३७० तो बहाना है

Sarokar

कश्मीर को लेकर १९४९ में, केवल राष्ट्रपति के आदेश से, भारतीय संविधान में जोड़ी गयी धारा ३७० के कुछ अंश संवैधानिक विधि-विधान पूर्वक हटा क्या लिये गये; कुछ लोगों के लिये जैसे साक्षात्‌ महा-प्रलय ही घट गया! इस जमात का प्रत्येक मोहरा टिटहरी की तर्ज पर आसमान की ओर पैर किये पड़ा दिन-रात टिटहरा रहा है।

इसी साल ५ अगस्त को देश की संसद्‌ के दोनों सदनों ने बहुमत से भारतीय संविधान की धारा ३७० के कुछ अंश निरस्त कर दिये। संविधान यह वे अंश थे जिनका सहारा लेकर, विशुद्ध साम्प्रदायिक आधार पर अविभाजित भारत से विलग हुआ, पाकिस्तान अपने पाँव पूरे कश्मीर पर भी पसारने का प्रयास करता रहा है।

ऐतिहासिक और कानूनी तथ्यों की बारीकियों से कतई अनभिज्ञ रहने वाले अधिकांश भोले भारतीय यह समझ पाने में सिरे से असफल रहे हैं कि धारा ३७० के यह अंश कश्मीर को हड़प लेने की पाकिस्तानी विस्तार-वादी मंशा को हवा देने में किस तरह सहायक हो रहे थे? इन्हीं भारतीयों को कुछ कथित बुद्धि-जीवी भारतीय भी पूरे प्राण-पण से बरगला रहे हैं। और, आभासी दुनिया इसमें उनका सबसे बड़ा आसरा है। इसी माध्यम से एक पत्रिका ‘सबलोग’ का सितम्बर २०१९ अंक मुझे भी भेजा गया जिसमें संविधान की (अस्थाई) धारा ३७० के कुछ अंशों को हटाने की ‘अवैधानिकता’ को पानी पी-पी कर कोसा गया है। इस पक्ष को रखने के लिये, झूठ से सराबोर, भर-पूर समझाइशें परोसी गयी हैं।

उदाहरण के लिये, इसमें एक श्रीमान्‌ विनोद शाही का लेख है। लेख का शीर्षक है, ‘कश्मीर को कश्मीरियत ही बचा सकती है’। कहने को तो यह एकदम सुपाच्य शीर्षक कहा जायेगा। किन्तु, सरल से दिखने वाले इस शीर्षक के विस्तार में जो आलेख है वह लेखक और उनकी मण्डली की बदनीयती से अटी पड़ी है। इसमें आधार-भूत तथ्य में, भाषायी छल से, एक गम्भीर असत्य उँड़ेला गया है कि कश्मीर के तत्कालीन महाराजा हरीसिंह ने जो संधि भारत सरकार से की थी और, महाराजा कश्मीर-विलय के लिये ‘सशर्त’ सहमत हुए थे। मंशा यह संकेत देने की है कि धारा ३७० भारतीय संविधान का अंश बनेगी और वह संविधान का अटल और अपरिवर्तनीय हिस्सा रहेगी। सारा भ्रम-जाल गणित के समीकरणों के ‘जबकि, ऐसा है तो ऐसा होगा’ वाली तर्ज पर इस एक झूठे के ताने-बाने के चौगिर्द बुना गया है कि महाराजा की यह शर्त बाकायदा संधि का हिस्सा थी।

जाहिर है, धारा ३७० का हटाया जाना तो बस एक बहाना है। असली मकसद तो १९४७ की भारत-विभाजन की प्रक्रिया को निरन्तर रूप से बनाये रखना है। क्योंकि, उनके जैसों के लेख देश में भयंकर बद-हजमी पैदा करेंगे; पहले पत्रिका से उठाये गये विनोद शाही के सन्दर्भित लेख के निम्न अंशों का संज्ञान लेना महत्व-पूर्ण होगा —

“..जब कश्मीर का भारत में कुछ शर्तों के आधार पर विलय हो गया था, तो इसका सहज परिणाम यह होना चाहिए था कि वहाँ भारतीयता का संस्कृति के रूप में विकास होता और उसके तहत कश्मीरियत की बात केन्द्र में आती। परन्तु हालात ऐसे हुए कि बात तीनों सम्भव विकल्पों के लिए खुली रह गयीं। कुछ लोग वहाँ आज भी पाकिस्तान में जाने की बात करते हैं। कुछ लोग आज भी आजाद होना चाहते हैं, जबकि बहुत से लोग भारतीय संघ में रहते हुए विशेषाधिकारों को गँवाये बिना विकास करना चाहते हैं।

…कश्मीर को इस असमंजस की स्थिति में डालने के लिए उन साम्प्रदायिक ताकतों की बड़ी भूमिका है, जो कश्मीर में कश्मीरियत तो चाहते हैं, पर भारतीयता के लिए कोई गुंजाइश नहीं पाते। लेकिन उनके लिये कश्मीरियत भी अधिक महत्व नहीं रखती, जिनकी निगाह में मुस्लिम राज्य के रूप में कश्मीर के होने की बात सबसे ऊपर है। पर आज जब धारा ३७० के कुछ प्रावधानों को हटाकर कश्मीर के विशेषाधिकार बहुत हद तक समाप्त कर दिए गए हैं, तो बात फिर से कश्मीरियत के विकास के आस-पास आकर अटक गयी है।

…धारा ३७० के कुछ प्रावधान हटाकर उसे कमजोर करने से कश्मीर अब अपने विशेषाधिकार खो बैठा है। इन विशेष अधिकारों का इतिहास हमें इस राज्य के लोगों की रजामन्दी के महत्त्व को समझने की ओर ले जाता है। इनकी मौजूदगी ने १९४७ के उन हालात को अभी तक जिन्दा बनाये रखा है जिनके तहत यहाँ के सीमान्त प्रदेशों के लोग यह तय करने के लिये आजाद हो पाते हैं कि वे भारत के साथ रहना चाहते हैं या नहीं। और यदि वे आजाद रहना चाहते हैं, तो भी उसमें उनकी रजामन्दी सर्वोपरि हो जाती है। स्पष्ट है कि यह बात राष्ट्र-वादी विचार-धारा के बिल्कुल अनुकूल नहीं है, जिसका मूल सरोकार भारत की अखण्डता है। यह अखण्डता अब लोक चित्त में निर्विवाद रूप में स्वीकृत हो गयी है। इसका विरोध करने के लिये हमें राष्ट्र-वाद को बहु-संख्यक हिन्दू का साम्प्रदायिक अजेण्डा कहना पड़ता है।

…कश्मीर का भारत में कुछ शर्तों के आधार पर विलय हो गया था। कश्मीरियत को ठीक से समझें तो पायेंगे कि इसके इस ओर भारतीयता है और दूसरी ओर साम्प्रदायिक आधारवाले मुस्लिम राष्ट्र की परिकल्पना है।”

आज २६ अक्टूबर है। और, १९४७ में आज ही के दिन कश्मीर के महाराजा ने अपने अधीन जम्मू और कश्मीर के भारत में विलनीकरण की संधि की थी। इसलिये १९४७ में की गयी इस संधि के शब्दश: उद्धरण का आज से उत्तम दिन मेरी दृष्टि में कोई दूसरा नहीं है। भारतीय गण-तन्त्र का अमंगल चाहने वालों द्वारा इस संधि के सशर्त होने के भ्रम-जाल को काटने के लिये भी यही दिन सर्व-श्रेष्ठ होगा —

“…Whereas the Indian Independence Act 1947, provides that as from the fifteenth day of August, 1947, there shall be set up an Independent Dominion known as India, and that the Government of India Act, 1935 shall, with such omission, additions, adaptations and modifications as the governor-general may by order specify, be applicable to the Dominion of India.

…And whereas the Government of India Act, 1935, as so adapted by the governor-general, provides that an Indian State may accede to the Dominion of India by an Instrument of Accession executed by the Ruler thereof.

…Now, therefore, I Shriman Inder Mahander Rajrajeswar Maharajadhiraj Shri Hari Singhji, Jammu and Kashmir Naresh Tatha Tibbetadi Deshadhipathi, Ruler of Jammu and Kashmir State, in the exercise of my sovereignty in and over my said State do hereby execute this my Instrument of Accession and

  1. I hereby declare that I accede to the Dominion of India with the intent that the governor-general of India, the Dominion Legislature, the Federal Court and any other Dominion authority established for the purposes of the Dominion shall, by virtue of this my Instrument of Accession but subject always to the terms thereof, and for the purposes only of the Dominion, exercise in relation to the State of Jammu and Kashmir (hereinafter referred to as “this State”) such functions as may be vested in them by or under the Government of India Act, 1935, as in force in the Dominion of India, on the 15th day of August, 1947, (which Act as so in force is hereafter referred to as “the Act”).
  2. I hereby assume the obligation of ensuring that due effect is given to the provisions of the Act within this state so far as they are applicable therein by virtue of this my Instrument of Accession.
  3. I accept the matters specified in the schedule hereto as the matters with respect to which the Dominion Legislatures may make laws for this state.
  4. I hereby declare that I accede to the Dominion of India on the assurance that if an agreement is made between the Governor General and the ruler of this state whereby any functions in relation to the administration in this state of any law of the Dominion Legislature shall be exercised by the ruler of this state, then any such agreement shall be deem to form part of this Instrument and shall be construed and have effect accordingly.
  5. The terms of this my Instrument of accession shall not be varied by any amendment of the Act or of the Indian Independence Act 1947 unless such amendment is accepted by me by an Instrument supplementary to this Instrument.
  6. Nothing in this Instrument shall empower the Dominion Legislature to make any law for this state authorizing the compulsory acquisition of land for any purpose, but I hereby undertake that should the Dominion for the purposes of a Dominion law which applies in this state deem it necessary to acquire any land, I will at their request acquire the land at their expense or if the land belongs to me transfer it to them on such terms as may be agreed, or, in default of agreement, determined by an arbitrator to be appointed by the Chief Justice Of India.
  7. Nothing in this Instrument shall be deemed to commit me in any way to acceptance of any future constitution of India or to fetter my discretion to enter into arrangements with the Government of India under any such future constitution.
  8. Nothing in this Instrument affects the continuance of my sovereignty in and over this state, or, save as provided by or under this Instrument, the exercise of any powers, authority and rights now enjoyed by me as Ruler of this state or the validity of any law at present in force in this state.
  9. I hereby declare that I execute this Instrument on behalf of this state and that any reference in this Instrument to me or to the ruler of the state is to be construed as including to my heirs and successors.

…Given under my hand this 26th day of OCTOBER nineteen hundred and forty seven.

(Hari Singh, Maharajadhiraj of Jammu and Kashmir State)

I do hereby accept this Instrument of Accession. Dated this twenty seventh day of October, nineteen hundred and forty seven.

(Mountbatten of Burma, Governor General of India)”

(२६ अक्टूबर २०१९)

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