महाकाली की कथा सिखाती है गांधी की अहिन्सा का पूरा दर्शन

Sarokar

कथित ‘औसत समझ’ के उलट, महाकाली आदमी और आदमीयत को केन्द्र में रखने वाला प्रतीक है। और, महाकाली की गाथा में ही अहिन्सा का गांधी-वादी आदर्श अपनी पूर्णता में निखरता है।

कुछ स्वार्थों ने हमारे समाज की सांस्कृतिक विरासत को आज काफी विकृत कर दिया है। और, यह सचमुच चिन्ता की बात है। किन्तु यह चिन्ता, खलने से हटकर, सहज है। इस चिन्ता का पनपना, और उसका सहज-भावी होना भी, केवल इसलिए है कि वह अतीत को आज भी उपयोगी मानती है। और, ऐसा मानकर हम अपने बीच घर कर गयी बुरी और अग्राह्य रूढ़ियों को तोड़ना चाहते हैं।

परन्तु रूढ़ियों को तोड़ने के नाम पर जो हाथ और दिमाग आज तेजी से चल रहे हैं, उन्हें न तो हमारी संस्कृति से कुछ लेना-देना है और ना ही आम आदमी की ताकत स्थापित करने की उनकी कोई मंशा ही है। जबकि सच में तो, कम से कम भारतीय समाज के सन्‍दर्भ में, यह दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। हमारी मान्यताओं को तोड़ने के प्रयासों के पीछे जो इरादे काम कर रहे हैं वे, बस, हमारा आत्म-विश्‍वास भर डिगाना चाहते हैं। उन्हें भरोसा है कि इस धरातल पर हमारे टूट जाने के बाद राष्‍ट्र-विखण्डन के सारे सूत्र स्वयमेव उनके हाथ में होंगे।

क्या सचमुच हमारी संस्कृति, हमारी धार्मिकता, हमारे आदर्श आज के अनुरूप नहीं हैं? इन्हें ‘अनुरूप नहीं’ बताने वाले राजनीति के उस खेल को खेलने में जुटे हैं जो आदमी को आदमी मानती ही नहीं है। वह उसे जानवर (बल्कि, मशीन) से अधिक का दर्जा देने को तैयार नहीं है। और विश्‍वास कीजिए, इस बुद्धि-विलास की आलोचना करना हिन्दू धर्मान्धता अथवा तथाकथित साम्प्रदायिकता कतई नहीं है।

आदि-शक्‍ति के एक स्वरूप की ओर हमारा ध्यान जाता तो जरूर है लेकिन सम्‍भवत: इसका कारण उसकी विकरालता है। क्या कभी हमने इस तरह भी सोचा है कि गांधी का आदर्श अपने सबसे शक्‍ति-शाली स्वरूप में इसी पौराणिक गाथा में निखरता है? क्या कभी हमने इस सम्‍भावना को टटोला है कि हमारे सामाजिक मूल्यों के परिप्रेक्ष्य में महाकाली आदमी और आदमीयत को केन्द्र में रखने वाला ऐसा प्रतीक है जिसे भुलाकर अथवा झुठलाकर हम रूढ़ियाँ नहीं, आदमीयत की श्रेष्‍ठता स्थापित करने का अपना ऐसा सपना तोड़ रहे हैं जिसे गांधी के माध्यम से अब समूची दुनिया में मान्यता मिल चुकी है?

निहित स्वार्थ अच्छे से अच्छे वातावरण में भी अपने लिए जगह बना ही लेते हैं। इस अर्थ में स्वार्थ रक्‍तबीज है जिस पर चोट होते ही उसके रक्‍त की हर एक गिरी हुई बूंद एक नया स्वार्थ पैदा करती है ताकि समाज पर उसकी पकड़ और मजबूत हो। इस शक्‍तिशाली बुराई को समूह की (हिंसक) महाशक्‍ति से सोखने का जो प्रयोग अतीत में हमारे समाज में हुआ (या नहीं हुआ था तो, हमें सीख देने के लिए ही सही, जिसकी कहानी गढ़ी गयी), उसका ही नाम महाकाली है।

तब समाज की सारी अच्छी ताकतों को इकट्‍ठा करके हिंसा को हिंसा के ही प्रयोग से समाप्‍त करने का जो तरीका अपनाया गया था, उसका दु:खद्‌ अनुभव यह है कि न चाहते हुए भी, ताकत का एक नया उन्माद पैदा हुआ था। इस उन्माद में विवेक सूख गया था। रक्‍तबीज का रक्‍त पीते-पीते महाकाली अपना आपा खो बैठी थी और तब हाहाकार मच गया था। हिंसा की इस नयी महाशक्‍ति को रोकना तब किसी भी ताकत के बूते की बात नहीं रह गयी थी।

और तब प्रयोग हुआ था अहिंसा का, प्रेम का, सत्याग्रह का। नीलकण्ठ महाकाली की राह में लेट गये थे। अन्धा उन्माद उन्हें भी कुचलता हुआ बढ़ सकता था, यदि शिव के सत्याग्रह में ताकत की थोड़ी सी भी हेकड़ी होती; महाशक्‍ति के प्रति वैमनस्य की जरा सी भी भावना अथवा अपनी किसी कमजोरी की थोड़ी सी भी हिचक होती। कथानक बतलाता है कि तब ताकतवर शिव की सी निरपेक्ष सापेक्षता ही तब शक्‍ति के उन्माद को शान्त कर सकी थी।

ताकत के खिलाफ, हिंसा के खिलाफ, उन्माद के खिलाफ; सामूहिक ताकत का प्रयोग स्थापित हिंसक प्रतीक का नाश भले ही कर दे किन्तु, अन्‍तत:, उससे भी बड़े एक नये हिंसक उन्माद के ताण्डव की ही राह खोलता है। इसके विपरीत सक्षम की अहिंसा हिंसक मनोवृत्ति को समाप्‍त करने की आधार-भूत सामाजिक आवश्यकता को पूरा करती है।

यही गांधी ने कहा था। यही हमारी सामाजिक-सांस्कृतिक धरोहर है। गांधी ने तो दरअसल संस्कृति की, आदमीयत की, नब्ज पर हाथ भर रखा था। एक ईमानदार वैद्य की तरह। तमाम स्वार्थों से परे, पूरी निस्पृहता से। और तब, प्रकृति के सामंजस्य में आदमीयत कैसे चिरकाल तक जीवित रह सकती है; इस बारे में हमें वे विचार सुझाये थे जिन्हें स्वार्थ में अन्‍धे होकर हम जान-बूझकर भुलाते जा रहे थे। शायद आज भी भुलाना ही चाहते हैं। और इसके लिए सारा दोष अपने सामाजिक अतीत पर, अपनी सांस्कृतिक विरासत पर, मढ़ रहे हैं ताकि स्वार्थों का हमारा मार्ग निष्कण्टक होता जाए।

(२ अक्टूबर २०१९)