म० प्र० राज्य सूचना आयोग का काला सच

Sarokar

जो सूचना आयोग सरकारी तन्त्र में सम्पूर्ण पार-दर्शिता स्थापित करने की इकलौती जिम्मेदारी के लिए गठित हुआ है, वह स्वयं न केवल घोर अ-पारदर्शी है अपितु अ-पारदर्शिता को बढ़ावा देने के नित नये हथ-कण्डे खोजने में भी जुटा है। आयोग ने तो अधिनियम का दुरुपयोग करना तक सीख लिया है।

म० प्र० राज्य सूचना आयोग अपने कार्यालय पहुँचे किसी भी सामान्य व्यक्ति को किसी प्रकरण से सम्बन्धित प्रमाणित प्रति-लिपियाँ नहीं देता। प्रमाणित प्रतियों के अभाव में कोई भी पक्ष-कार अपने प्रकरण को उच्च न्यायालय नहीं ले जा पाता। ऐसे में, यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या आयोग अपनी कार्यवाही से असन्तुष्ट पक्ष-कार के न्याय-प्राप्ति के अधिकार को बाधित करने के लिए ऐसा करता है?

ऐसे ही एक प्रकरण में जब सामाजिक सरोकारों वाली संस्था ‘सजग’ ने मुख्य सूचना आयुक्त श्री के० डी० खान से मुलाकात कर अपनी शिकायत उनके सामने रखी तो यह सच सामने आया। श्री खान ने बतलाया कि आयोग में प्रमाणित प्रति-लिपियाँ प्रदान करने की कोई परिपाटी नहीं है। इस पर जब उनसे कहा गया कि प्रमाणित प्रति-लिपियों के अभाव में कोई उच्च न्यायालय से न्याय की अपील कैसे कर पायेगा तो उनके पास ‘परिपाटी के नहीं होने’ वाली उक्त बात कहने के अलावा कोई अन्य जवाब नहीं था।

हुआ यह कि सामाजिक संगठन सोशियल एण्ड जुडीशियल एक्शन ग्रुप (सजग)  की ओर से उसके अध्यक्ष डॉ० ज्योति प्रकाश ने दिनांक २९ मार्च २०१६ को एक आवेदन आयोग कार्यालय में लगाया और संगठन के एक द्वितीय अपीली प्रकरण की नस्ती से दिनांक २२ मार्च २०१६ की सुनवाई और उससे पूर्व के कुछ दस्तावेजों की प्रमाणित प्रतिलिपियों को देने का निवेदन किया। यही नहीं, आयोग की चारित्रिक धाँधलियों से परिचित होने से उन्होंने, केवल सावधानी के रूप में, आवेदन के साथ ही पचास रुपये के मूल्य का एक पोस्टल ऑर्डर भी संलग्न कर दिया जिससे ‘समय कमाने’ और ‘प्रतिलिपियाँ भेजने में आना-कानी करने’ जैसा कोई आम हथ-कण्डा आयोग के हाथों में नहीं बचे। आवेदन से बिल्कुल स्पष्ट होता है कि आवेदक को क्या चाहिए था और यह सब उसे किस आवश्यकता तथा अधिकार के अन्तर्गत्‌ चाहिए था।

अपने प्रकरण से सम्बन्धित सभी मूल दस्तावेजों की प्रमाणित प्रतिलिपियों की स-शुल्क नकल पाना किसी भी पक्ष-कार का ऐसा वैधानिक अधिकार है जिसको ठुकराने का अधिकार किसी को भी प्राप्त नहीं है। शर्त केवल इतनी होती है कि वांछित नकलें विधानत: देय हों। यह तथ्य न्यायिक तथा अर्ध-न्यायिक प्रक्रिया से प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष अर्थ में जुड़े सभी संस्थानों का प्रत्येक जिम्मेदार अधिकारी जानता है। अति-विशिष्ट होते हुए भी सूचना का अधिकार अधिनियम, २००५ भी अपने आप में सूचना आयोगों को ऐसा कोई अधिकार नहीं देता है कि, अपवाद-स्वरूप ही सही, वह किसी पक्ष-कार को उसके इस वैधानिक अधिकार से वंचित करने की कोई छूट ले सके। यह तथ्य म० प्र० राज्य सूचना आयोग भली-भाँति जानता है। फिर भी क्योंकि, उसे ही बेहतर ज्ञात किन्हीं कारणों से, वांछित दस्तावेजों की प्रमाणित प्रतिलिपियों को देने में उसकी अरुचि थी और इसलिए भी कि वांछित प्रमाणित प्रतिलिपियाँ देने से आयोग को आगे पर्याप्त कानूनी असुविधाएँ होने वाली थीं; आयोग ने स्वेच्छाचारिता दिखलाते हुए सारी स्थापित वैधानिक प्रक्रियाओं को सूली पर टाँग देना श्रेयस्कर माना। और आवेदक को उसके कानूनी अधिकार से वंचित रखा।

Application dated 29 March 2016 for supply of Certified Copiesबाद की परिस्थितियों से उजागर हुआ कि अपनी इस अरुचि या कहिये कि बदनीयती को पूरा करने के लिए आयोग के जिम्मेदार अधिकारियों ने एक अभूत-पूर्व हथ-कण्डा अपनाया। इसके लिए मोर्चा सम्हालने की जिम्मेदारी आयोग के लोक सूचना अधिकारी संजीव पाण्डेय को सौंपी गयी जिन्होंने अपने समस्त बुद्धि-कौशल का प्रयोग करते हुए स्पष्ट रूप से ‘प्रमाणित प्रतिलिपियों’ के आवेदन को ‘सूचना-प्रदाय’ के आवेदन में बदल डाला। वह भी तब जबकि इस आवेदन के साथ आरटीआई के अन्तर्गत्‌ आवश्यक रूप से जमा किया जाने वाला दस रुपयों का विशिष्ट आवेदन शुल्क जमा ही नहीं किया गया था! आयोग के इस स्वनाम-धन्य अधिकारी ने अपने आपको लाल फीता-शाही का मँजा हुआ खिलाड़ी सिद्ध करने में कोई कसर नहीं छोड़ी और, उसके शाश्वत्‌ वैधानिक अधिकार पर टँगड़ी मारते हुए दिनांक ११ अप्रैल २०१६ को आवेदक को पत्र लिख कर सूचित किया —

 

“बिन्दु क्रमांक ०१ के सम्बन्ध में प्राप्त नस्ती अनुसार दिनांक २२/०३/२०१६ के उपरान्त पीठासीन आयुक्त महोदय द्वारा लिखी गयी आदेशिका उपलब्ध न होने से प्रदान किया जाना सम्भव नहीं हो पा रहा है; और

 

बिन्दु क्र० ०२ में उल्लेखित निवेदनों की विशिष्टियाँ स्पष्ट न होने से आवेदन के बिन्दु क्र० ०२ एवं ०३ के सम्बन्ध में अन्तिम आदेश एवं दस्तावेजों की नकल उपलब्ध कराना सम्भव नहीं हो पा रहा है।”

उक्त पत्र को पढ़ने से, बिना किसी संशय के, समझ में आ जाता है कि आयोग की यह स्पष्ट नीयत थी कि प्रमाणित प्रतिलिपियों के निवेदन को सूचना-प्रदाय के आवेदन में बदल कर दस्तावेजी नकलों को देने की बाध्यता को सालों-साल के लिए लटका दिया जाये ताकि, आयोग के दोष-पूर्ण निर्णय को न्यायालयीन चुनौती मिलने की सम्भावना को तब तक के लिए लटकाये रखा जा सके जब तक कि आरटीआई से जानकारी पाने से जुड़ी द्वितीय अपीली निराकरण तक की पूरी प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाये। समूचे घटना-क्रम और इसके पीछे छिपी आयोग की कलुषित मानसिकता से आवेदक चौंका अवश्य लेकिन उक्त पत्र के मिलने के अगले ही दिन उसने एसएमएस से आयोग के मुख्य सूचना आयुक्त श्री के० डी० खान को सजग की ओर से एक सन्देश भेजा जिसका शाब्दिक पाठ था :-

 

“यह एक गम्भीर सवाल लम्बे समय से मुझे कुरेद रहा है

 

 

क्या म० प्र० राज्य सूचना आयोग देश के समस्त नियमों, कायदों, कानूनों, स्थापित व्यवस्थाओं और मर्यादाओं से ऊपर है?

 

 

क्या मेरी इस चिन्ता का समाधान करने के लिए अपने कीमती समय में से कुछ मिनिट दे कर उपकृत करेंगे?

 

 

अपनी सुविधा का समय सूचित करें।

 

उपर्युक्त सन्देश के प्रत्युत्तर में मुख्य सूचना आयुक्त ने सन्देश भेज कर १८ अप्रैल २०१६ को मिलने बुला लिया और ‘सजग’ की ओर से डॉ० ज्योति प्रकाश, ललित श्रीवास्तव तथा अजय गौड़ मुख्य सूचना आयुक्त से उनके कक्ष में मिले। इस मुलाकात में उन्होंने मुख्य सूचना आयुक्त से जब यह प्रश्न उठाया कि आयोग के किसी निर्णय से असन्‍तुष्ट रहने पर किसी पक्ष-कार के पास कोई वैधानिक अधिकार शेष रहता भी है या नहीं तब उन्होंने बतलाया कि असन्‍तुष्ट पक्ष-कार के पास सम्बन्धित उच्च न्यायालय में परमादेश याचिका (रिट पिटीशन) दायर करने के रूप में आयोग के निर्णय को चुनौती देने का एक वैधानिक अधिकार सदा ही उपलब्ध रहता है। यह पूछने पर कि अपने इस अधिकार के प्रयोग लिए आवश्यक दस्तावेज उसे कैसे प्राप्त हो सकेंगे, उन्होंने स्वीकार किया कि असन्तुष्ट पक्ष-कार को आयोग से समस्त आवश्यक दस्तावेजों की प्रमाणित प्रति-लिपियाँ प्राप्त करना होंगी। तब ‘सजग’ की ओर से सत्यापित प्रति-लिपियों की माँग के लिए २९ मार्च २०१६ को आयोग के समक्ष लगाये गये निवेदन की छाया प्रति-लिपि मुख्य सूचना आयुक्त को दी गयी और पूछा गया कि क्या वे उक्त आवेदन में किसी प्रकार का ऐसा कोई दोष, कमी या वैधानिक त्रुटि देख पा रहे हैं जिसके आधार पर आवेदक को प्रमाणित प्रति-लिपि से वंचित किया जा सके? आवेदन को अच्छी तरह से पढ़ कर उन्होंने दो बातें कहीं — पहली यह कि वह आवेदन पूरी तरह से कानून-सम्मत था; और दूसरी यह कि उस आवेदन के माध्यम से माँगी गयी समस्त प्रतिलिपियाँ देने में आयोग को कोई आपत्ति नहीं होगी।

उक्त स्वीकारोक्तियों को सुन कर आयोग के सूचना अधिकारी द्वारा ११ अप्रैल २०१६ को उसे लिखे गये उस पत्र की प्रति-लिपि आयोग के मुखिया को दी गयी जिसमें लिखा गया था कि माँगी गयी प्रतिलिपियाँ उपलब्ध करा पाना सम्भव नहीं है। उनके द्वारा उक्त पत्र को पढ़ लेने के बाद मुख्य आयुक्त महोदय के सामने पत्र का वह निहितार्थ रेखांकित किया गया जो आयोग के साथ ही स्वयं उनकी अपनी कार्य-शैली की गुण-वत्ता पर भी प्रश्न-चिन्ह चस्पा कर रहा था। ‘सजग’ के अध्यक्ष डॉ० ज्योति प्रकाश ने कहा कि यदि आयोग के सूचना अधिकारी संजीव पाण्डेय ने केवल सचाई ही लिखी थी तो इसका तात्पर्य यह था कि २२ मार्च २०१६ की सुनवाई कर चुकने के बाद, दिनांक ११ अप्रैल २०१६ तक भी, आयोग के मुखिया ने पीठासीन आयुक्त के रूप में सम्बन्धित प्रकरण में सुनवाई की कार्यवाही का विवरण दर्ज नहीं किया था!

क्या है मामलातात्पर्य के रूप में रेखांकित होता उपर्युक्त तथ्य यदि यथार्थ भी था तो उसका ऐसा होना अनेक बड़े गम्भीर सवाल उठाता था। शायद इसीलिए, विचलित हुए आयोग के मुखिया को बोलना पड़ा कि उन्होंने तो उसी दिन अपनी आदेशिका लिख दी थी और वह प्रकरण-नस्ती में बा-कायदा मौजूद भी है। मुख्य आयुक्त के इस स्पष्टीकरण पर मुख्य आयुक्त महोदय का ध्यान सूचना अधिकारी के पत्र के उस अंश की ओर आकृष्ट किया गया जिसके अनुसार आवेदन से स्पष्ट नहीं होता था कि उसमें किन दस्तावेजों की नकलें चाही गयी थीं? और फिर, उनसे पूछ लिया गया कि क्या वे भी यही मानते हैं कि सत्यापित प्रति-लिपि के संस्था के आवेदन में वंछित दस्तावेजों की विशिष्टियाँ स्पष्ट नहीं हैं? इस पर आयोग के मुखिया ने बिना किसी हीला-हवाली किये अपने सूचना अधिकारी के ‘विनिश्चय’ को नकार दिया।

इसके बाद, इसी तरह के अन्य सन्दर्भों में आयोग से जुड़े तथ्यों और परिस्थितियों को ले कर एक लम्बी चर्चा हुई जिसके विस्तृत वर्णन से यहाँ बचना चाहता हूँ क्योंकि उससे आयोग की चाल, चरित्र तथा नीयत पर और भी गहरे ढेरों नये प्रश्न उठेंगे। किन्तु, सार रूप में यहाँ यह बतलाना आवश्यक है कि चर्चा में शामिल प्रतिनिधियों ने मुख्य आयुक्त को विस्तार से यह समझाया कि सत्यापित प्रति-लिपियों के बिल्कुल स्पष्ट निवेदन को सूचना-प्रदाय का आम आवेदन बतला कर आयोग के जिम्मेदार अधिकारी किस प्रकार से नकल देने के अपने बन्धन-कारी दायित्व को सालों-साल तक लटकाये रखने की दूषित नीयत रखते हैं। उन्होंने भी स्वीकार किया कि यह सालों-साल इसलिए लग सकते हैं क्योंकि यदि सम्बन्धित लोक प्राधिकरण का आन्तरिक तन्त्र तय कर ले तो नकलें पाने के लिए आवेदक को द्वितीय अपीली निर्णय आने तक तो रुकना ही पड़ेगा। क्योंकि, आयोग से बाहर निकल कर उच्च न्यायालय में वैकल्पिक न्यायिक अधिकार के प्रयोग की प्राथमिक शर्त यही होती है कि आयोग में उपलब्ध सभी विकल्प प्रयोग में लिये जा चुके हों। अन्त में, आयोग के मुखिया ने एक सप्ताह का समय माँगते हुए आश्वासन दिया कि वे स्वयं देखेंगे कि इस अवधि के बाद सजग को माँगी गयी सभी नकलें उपलब्ध करा दी जायें।

इसके बाद, दिनांक ०२ मई २०१६ को आवेदक को स्पीड-पोस्ट से आयोग के सूचना अधिकारी का २८ अप्रैल २०१६ की तारीख में लिखा एक पत्र मिला जिसमें उन्होंने सूचित किया कि ‘सजग’ के २९ मार्च २०१६ के आवेदन के सम्बन्ध में वे कुल १५ पृष्ठों की ‘वांछित जानकारी’ संलग्न कर भेज रहे हैं। पत्र के साथ संलग्न कर भेजे गये सभी १५ पृष्ठों के अवलोकन से स्पष्ट होता है कि उपलब्ध करायी गयी सभी प्रति-लिपियाँ सूचना का अधिकार अधिनियम, २००५ के अन्तर्गत्‌ भेजी गयी थीं! आयोग निश्चित रूप से यह दर्शाने का प्रयास करेगा कि यह एक मामूली सी तकनीकी बात है जिसका कोई विशेष महत्व नहीं है। सम्भव है, अपने व्यक्ति-गत्‌ स्तर पर स्वयं मुखिया भी ऐसा ही कहें-करें। वे कह सकते हैं कि मुख्य मुद्दा तो यह है कि वांछित नकलें, अन्तत:, उपलब्ध करा दी गयी हैं। किन्तु, मामला इतना सीधा-सपाट बिल्कुल नहीं है।

जो सूचना आयोग सरकारी तन्त्र में सम्पूर्ण पार-दर्शिता स्थापित करने की इकलौती जिम्मेदारी के लिए गठित हुआ है, वह स्वयं न केवल घोर अ-पारदर्शी है अपितु अ-पारदर्शिता को बढ़ावा देने के नित नये हथ-कण्डे खोजने में भी जुटा है। इस ताजे प्रकरण से अब तो यह भी लगने लगा है कि आयोग ने अधिनियम के अन्यथा उपलब्ध प्रावधानों का, गैर-वाजिब दरवाजे से, दुरुपयोग करना तक सीख लिया है।

आधार-भूत बात यह कि नकलों को सूचना का अधिकार अधिनियम के अन्तर्गत्‌ भेजा जाना दर्शा कर आयोग ने आवेदक के हाथ से, सदा उपलब्ध रहने वाले, परमादेश याचिका के रास्ते बलात्‌ रोक दिये हैं। इस अधिकार के प्रयोग से पहले आवेदक को अब प्रथम और द्वितीय अपीली चक्कर पूरे करने होंगे। क्योंकि, तभी समझा जायेगा कि आगे के न्यायिक हस्तक्षेप की अधिकारिता उसे मिल गयी है। और फिर, दूसरी बात यह भी कि कुछ गम्भीर सवाल तो पहले से ही उठे हुए थे, आयोग के द्वारा २८ अप्रैल २०१६ को भेजी गयी नकलों ने उन अनुत्तरित सवालों में कुछ नये आयाम और भी जोड़ दिये हैं।

बिल्कुल सीधा-सच्चा और प्राथमिक सवाल तो यही है कि सत्यापित प्रति-लिपि उपलब्ध कराने के ‘सजग’ के निवेदन को ठुकराने और माँगी गयी नकलों को नहीं देने का यदि सच में ही कोई ठोस वैधानिक आधार था तो उस आधार की बिल्कुल स्पष्ट सूचना के साथ ही नकल देने से मना किया जाना चाहिए था। दो टूक शैली में कहें तो, आयोग ने नकलें नहीं देने का निश्चय किया था तो उसके पास अपने इस निश्चय की बेबाक घोषणा करने का कलेजा भी होना चाहिए था; ना कि सूचना का अधिकार अधिनियम की शिखण्डी आड़ ले कर मामले को अनिश्चित काल के लिए लटकाये रखने की चतुर चाल चलनी थी। क्योंकि, प्रमाणित प्रति-लिपियों को देने से मनाही होने की स्पष्ट सूचना मिलने पर इससे प्रभावित होने वाले असन्तुष्ट आवेदक को कम से कम एक न्यायिक विकल्प तो उपलब्ध हो जाता है। ‘मारे भी और रोने भी नहीं दे‘ किसी गुण्डे-मवाली की चारित्रिक शोभा तो हो सकता है किन्तु ऐसा ही चरित्र-दोष क्या सूचना आयोग जैसे संवैधानिक संस्थान को भी शोभित कर पायेगा?

इतना ही नहीं, ११ अप्रैल २०१६ को आवेदक को लिखित रूप से यह सूचित करने के बाद कि ‘विशिष्टियाँ स्पष्ट नहीं होने के कारण’ वांछित ‘जानकारी’ दे पाना उसके लिए सम्भव नहीं हो पा रहा है; आवेदक द्वारा किसी भी प्रकार का कोई स्पष्टीकरण दिये बिना ही २८ अप्रैल २०१६ को आयोग द्वारा ‘वही जानकारियाँ’ भेज भी दिया जाना आयोग के मुखिया के समक्ष आयोग के चरित्र पर उठाये गये गम्भीर सवालों तथा उनसे की गयी मौखिक शिकायत के बाद हुई किसी आन्तरिक पड़ताल का केवल आधा-अधूरा परिणाम भर है। ‘आधा-अधूरा’ इसलिए कि ‘जानकारी को उपलब्ध कराने से मना कर ११ अप्रैल को सूचना अधिकारी ने ‘देय जानकारी को दबाये रखने का अपराध किया था’ जैसा तथ्य स्थापित हो जाने के बाद भी आयोग के मुखिया ने अपने इस दोषी प्रमाणित हो चुके अधीनस्थ के विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं की थी।

इस बिन्दु पर यह महत्व-पूर्ण स्पष्टीकरण देना भी आवश्यक हो जाता है कि २८ अप्रैल २०१६ को आवेदक को भेजी गयी नकलों में से केवल एक पृष्ठ की नकल ही उस दस्तावेज की है जो सत्यापित प्रति-लिपि के आवेदन के माध्यम से आयोग से माँगी गयी थीं। बाकी के पृष्ठों में से एक पृष्ठ तो द्वितीय अपीली सुनवाई की सूचना के रूप में आयोग ने पहले ही आवेदक/अपीलार्थी को भेज रखा था। और, शेष १३ पृष्ठों की नकलें पाना तो अपीलार्थी का वैधानिक अधिकार है क्योंकि सुनवाई के दौरान पीठासीन आयुक्त द्वारा इन प्रति-लिपियों को उसे देना ही देना था। वह भी, एकदम नि:शुल्क। क्योंकि, ऐसा होना न्यायिक प्रक्रिया का वैधानिक अंश होता है। सूचना-प्रदाय की आड़ में इन नकलों का देना एक नये षडयन्त्र की ओर इंगित करता है जिसकी जमीन यह है कि आयोग चाहता तो उन नकलों को दबा कर भी रख सकता था! वहीं दूसरी ओर, वांछित प्रमाणित प्रतिलिपियों को सूचना-प्रदाय के अधिनियमित दायरे में ला कर आयोग ने जहाँ अपने मुखिया की ‘सजग’ के प्रतिनिधि-मण्डल से हुई चर्चा के सारे निचोड़ को ही नकार दिया है वहीं तत्काल, आयोग से बाहर जा कर, न्यायिक चुनौती देने के विकल्प को भी अपने ही पंजे में दबाये रखा है।

क्या आयोग के सूचना अधिकारी संजीव पाण्डेय द्वारा २८ अप्रैल २०१६ को भेजी गयी नकलों का इकलौता निहितार्थ यह है कि माँगी गयी नकलों के मूल दस्तावेज प्रकरण-नस्ती में पहले से मौजूद थे और उन्होंने, उन्हें ही बेहतर ज्ञात कारणों से, इन दस्तावेजों के प्रकरण-नस्ती में नहीं होने की सर्वथा असत्य सूचना ११ अप्रैल २०१६ के लिखे अपने पत्र में दी थी? या फिर, इसका दूसरा निहितार्थ यह है कि आयोग के मुखिया के साथ सजग की हुई दो-टूक बातचीत के बाद, अपने दामन पर लगे दागों को मिटाने के लिए स्वयं मुखिया ने और उनके अधीनस्थों ने भी, सारे दस्तावेज पिछली तिथियों में या तो स्वयं तैयार किये या फिर उचित स्थानों से उन्हें बटोर कर एकत्र कराया?

जो भी हो, यह दोनों ही निहितार्थ अन-देखी करने योग्य बातें नहीं हैं। क्योंकि यह ऐसे अक्षम्य व प्रताड़नीय अपराध हैं जिन्हें मामूली और सहज-क्षम्य ठहरा कर न तो विधि को और ना ही जन-सामान्य को बरगलाया जा सकता है। किन्तु यदि, इन दोनों के अतिरिक्त कोई तीसरा या चौथा निहितार्थ भी रहा हो तो उसकी जानकारी या तो केवल आयोग को होगी या फिर स्वयं उसके मुखिया को ही।

आयोग फँस गया है। अकेला आयोग ही क्यों, स्वयं मुख्य आयुक्त भी बुरी तरह से घिर चुके हैं। अब तो वे यह कहने की, सर्वथा सुरक्षित समझी जाने वाली, स्थिति में भी नहीँ है कि ‘उन्हें प्रकरण तथा उससे जुड़े तथ्यों के बारे में कुछ पता नहीं है’ क्योंकि सारे तथ्य उनके निजी ज्ञान में हैं। देखना बस यह है कि आयोग के भीतर पसरी पड़ी, सड़ाँध मारती, गन्दगी की सफाई की दिशा में वे कौन से ठोस कदम उठाते हैं? किस-किस के विरुद्ध कौन-कौन सी कार्यवाही करते हैं? कोई कार्यवाही करते भी हैं या नहीं?

(०७ मई २०१६)