नये सिरे से लिखना होगा भारतीय संविधान

Sarokar

भारतीय संविधान के लिखे, स्वीकार किये और लागू किये जाने की प्रक्रिया के वैधानिक रूप से खोट-पूर्ण होने को स्वीकारने और इस कारण से समूची प्रक्रिया को नये सिरे से पुन: पूरा करने से कोई ऐसा महा-प्रलय नहीं आने वाला है जो सम्प्रभु भारत राष्ट्र के भौतिक और / अथवा प्रशासनिक अस्तित्व को हल्की सी खरोंच तक लगा पाये।

‘भारतीय संविधान की दुहाई’ देश में आजकल फैशन हो चुका है। ‘फैशन’ इसलिये क्योंकि ऐसे व्यक्ति भी दिन-रात यही दुहाई देते मिल जाते हैं जो अपने हितों के सामने संविधान की मान-मर्यादा की होली जलाने से भी कोई परहेज नहीं करते हैं। वह ऐसा इसलिये करते हैं क्योंकि ऐसी दुहाई उन्हें उस धुन्धलके दायरे (ग्रे एरिया) जैसी वह सुविधा-जनक ढाल दे देती है जिसकी ओर इंगित कर वे ‘काले के सफेद’ और ‘सफेद के काले’ होने की तोड़-मरोड़ वाली अपनी मन-चाही समीक्षा दुनिया को परोस पाते हैं।

इसीलिये, उसके प्रति पूरी वैधानिक निष्ठा रखते हुए भी, देश के संविधान की ‘संवैधानिक शुचिता’ पर एक सर्वथा नयी बहस का आरम्भ आवश्यक हो गया है। यह बहस केवल इन दो बिन्दुओं पर केन्द्रित होनी चाहिये – (१) किसी भी राष्ट्र के संविधान की सर्व-मान्य ‘वैधानिक’ परिभाषा क्या है? और, (२) इस परिभाषा की कसौटी पर भारतीय संविधान कितना खरा ठहरता है? जहाँ तक परिभाषा का प्रश्न है, किसी भी सम्प्रभु प्रजातान्त्रिक राष्ट्र का वही ‘संविधान’ वैधानिक मान्यता रखता है जिसे उस राष्ट्र के आम नागरिकों द्वारा निर्वाचित बहुसंख्य प्रतिनिधित्व की सहमति / स्वीकृति के आधार पर लिखा, स्वीकारा और लागू किया गया हो।

स्पष्ट है कि स्वतन्त्र-सम्प्रभु भारतीय गणतन्त्र के संविधान की संवैधानिक शुचिता की धुरी इसी ज्वलन्त पहेली के समाधान पर आश्रित होगी कि, दुनिया भर में निर्विवाद रूप से मान्य, उपर्युक्त वैधानिक कसौटी क्या उसे यथार्थ में ही ‘भारतीय नागरिकों द्वारा निर्वाचित बहुसंख्य प्रतिनिधित्व की सहमति / स्वीकृति के आधार पर लिखा, स्वीकारा और लागू किया गया’ स्वीकारती है? ‘पहेली’ इसलिये कि आम भारतीयों की बात तो छोड़िये, कानून और न्याय के विभिन्न दायरों से जुड़े बड़े और नामचीन धुरन्धरों ने भी भारतीय संविधान के लिखे, स्वीकारे और लागू किये जाने से जुड़े जमीनी तथ्यों की इन बारीकियों को जानने और उनकी वैधानिक समीक्षा करने की आवश्यकता को कभी आवश्यक ही नहीं समझा। अपने-अपने कारणों से, सभी के लिये भारतीय संविधान एक सर्वथा वैध ‘संवैधानिक’ दस्तावेज है!

यहीं, यह समझ लेना आधारभूत रूप से महत्वपूर्ण होगा कि इस पहेली के दो पहलू हैं – (१) भारतीय संविधान को ‘सर्वथा वैध मानना’ और, (२) उसे ‘वैध ठहराना’। यह भी कि, इसके पीछे दोनों ही पक्षों की अपनी-अपनी गम्भीर व्यवहारिक विवशताएँ हैं।

सारी तथ्यात्मक विसंगतियों के बाद भी भारतीय संविधान को वैध ठहराने एक-जुट होने वालों के पास अघोषित निजी हितों और अव्यक्त राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं की अपनी-अपनी लम्बी सूचियाँ हैं। वे जानते हैं कि भारतीय संविधान का, वैधानिक रूप से, सर्वथा असंवैधानिक होना स्वीकार लिये जाने से उनके यह सारे स्वार्थ और क्षुद्र महत्वाकांक्षाएँ सदा के लिये रसातल पहुँच जायेंगी। इसके उलट, उसके लिखे, स्वीकारे और लागू किये जाने की समूची प्रक्रिया की सारी तथ्यात्मक विसंगतियों को जान और समझ लेने के बाद भी भारतीय संविधान को वैध ही मान लेने की बात करने वाले ऐसा केवल इसलिये कर रहे हैं क्योंकि वे इस एक काल्पनिक आशंका से आक्रान्त हैं कि ऐसा नहीं होने के परिणाम-स्वरूप अनिश्चय भरी अराजक परिस्थितियाँ निर्मित होंगी जो व्यापक रूप से देश / जन हित के सर्वथा विपरीत होंगी।

निहित-स्वार्थों और निजी महत्वाकांक्षियों के माथों पर पड़ने वाले बलों की किंचित् भी परवाह नहीं की जानी चाहिये। लेकिन, संविधान के असंवैधानिक ठहरा दिये जाने की कथित ‘व्यवहारिक’ परिणतियों से आशंकित होने वालों को विधानों और कानूनों से जुड़ी यह सचाई भी स्वीकारनी चाहिये कि कानून में ‘अपवाद का नियम’ अपने आप में सर्वथा वैधानिक माना गया है। यह एक ऐसा वैधानिक दर्शन है जो कहता है कि किसी परिस्थिति-विशेष में, केवल अपवाद-स्वरूप, परम्परा से हट कर भी नियम-विधान बनाये और स्वीकारे जा सकते हैं। किन्तु, ऐसे विधानों का अस्तित्व अपवाद को स्वीकारने को विवश करने वाली ऐसी परिस्थिति के बने रहने तक ही सीमित रहता है।

अर्थात्, अपवाद स्वीकारने को विवश करने वाली परिस्थिति से मुक्ति पा लेने के बाद, यथा-सम्भव शीघ्रता से, अपवाद-स्वरूप स्वीकारे गये ऐसे नियम-विधान के अस्तित्व को पारम्परिक रूप से स्वीकारे गये नये विधि-विधानों से बदल दिया जाना चाहिये। दूसरे शब्दों में, अपवाद-जनित परिस्थितियों में बने विधानों के अस्तित्व में रहने के कारण, संवैधानिक अर्थों में, जो कुछ घट चुका है; बदली हुई परिस्थिति में उसका अस्तित्व स्वयंमेव शून्यवत् नहीं हो जाता है। अपितु उस ‘घट चुके’ के अस्तित्व को उसी स्वरूप में स्वीकारते हुए भी, बदली हुई परिस्थिति में आवश्यक हो जाने पर, भविष्य के लिये नये सिरे से फिर गढ़ा जा सकता है। और, ऐसा किया जाना एक निरन्तरता को बनाये रखने वाले अर्थों में किया जाता है।

सरल अर्थ में इसे इस तरह समझा जा सकता है कि अपवाद के नियम के लागू रहने के दौरान लिये गये वैधानिक-प्रशासनिक निर्णय और उनके आधार पर निर्मित हुई जमीनी परिस्थितियाँ इस नियम के लुप्त होते ही अपने आप में स्वयं ही विलुप्त नहीं हो जाती हैं। किन्तु आवश्यकता पड़ने पर उनमें से प्रत्येक को चिन्हित करते हुए, नये वैधानिक-प्रशासनिक निर्णयों के आधार पर, वैधानिक रूप से बदला अवश्य जा सकता है।

स्वयं जवाहरलाल नेहरू ने भारत के स्वतन्त्र होने और / अथवा भारतीय संविधान के स्वीकृत / लागू होने से पहले, और स्वतन्त्र भारत के अस्तित्व में आने तथा संविधान के लागू हो जाने के बाद भी, यही आश्वासन भारतीयों को दिये थे।

अर्थात् भारतीय संविधान के लिखे, स्वीकार किये और लागू किये जाने की प्रक्रिया के वैधानिक रूप से खोट-पूर्ण होने को स्वीकारने और इस कारण से समूची प्रक्रिया को नये सिरे से पुन: पूरा करने से कोई ऐसा महा-प्रलय नहीं आने वाला है जो सम्प्रभु भारत राष्ट्र के भौतिक और / अथवा प्रशासनिक अस्तित्व को हल्की सी खरोंच तक लगा पाये।

इस बिन्दु पर लाख टके का केवल यही सवाल शेष रहता है कि क्या भारतीय संविधान एक वैध ‘संवैधानिक’ दस्तावेज नहीं है? और, इसका सटीक उत्तर केवल इतिहास के ये तथ्य ही दे सकते हैं जो इस दस्तावेज और उसके अस्तित्व में आने की समूची प्रक्रिया से सीधे तौर पर जुड़े हैं —

यों तो, घटनाओं और पात्रों की एक लम्बी सूची है किन्तु अंग्रेजी राज की गुलामी से मुक्ति की राजनैतिक, और प्रजातान्त्रिक भी, नींव लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के उस उद्घोष से रखी गयी थी जिसमें उन्होंने कहा था, “स्वतन्त्रता हमारा जन्म-सिद्ध अधिकार है”। १९२२, १९२८ और १९२९ में महात्मा गांधी, आम भारतवासियों व कांग्रेस द्वारा की जाने वाली “भारतीय संविधान की संरचना भारतवासियों का जन्म-सिद्ध अधिकार है” शैली की उद्घोषणाएँ यथार्थ में तिलक के इसी उद्घोष की तार्किक परिणतियाँ रही हैं। और, सैद्धान्तिक रूप से, जवाहरलाल नेहरू भी इसका मोटा प्रारूप १९२८ में भारतवासियों के समक्ष रख चुके थे। जवाहरलाल नेहरू के प्रस्ताव पर कांग्रेस ने पहली बार वयस्क मतदान के आधार पर संविधान सभा के गठन का प्रस्ताव १८ जून १९३४ को औपचारिक रूप से स्वीकृत किया था।

किन्तु, भारत की सत्ता सच्चे अर्थों में भारतवासियों के हाथों में सौंपने से बचने के लिये ब्रिटिश शासकों ने यह शर्त थोप दी कि वे स्वतन्त्रता की घोषणा तभी करेंगे जब, लगभग असम्भव सी एक सीमित समय-सीमा के भीतर, भारतवासी अपना एक संविधान स्वयं बना लें। और क्योंकि अंग्रेजों से स्वतन्त्रता-प्राप्ति तत्कालीन समय की पहली प्राथमिकता थी, संविधान सभा का गठन आम भारतवासियों द्वारा किये गये मतदान से निर्वाचित हुए प्रतिनिधियों के स्थान पर बिदाई की कगार पर खड़े अंग्रेज शासकों की रुचि तथा शर्तों के अनुकूल गठित हुई प्रान्तीय विधान सभाओं के सदस्यों द्वारा हुए नामांकित हुए प्रतिनिधियों के माध्यम से ही कराना पड़ा। और, उसमें ऐसे व्यक्तियों को भी स्थान दिया गया जो भारत स्थित रियासतों की विधान सभाओं में राजाओं द्वारा ‘सदस्य’ के रूप में नियुक्त सदस्यों द्वारा नामांकित हुए थे।

यहाँ यह आधारभूत जानकारी रखना आवश्यक है कि ब्रिटिश भारत के प्रान्तों और देशी रियासतों की यह विधान सभाएँ यहाँ के निवासी भारतीयों का वास्तविक प्रतिनिधित्व नहीं करती थीं। इसके उलट, इन प्रान्तीय विधान सभाओं के निर्वाचन हेतु (i) ब्रिटिश भारत की मात्र १० प्रतिशत्‌ चुनिन्दा जनसंख्या को ही वोट करने का अधिकार दिया गया था, (ii) इसमें से भी मात्र एक करोड़़ लोगों द्वारा ही मताधिकार का प्रयोग किया गया था, (iii) यह संख्या तत्कालीन भारत की कुल जनसंख्या का मात्र 2.5 प्रतिशत्‌ ही थी, (iv) यही नहीं, यह ‘निर्वाचन’ धर्म के संकीर्ण आधार पर कराया गया था, (v) विधान सभा सदस्यों की संख्या का बँटवारा भी हिन्दू, मुसलमान, सिख, ईसाई इत्यादि धार्मिक आधार पर निर्धारित किया गया था, (vi) किन्तु, सीटों के ऐसे धार्मिक बँटवारे में भी धार्मिक आधार पर जनसंख्या के वास्तविक अनुपातों के स्थान पर अंग्रेजों की अनुचित मन-मर्जी ही थोपी गयी थी, (vii) साथ ही, निर्वाचन में हिन्दू को मात्र हिन्दू को तथा मुस्लिम को मात्र मुस्लिम को मत देने का अधिकार दिया गया था।

जहाँ ऐसी साम्प्रदायिक संविधान सभा का गठन इस प्रधान उद्देश्य की पूर्ति के लिये किया गया था कि सम्पूर्ण भारत हेतु एक ही संविधान की रचना तो की जाये वहीं अंग्रेजों द्वारा डाले गये दबाव के पालन में यह सुनिश्चित भी किया गया था कि इस संविधान में अलग से विशेष सुविधाएँ एवं अधिकार प्रदान कर मुसलमानों को प्रसन्न किया जाये ताकि वे (i) हिन्दू-मुस्लिम भाई-चारे को स्वीकार करें, और (ii) भारत का विभाजन कर मुसलमानों के लिये पृथक राष्ट्र ‘पाकिस्तान’ के गठन की अपनी माँग छोड़ दें। इसके लिये संविधान के प्रारूप को, अलग से, मुसलमान-हितैषी बनाया गया।

जबकि इसके उलट, संविधान के ऐसे प्रारूप के स्वीकारे जाने के पश्चात्‌ किन्तु इसके पारित होने से पूर्व ही, भारत के विभाजित हो जाने और पाकिस्तान के अस्तित्व में आने से इन लक्ष्यों की पूर्ति की आवश्यकता सिरे से समाप्त हो गई। फिर भी स्व. नेहरू एवं अन्य मुस्लिम-प्रेमी नेताओं द्वारा संविधान के विशेषत: मुसलमान-हितैषी स्वरूप को यथा-वत्‌ ही रखा गया। यद्यपि इस पूरी प्रक्रिया के बीच, और उसके बाद भी, जवाहरलाल नेहरू द्वारा आम भारतवासी को लगातार इस बात के लिये आश्वस्त भी किया जाता रहा कि भविष्य में जब हमारी स्वतन्त्रता प्रचुर-पर्याप्त-परिपक्व हो जायेगी; तब वयस्क मतदान के आधार पर एक नयी संविधान सभा का चुनाव करवा कर देश के लिये एक नया संविधान फिर से लिखा जायेगा।

कांग्रेस के मेरठ सम्मेलन को सम्बोधित करते हुए २१ नवम्बर १९४६ को नेहरू ने इसी मुस्लिम-हितैषी संविधान को स्वीकारने पर जोर देते हुए सार्वजनिक रूप से कहा था कि जिन्ना ने संविधान सभा की कार्यवाही को अनिश्चित काल के लिये स्थगित करवाने का प्रयास किया था। उनका कहना था कि वे इस संविधान सभा के प्रति मोहित नहीं हैं किन्तु ‘हमने इसे स्वीकार किया है और अपने अधिकतम्‌ लाभ के लिये इसका उपयोग करना चाहिये।’ देश की तत्कालीन मन:स्थिति की नब्ज को समझते हुए तब अपने कथन में बड़े स्पष्ट शब्दों में आगे उन्होंने यह भी जोड़ा था कि ‘यह कोई अन्तिम संविधान सभा नहीं होने वाली है।’

दूसरे शब्दों में, तत्कालीन राजनैतिक परिस्थितियों की विवशता में, केवल अपवाद के नियम के आधार पर ही, आज का संविधान स्वीकृत और लागू हुआ था। इसी ऐतिहासिक सचाई में प्राकृतिक न्याय का यह बन्धनकारी दायित्व भी निहित है कि अपवाद-जन्य परिस्थिति के लिये केवल तात्कालिकता के रूप में स्वीकारे गये किसी भी अस्वाभाविक विकल्प को, ‘पत्थर की लकीर’ ठहराते हुए, अनन्त काल के लिये थोपे नहीं रखा जा सकता है।

वैसे भी, संविधान के लागू हो जाने के दो वर्षों के भीतर ही संविधान में पहले संशोधन के प्रस्ताव पर संसद में दिये अपने भाषण में तत्कालीन प्रधानमन्त्री नेहरू ने, अपनी बातें दोहराते हुए, २ जून १९५१ को कहा था कि जो संविधान अपरिवर्तित और अडिग रहता है वह चाहे जितना भी अच्छा क्यों ना हो, एक संविधान के अर्थ में, अपनी उपयोगिता खो चुका होता है। तब नेहरू ने सर्वथा बेलाग शैली में आगे यह भी जोड़ा था कि भारतीय संविधान बुढ़ा चुका था और लगातार अपनी मृत्यु को प्राप्त हो रहा था।

स्वाभाविक है, भारतीय संविधान की संवैधानिकता पर उठाये गये सवाल के हल को समझने के लिये इस बिन्दु पर यह जान और समझ लेना भी अनिवार्य है कि ‘अपवाद-जन्य परिस्थिति के लिये केवल तात्कालिकता के रूप में स्वीकारे गये अस्वाभाविक विकल्प’ का तात्पर्य क्या है? इतिहास-प्रमाणित तथ्य दर्शाते हैं कि जहाँ स्वतन्त्रता की घोषणा के लिये असम्भव सी एक सीमित समय-सीमा के भीतर अपना स्वयं का एक संविधान तैयार कर लेने की ब्रिटिश शासकों द्वारा थोपी गयी शर्त ‘अपवाद-जनित परिस्थिति’ थी; वहीं सारे वयस्क भारत-वासियों के नैसर्गिक अधिकार को दर-किनार कर उनके बीच से केवल २.५% अपने चहेतों द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधियों के पसन्दीदा व्यक्तियों के गुट को संविधान सभा घोषित करवाना ‘अस्वाभविक विकल्प’ था।

संविधान की परिभाषा को स्पष्ट करते हुए आरम्भ में ही कहा जा चुका है कि किसी भी सम्प्रभु प्रजातान्त्रिक राष्ट्र का वही ‘संविधान’ वैधानिक मान्यता रखता है जिसे उस राष्ट्र के आम नागरिकों द्वारा निर्वाचित बहुसंख्य प्रतिनिधित्व की सहमति / स्वीकृति के आधार पर लिखा, स्वीकारा और लागू किया गया हो। जबकि, ऐतिहासिक साक्ष्य स्थापित करते हैं कि भारतीय संविधान के अस्तित्व में भारत के स्वतन्त्र नागरिकों का ऐसा कोई योगदान नहीं रहा था।

इतना ही नहीं, संविधान सभा के सदस्यों ने भारत राष्ट्र नहीं अपितु अंग्रेज सम्राट और ब्रिटिश संसद्‌ के प्रति वफादारी की शपथ ली थी तथा उन्हीं की मंशा को ध्यान में रखते हुए अंग्रेजों द्वारा पारित भारत शासन अधिनियम १९३५ के अधिकांश प्रावधानों को संविधान में सम्मिलित किया था।

यद्यपि, इन ऐतिहासिक तथ्यों / आधारों के अतिरिक्त वैधानिक रूप से भी भारतीय संविधान के असंवैधानिक होने को बिल्कुल सहज रूप से इस आधार पर प्रमाणित किया जा सकता है कि भारतीय संविधान न तो स्वतन्त्र भारत के बहुसंख्य नागरिकों की अपेक्षाओं की पूर्ति करता है और ना ही यह संविधान की सर्वथा स्वीकृत परिभाषा पर खरा ठहरता है। फिर भी, केवल वैधानिक दाँव-पेंचों को ही अस्तित्व का आखिरी प्रामाणिक आधार मानने वाली बिरादरी यह सवाल उठा सकती है कि विधि की पोथियों में इन प्रमाणों को कितना बल प्राप्त है? उनके ऐसे सारे सवालों को ठण्डा करने के लिये जहाँ एक ओर ऐसे व्यक्तियों को भारतीय संविधान की उस प्रस्तावना को, अलग से रेखांकित कर, पढ़ाना होगा जिसका आरम्भ ही ‘हम भारतीय’ (वी द पीपुल ऑफ़ इण्डिया) से होता है; वहीं दूसरी ओर उन्हें भारतीय विधिक इतिहास के इस एक तथ्य का भी स्मरण कराना होगा कि भारतीय संविधान की प्रस्तावना को ले कर सर्वोच्च न्यायालय की संवैधानिक पीठों द्वारा समय-समय पर ऐसे मार्ग-दर्शक निर्णय पारित किये गये हैं जिनमें, निर्विवाद रूप से, यह स्थापित किया जा चुका है कि भारतीय संविधान की आत्मा उसकी प्रस्तावना में स्थित है।

उदाहरण के लिये, एस आर चौधरी वि० पंजाब राज्य मामले में देश के सर्वोच्च न्यायालय ने पारित किया है कि प्रस्तावना उस स्रोत की ओर इंगित करती है जहाँ से संविधान आता है। जबकि केशवानन्द भारती वि० केरल राज्य मामले में उसने ठहराया है कि किसी सामान्य प्रस्तावना के विपरीत भारतीय संविधान की प्रस्तावना को उसके अंग के रूप में परखा जाना चाहिये। माधवराव सिन्धिया वि० केन्द्र मामले में न्यायालय ने घोषित किया है कि प्रस्तावना संविधान का अविभाज्य अंग है। और, एस आर चौधरी वि० पंजाब राज्य मामले में ही सर्वोच्च न्यायालय ने यहाँ तक कहा है कि ‘हम भारतीय’ (वी द पीपुल ऑफ़ इण्डिया) शब्द भारत की गणतान्त्रिक व प्रजातान्त्रिक नीति पर जोर डालते हैं और दर्शाते हैं कि इसकी वास्तविक शक्ति नागरिकों में ही निहित है।

भारतीय संविधान के लिखे, स्वीकृत किये और लागू किये जाने के तथ्य की यह सचाई सर्वथा निर्विवाद है कि उस समूची प्रक्रिया के किसी भी अंश में, संविधान की परिभाषा के सर्व-स्वीकृत दायरों में, ‘हम भारतीयों’ से न तो कोई परामर्श लिया गया और न ही ‘हम भारतीयों’ को इस प्रक्रिया में शामिल किये गये किसी भी व्यक्ति के चयन की प्रक्रिया में भाग लेने की कोई छूट दी गयी। स्पष्ट है कि यथार्थ में तो ‘हम भारतीयों’ को संविधान का स्रोत बनाया ही नहीं गया था।

वर्ष १९४६ में विधान सभा के नामांकित सदस्यों द्वारा संविधान सभा का गठन, केवल और केवल, अविभाजित भारत के संविधान निर्माण हेतु ही किया गया था। किन्तु, मुस्लिम लीग एवं मोहम्मद अली जिन्ना द्वारा रखी गयी पृथक मुस्लिम राष्ट्र की माँग की स्वीकृति और उसकी पूर्ति के लिये पाकिस्तान का गठन कर दिये जाने से अविभाजित भारत के लिये बनाये गये संविधान के प्रारूप की यह मूल भावना विलोपित हो चुकी थी। फिर भी, विभाजित भारत के लिये उसी संविधान को स्वीकार कर शेष बचे स्वतन्त्र भारत के गैर मुस्लिम / हिन्दू नागरिकों की भावनाओं का अपमान तो किया ही गया उनके नैसर्गिक अधिकारों का हनन भी किया गया। यही नहीं, इस विभाजन के बाद भी शेष बच रहे भारत के मुसलमानों के लिये अल्पसंख्यक का दर्जा, अधिकाधिक अनाधिकृत सुविधाएँ तथा धार्मिक अधिकार आदि वह सभी विशेष अधिकार यथावत् ही जारी रखे गये जो उन्हें भारत के विभाजन को रोकने की आशा में, अनुचित रूप से, दिये गये थे।

जाहिर है, भारतीय संविधान का यह स्वरूप इसी एकांगी आधार पर बनाया गया था कि भारत के अविभाजित रूप को स्थिर रखने के लिये ऐसा करना अनिवार्य होगा! दूसरे शब्दों में, सब कुछ केवल हिन्दू-मुस्लिम एकता को कायम रखने के नाम पर किया गया था। किन्तु, यह ‘हिन्दू-मुस्लिम एकता’ दिवा-स्वप्न ही प्रमाणित हुई और भारत मुस्लिम तथा हिन्दू राष्ट्रों में विभाजित हो गया। इसके बाद भी स्व. नेहरू एवं अन्य मुस्लिम प्रेमी नेताओं द्वारा संविधान के विशेषत: मुसलमान-हितैषी स्वरूप को यथा-वत्‌ रखा गया। भारत को ‘हिन्दू राष्ट्र’ अथवा कम से कम ‘धर्म-विशेष के प्रति किसी भी रुझान से मुक्त राष्ट्र’ घोषित नहीं किया जाना भारत के विभाजन की मूल दुर्भावना और इस विभाजन के पीछे रहे व्यापक सामाजिक-राजनैतिक तथ्यों से सीख लेने के विपरीत था। इस बिन्दु पर महात्मा गांधी द्वारा १९४४ में की गयी उस टिप्पणी का उल्लेख नहीं करना इतिहास के तथ्यों से आपराधिक छेड़-छाड़ करना होगा जिसमें उन्होंने कहा था, “इतिहास में मुझे ऐसी एक भी घटना नहीं मिली है जिसमें धर्मान्तरण करने वालों और उनके वंशजों ने अपने मूल राष्ट्र से अलग स्वयं का एक स्वतन्त्र राष्ट्र होने का दावा किया हो।”

सभी निवासियों के लिये एक ही संहिता का निर्माण और धार्मिक आधार पर किसी भी तुष्टि-परक रुझान से मुक्ति की राष्ट्रीय अनिवार्यता होते हुए भी, केवल धर्म के नाम पर अपने लिये पाकिस्तान बनवा चुके उन मुसलमानों को ही भारत में अल्प-संख्यक घोषित कर पक्षपात्‌-पूर्ण सहायता का अधिकार दिया गया जो संख्या में सिख, जैन, बौद्ध इत्यादि से पर्याप्त अधिक थे। यह कृत्य विघटन के बाद स्वतन्त्रत हो रहे देश का निर्माण अपने आप में एक नये विघटन की नींव पर करने के समान था।

और क्योंकि अब, समस्त भारतवासी वास्तविक अर्थ में एक पूर्ण स्वतन्त्र व परिपक्व राष्ट्र के नागरिक होने के साथ ही ऐसी किसी परिस्थिति से भी मुक्त हो चुके हैं जो सहज, स्वाभाविक और प्राकृतिक आचरणों व नियमों को ताक पर रखते हुए महज अपवाद से आक्रान्त नियमों-कानूनों का पालन करते रहने को विवश करती हो; वयस्क मतदान के आधार पर एक नयी संविधान सभा का चुनाव करवाना और उसके माध्यम से एक नया संविधान लिखवाना आज की पहली प्राथमिकता बन चुका है।
(२९ अगस्त २०१९)

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