समझ लेना भी आवश्यक है। इसका मतलब है कि जितना भी यह विष खाया जायेगा, वह पूरा का पूरा, खाने वाले के शरीर में इकट्‍ठा होता जायेगा। अर्थात्‌, खेसारी खाने वाले को एक दिन ऐसा भी देखने को मिल सकता है जब उसके शरीर में एकत्रित हुए इस विष की मात्रा उसके स्वास्थ्य के लिए ‘सुरक्षित’ सीमा-रेखा को लाँघ ले। और इस तरह, वह लेथारिज्म से प्रभावित हो जाये।

सचाई से भरे इस तर्क से बचाव का ब्रह्मास्त्र भी पोषण-विज्ञानियों ने तलाश रखा है। विज्ञान की शोधों के प्रकाशन से जुड़ी प्रसिद्ध पत्रिका लेन्सैट ने गेटाहन एवं उनके सहयोगियों द्वारा अपनी शोध के हवाले से सन्‌ २००३ में लिखे शोध-पत्र का उल्लेख करते हुए जो जानकारी प्रकाशित की है उसका सार है कि नये प्रकार के (सुरक्षित) तिवड़े को खाने वालों को सुरक्षा की केवल कुछ ‘छोटी-मोटी’ शर्तों का पालन करना होगा। और, यह छोटी-मोटी शर्तें क्या हैं? सरल हिन्दी में इन शर्तों का सार यह है कि खाने से पहले तिवड़ा को भिगो कर इतनी देर रखना होगा जिससे उसमें खमीर उठने लगे। उसके बाद, इस खेसारी को एण्टी ऑक्सिडेण्ट वाले बीजों की ग्रेवी में मिलाने और सल्फर अमीनो एसिड वाले अनाजों के साथ मिल कर खाने से, उसको खाने से होने वाले पक्षाघात की सम्भावना ‘कम’ हो जाती है।

स्पष्ट है, खतरे की चेतावनी देने वाले क्लिष्ट तकनीकी और वैज्ञानिक कारण स्वयं वैज्ञानिक दस्तावेजों में ही पर्याप्त मात्रा में सुलभ हैं। फिर भी, तिवड़ा के किसी सुरक्षित प्रकार की खेती की वकालत में जुटी अन्तर्राष्ट्रीय बिरादरी दावा कर रही है कि प्रयोग-शालाओं में तैयार की जाने वाली नये प्रकार की खेसारी, दाने-दाने और पैसे-पैसे को मोहताज गरीब की, प्रोटीन की सारी आवश्यकताओं की पूर्ति तो करेगी ही करेगी, इसका खाया जाना स्वास्थ्य के मान-दण्डों पर सुरक्षित भी रहेगा!

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खेसारी से जुड़े ‘व्यवसाय’ की तह तक जाने पर, किसी भी संशय से परे, यह सचाई उजागर हो जाती है कि बीते अतीत का सारा खेल मिलावट के व्यवसाय का रहा है। हाँ, इस मिलावट के प्रकार अलग-अलग अवश्य रहे हैं। जहाँ ‘नग’ की तरह यह विषैला खाद्य हर सम्भव थाली में जगह बना रहा है वहीं इसको समर्थन देने वाली तथा-कथित विज्ञानियों की पूरी बिरादरी, तथ्यों और तर्कों में सुविधा-जनक मिलावट कर, ‘नगीनों’ की तरह ज्ञान-विज्ञान को कलंकित कर रही है।

इस सब के बीच महत्व-पूर्ण खबर यह भी है कि फुड सेफ्टी एण्ड स्टैण्डर्ड अथॉरिटी ऑफ इण्डिया (एफएसएसएआई) ने निर्णय लिया है कि वह अपने स्तर पर, स्वतन्त्र रूप से, पहले यह जाँचेगी कि खेसारी मानव-खाद्य के लिए सच में सुरक्षित है या नहीं? उसका कहना है कि अपने इस मूल्यांकन के बाद ही वह खेसारी की खेती पर से प्रतिबन्ध उठाने की इण्डियन काउन्सिल ऑफ एग्रिकल्चर रिसर्च (आईसीएआर) तथा आईसीएमआर की अनुसंशाओं को अपनी सहमति देगी।

जैसा कि हमारे देश में सदा से होता आया है, एफएसएसएआई पर प्रत्यक्ष-परोक्ष दबाव बढ़ाने का घृणित खेल भी आरम्भ हो गया है। वायदा बाजार के आसरे देश में दालों की क्रत्रिम रूप से फैलायी गयी कमी को खेसारी के सहारे दूर कर पाने का कुतर्क इस खेल का ऐसा आसान हथियार है जिससे औसत भारतीय बिना सोचे-विचारे तत्काल प्रभावित होगा। यह एक ऐसा हथियार है जिसका सहारा ले कर जन-मानस को खेसारी के पक्ष में आसानी से उद्वेलित किया जा सकेगा। और तब, जन-दबाव की आड़ ले, खेसारी पर प्रतिबन्ध को उठाने की विवशता दिखाना बहुत सरल हो जायेगा। वहीं दूसरी ओर, यह एक ऐसा हथियार भी है जिसे स्वास्थ्य-विज्ञान के ठोस तर्कों से काट पाना केवल इस कारण कठिन होगा क्योंकि छलावे वाले इस हथियार के साथ उसका कोई ठोस वैज्ञानिक तर्क कभी रखा ही नहीं जायेगा। कठिन इसलिए नहीं कि खेसारी को मानव-खाद्य के रूप में प्रयोग करने का विरोध करते वैज्ञानिक तर्कों में कोई धार नहीं है; बल्कि इसलिए कि आम आदमी तक न तो इन वैज्ञानिक तथ्यों की पहुँच सम्भव होगी और ना ही देश का औसत नागरिक इन तथ्यों को, उनकी वास्तविक गहराई में उतर कर, समझ पाने की योग्यता रखता है।

ऐसे में, एफएसएसएआई के सामने परीक्षा की वह कठिन घड़ी उपस्थित हो गयी है जब उसे अपनी निष्पक्ष स्वायत्ता प्रमाणित करने के गम्भीर दायित्व का निर्वाह करना है। बड़ा सवाल तो यह भी है कि क्या एफएसएसएआई ऐसा मंच है भी या नहीं जिसे एक सिद्ध-दोषी फसल के सुरक्षित होने अथवा नहीं होने का कोई प्रमाण-पत्र देने का नैतिक अथवा वैधानिक अधिकार प्राप्त है?

खेसारी न तो बोई जानी चाहिए, न काटी जानी चाहिए और ना ही बेची जानी चाहिए।

(०१ फरवरी २०१६)