म० प्र० राज्य सूचना आयोग की खुली पोल

Sarokar

म० प्र० राज्य सूचना आयोग आयोग पर बड़ा सवाल उठा है। गैर सरकारी सामाजिक संगठन सजग ने मुख्य सूचना आयुक्त से ही पूछ लिया है कि क्या आयोग स्वयं को देश के समस्त नियमों, कायदों, कानूनों, स्थापित व्यवस्थाओं और मर्यादाओं से ऊपर मानता है?

दोषी लोक सूचना अधिकारियों को अनैतिक तथा अनुचित रूप से संरक्षण देने के गम्भीर आरोप म० प्र० राज्य सूचना आयोग पर लगते रहे हैं। लेकिन अब उसके मुख्य आयुक्त की मंशा के औचित्य पर भी बड़ा गम्भीर सवाल खड़ा किया गया है। यह सवाल गैर सरकारी सामाजिक संगठन की ओर से आयोग के मुख्य आयुक्त श्री के० डी० खान को सम्बोधित कर की गयी एक लिखित शिकायत से सामने आया है।

सामाजिक और न्यायायिक सन्दर्भों में सक्रिय स्वयंसेवी संगठन सजग ने दिनांक १२ अप्रैल २०१४ को सूचना का अधिकार अधिनियम, २००५ के तहत्‌ एक आवेदन लगा कर म० प्र० राज्य निर्वाचन आयोग से यह जानकारी माँगी थी कि सर्वोच्च न्यायालय ने परमादेश याचिका (सिविल) क्र० १६१/२००४ में दिनांक २७ सितम्बर २०१३ को पारित अपने आदेश में चुनाव आयोग को जो यह निर्देश दिया था कि वह नोटा के अधिकार के बारे में देश के आम जन को शिक्षित करने की जवाब-दारी पूरी करे, उस निर्देश के पालन के बारे में कुल क्या कदम उठाये गये थे? किन्तु निर्वाचन आयोग ने उसे कोई जानकारी उपलब्ध नहीं करायी जिसके कारण अन्तत: सूचना आयोग में द्वितीय अपील लगानी पड़ी थी।

सजग के अध्यक्ष डॉ० ज्योति प्रकाश कहना है कि नोटा के बारे में जन-मानस को शिक्षित करने का सर्वोच्च न्यायालय का निर्देश प्रजातान्त्रिक निर्वाचन प्रक्रिया में मील का पत्थर है किन्तु, निर्वाचन आयोग ने इस निर्देश के पालन के प्रति घोर चुप्पी साधी हुई है। यही नहीं, उसका भरसक प्रयास है कि सर्वोच्च न्यायालय की खुली अवमानना वाली उसकी इतनी गम्भीर हुकुम-उदूली के तथ्य सार्वजनिक नहीं होने पायें। यही कारण है कि प्रकरण की अपीली सुनवाई की प्रक्रिया में म० प्र० सूचना आयोग में भी ढेरों अनैतिक खोट वाले सोच के संकेत मिले हैं। यही नहीं, इन खोटों को आयोग के वरिष्ठों का प्रत्यक्ष-परोक्ष संरक्षण तक मिलने की सम्भावना है।

संक्षेप में मामला इस प्रकार है कि द्वितीय अपील की सुनवाई की २२ मार्च २०१६ की पेशी के बाद सजग की ओर से सूचना आयोग में आवेदन लगा कर कुछ दस्तावेजों की प्रमाणित नकलों की माँग की गयी थी। इन नकलों में मुख्य सूचना आयुक्त द्वारा उस दिन लिखी गयी प्रकरण की ऑर्डरशीट की नकल भी शामिल थी। किन्तु, आयोग की ओर से पत्र लिख कर माँगी गयी नकलें देने से यह कहते हुए कि मना कर दिया गया कि मुख्य आयुक्त द्वारा लिखी गयी कोई ऑर्डरशीट प्रकरण की नस्ती में है ही नहीं! अन्य नकलों के बारे में लिख दिया गया कि आयोग को समझ में ही नहीं आया है कि आवेदक ने किन दस्तावेजों की नकलें चाही थीं?

Complaint filed with Chief Information Commissionerक्योंकि, नकलों के आवेदन पर आयोग से मिला यह जवाब चौंकाने वाला था इसलिए डॉ० ज्योति प्रकाश ने १८ अप्रैल २०१६ को मुख्य सूचना आयुक्त श्री के० डी० खान से मुलाकात की और उस पत्र को लिखने वाले आयोग के अधिकारी की शिकायत की। उन्होंने यह सीधा सवाल भी किया कि क्या आयोग देश के समस्त नियमों, कायदों, कानूनों, स्थापित व्यवस्थाओं और मर्यादाओं से ऊपर है? मुख्य सूचना आयुक्त से हुई इस मौखिक शिकायत के बाद आयोग के उसी अधिकारी ने, उसी पुराने आवेदन के आधार पर, कुछ नकलें भेज दीं। भेजी गयी नकलें पर्याप्त थी अथवा नहीं, या फिर सही थीं अथवा नहीं; इस विवाद से ऊपर बड़ी बात यह रही कि दी गयी नकलों में मुख्य सूचना आयुक्त द्वारा, पुरानी तारीख में ही लिखी गयी दर्शाती, आदेशिका की वह नकल भी शामिल थी जिसके फाइल में मौजूद नहीं होने की सूचना पहले भेजी गयी थी!

किन्तु, मामले की गम्भीरता इतने पर ही समाप्त नहीं हो जाती है। इसके उलट, वह और भी बढ़ जाती है। क्योंकि, आयोग या उसके मुख्य सूचना आयुक्त द्वारा अपने उस अधिकारी के खिलाफ न तो किसी प्रकार की कोई कार्यवाही आरम्भ की गयी थी और ना ही इतने बड़े घपले की कोई जाँच ही शुरू की गयी थी। डॉ० ज्योति प्रकाश के अनुसार इस स्थिति का अत्यन्त दूर-गामी और बड़ा गम्भीर यह अर्थ था कि सारा घपला न केवल चुनाव आयोग को संरक्षित करने बल्कि सूचना आयोग द्वारा उसे दिये जा रहे इस संरक्षण की पोल को छिपाये रखने के किसी सम्भावित षडयन्त्र से भी प्रेरित था। ऐसा समझ में आता है कि आयोग में पदस्थ अधिकारी एक-दूसरे को संरक्षण देने के लिए अनैतिकता और अवैधानिकता की किसी भी सीमा को लाँघने को तत्पर हैं।

सजग ने आयोग के मुख्य आयुक्त श्री के० डी० खान को सम्बोधित कर जो लिखित शिकायत की है उसमें सारे षडयन्त्र की जाँच की माँग की गयी है। इस शिकायत में, उनके समक्ष तथ्यों के साथ की गयी मामले की मौखिक शिकायत के बावजूद मुख्य आयुक्त द्वारा बरती गयी चुप्पी पर आश्चर्य भी व्यक्त किया गया है। सजग की एक माँग यह भी है कि जाँच के परिणाम को सार्वजनिक किया जाये।

(www.sajag-india.com; १९ जुलाई २०१६ से साभार)