कोविड-१९ बनाम महामारी : कथ्य-१

Sarokar

वैसे तो इसमें अन्तिम विजय मानव की ही होगी; किन्तु, उसकी यह विजय सदा स-शर्त रहेगी — विषाणु का समूल नाश कभी नहीं होगा। क्योंकि, ऐसे किन्हीं भी प्रयासों से विनष्ट होने से बच रहे विषाणु स्वयं को परिवर्धित कर अपनी प्रकार के भविष्य के समूहों को ऐसे प्रत्येक प्रयास-विशेष के प्रति पूरी तरह से प्रतिरोधी बना लेंगे। सरल शब्दों में, मानव तथा विषाणु के बीच अस्तित्व का ऐसा सन्तुलन सदा बना रहेगा जिसका पलड़ा एक सीमा तक मनुष्य के पक्ष में झुका होगा।

यद्यपि इन पंक्तियों के लिखे जाने तक दुनिया भर के अनेक देशों की, आधुनिक कही जाने वाली चिकित्सा-पद्धति से जुड़ी, विभिन्न प्रयोग-शालाओं ने प्राथमिक रूप से यह दावे किये हैं कि वे कोविड-१९ का कोई न कोई सफल उपचार ढूँढ़ लेने के बहुत पास पहुँच चुके हैं। तथापि निर्विवादित रूप से, दुनिया को सन्तुष्ट कर पाने वाला एक भी ‘उपचार’ अभी तक सामने नहीं आया है।

एक रोचक स्थिति यह भी बनी है कि कोरोना से जुड़े चिकित्सा-अनुसन्धान से सम्बन्ध रखने वाला कोई समूह जैसे ही यह दावा करता है कि उसने कोविड-१९ का सफल उपचार करने वाली कोई दवा खोज ली है तो, ऐसी जानकारी के उसकी प्रयोग-शाला से बाहर आते ही, प्रतिद्वन्द्वी बिना कोई विलम्ब किये उस दावे की हवा निकालने लग जाते हैं।

इस बिन्दु पर, यद्यपि इस सम्भावना को सिरे से नकारा नहीं जा सकता है कि बाजार की ओछी प्रतिद्वन्द्विता इस नकारात्मकता का एक कारण हो। ऐसा वातावरण सम्भवत: इसलिये भी बना है कि औषधि के बाजार में केवल अपनी ही बनायी किसी नयी औषधि के लिये जगह सुनिश्चित करने में जुटे वर्ग का प्रत्येक खिलाड़ी, अपने-अपने ढंग से, इस प्रयास में है कि बाजार की लगाम उसके हाथों में आने से पहले यदि कोई अन्य प्रतियोगी सफलता का दावा करे तो वह उसे, येन-केन-प्रकारेण, सिरे से ही नकार दे। आरोप तो अब विश्व स्वस्थ्य संगठन की मंशा पर भी लगने लगे हैं। किन्तु कारण चाहे जो हों, ठोस तर्कों के सहारे ऐसे तथाकथित कुतर्कों का दृढ़ता-पूर्वक खण्डन कभी नहीं किया गया।

तात्पर्य यह कि आज का एकदम सीधा और सपाट तथ्य यही है कि अभी तक एक भी ऐसी विषाणु-रोधक औषधि सामने नहीं आयी है जिसे, चिकित्सकीय दृष्टि से, कोविड-१९ के सफल उपचार के लिये प्रमाणित किया गया हो। ना ही ऐसा कोई निर्विवाद टीका विकसित हो पाया है। कुछ विषाणु-रोधी ब्रॉड-स्पेक्ट्रम औषधियों को ले कर कोविड-१९ के उपचार की क्लीनिकल ट्रायल्स अवश्य की गयी हैं और ऐसे दावे भी किये गये हैं कि उनमें सीमित सफलतायें देखने को मिली हैं। फिर भी, आम जन के मन में इस आशंका का उठना सहज-स्वाभाविक है कि कोविड-१९ का आतंक कहीं मानव-जीवन के अस्तित्व को सदा-सर्वदा के लिये मिटा तो नहीं देगा?

इसी बीच अब तो यह दावा भी किया जाने लगा है कि कोविड-१९ का कारक विषाणु स्वत: कमजोर होने लगा है! ऐसे दावों ने स्थिति को बहुत रोचक बना दिया है। क्योंकि जहाँ एक ओर, ऐसे दावों के पीछे बाजार में अपनी पकड़ बनाने से पिछड़ रहे तत्वों की, बाजार में अपनी प्रतिद्वन्द्विता बचाये रखने जैसी, किसी भूमिका को सिरे से नकारा नहीं जा सकता है; वहीं दूसरी ओर, तर्क-पूर्ण बुद्धि रखने वालों के लिये, इसके समर्थन में दिये जा रहे कथित तर्कों को पचा पाना कतई असम्भव है। विशेष रूप से तब जब मानव अस्वास्थ्य से जुड़ा इतिहास यह दिखाता है कि कैसे किसी विषाणु-विशेष से मुक्ति के ‘अध-कचरे और अवैज्ञानिक प्रयास’ समूची मानव-प्रजाति को उससे भी घातक, उसके ही, किसी नये प्रकार से पीड़ित होने को विवश करते आये हैं?

सम्भवत:, विषाणु के कमजोर होते जाने वाले दावे का सूत्र-पात्‌ केवल इसलिये हुआ है ताकि औषधि-बाजार को अपनी पकड़ में लेने से पिछड़ रहे सारे प्रतियोगी ऐसे ही किन्हीं न किन्हीं दावों के माध्यम से ही अपनी पहले से प्रचलित दवाओं के बाजार को सुनिश्चित रख सकते हैं!

यद्यपि, मेरी अपनी भी प्रबल धारणा है कि ऐसा होगा अवश्य कि निकट भविष्य से कोविड-१९ के दुष्प्रभाव उतने प्रबल और व्यापक नहीं रहेंगे जितने कि वे इन दिनों देखने में आ रहे हैं। किन्तु ऐसा होना और इसके कारक विषाणु का निरन्तर कमजोर होते जाना दो सर्वथा भिन्न तथ्य हैं। दरअसल, कोविड-१९ के दुष्प्रभावों का पहले जितना प्रबल और व्यापक नहीं रह पाना विषाणु के निरन्तर कमजोर होते जाने से नहीं अपितु, केवल और केवल, मानव शरीर में इनके दुष्प्रभावों से क्षमता-पूर्वक निपट लेने की प्रकृति-प्रदत्त क्षमता के स्वत: ही, और लगातार भी, विकसित होते जाने से होगा। और, इसका आधार सम्बन्धित ‘अस्तित्व-धारी’ के अपने रक्षा-तन्त्र की गुणवत्ता में, परिस्थिति के अनुसार, होते रहने वाले निरन्तर विकास में निहित है।

इस बिन्दु पर, इसके उस परन्तुक का भी उल्लेख आवश्यक है जो कहता है कि विकास का यह क्रम एक-पक्षीय नहीं होता है। यह सदा से ही द्वि-पक्षीय रहता आया है। और, वैसे तो इसमें अन्तिम विजय मानव की ही होगी; किन्तु, यह उसकी यह विजय सदा स-शर्त रहेगी — विषाणु का समूल नाश कभी नहीं होगा। सरल शब्दों में, मानव तथा विषाणु के बीच अस्तित्व का ऐसा सन्तुलन सदा बना रहेगा जिसका पलड़ा एक सीमा तक मनुष्य के पक्ष में झुका होगा।

उपर्युक्त परिप्रेक्ष्य में, स्वाभाविक रूप से, एक परिकल्पना का स्वरूप उभरता है जिसे यहाँ प्रस्तावित कर रहा हूँ —

“कोरोना विषाणुओं के गुणों-प्रभावों के साथ ही साथ उनसे उत्पन्न हुई बीमारियों के उपचार पर भी विचार करते समय जीव-विज्ञान का यह आधार-भूत तथ्य हमेशा महत्व रखेगा कि विषाणु चाहे कोई भी हो, वह परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को परिवर्धित करने की महारत रखता है। यह इसलिए कि, इसी में उसके पर-जीवी अस्तित्व की रक्षा का आधार निहित है।

इसी बिन्दु पर यह तथ्य भी आधार-भूत है कि यहाँ उल्लिखित ‘परिस्थितियाँ’ सामान्य स्थितियों में उल्लेख की जाने वाली परिस्थितियों जैसी सरल तथा एक आयामी नहीं हैं। अपितु वे अति क्लिष्ट और बहु-आयामी हैं। क्योंकि इनमें, आक्रान्ता के बलात्‌ प्रवेश से निपटने की प्रतिक्रिया-स्वरूप आक्रान्त के शरीर में समानान्तर रूप से आरम्भ होने वाले, ‘जैविक प्रतिकार’ के आन्तरिक प्रयासों के अतिरिक्त उसके ऐसे प्रयासों के परिणाम में आक्रान्ता में भी होने वाली समस्त प्रति-क्रियाएँ भी जुड़ जाती हैं। और क्योंकि, ऐसी परस्पर प्रति-क्रियाओं का कोई अन्त नहीं होता है, परस्पर प्रति-क्रियाओं की यह कड़ी-बद्ध प्रक्रिया स्वाभाविक रूप से अग्रसर होती जाती है। अर्थात्‌, यह ऐसी अन्त-हीन श्रृंखला है जो दोनों के ही परस्पर अस्तित्व को सदा-सर्वदा के लिये मिट जाने से बचाये रखती है।

दूसरी ओर अलग से केवल विषाणुओं की बात करें तो, वे कोशिका-विहीन ऐसे अस्तित्व हैं जिनका गठन नाभिकीय अम्ल और प्रोटीन के मेल से होता है। यही कारण है कि विषाणु केवल जीवित कोशिका में ही अपना अस्तित्व बनाये रख सकते हैं। और उसी में अपने प्रकार की वृद्धि भी कर सकते हैं। अपने मेजबान जीव के शरीर के बाहर ये मृत-समान होते हैं; वह भी मात्र छोटी सी सीमित अवधि के लिये ही। ऐसी अवधि के उस पार उनका अस्तित्व स्वत: समाप्त हो जाता है। परन्तु, इस छोटी और सीमित अवधि की समाप्ति से पहले यदि उन्हें अपने अनुकूल कोई नया मेजबान मिल जाये तो उसके भीतर वे पुन: सक्रिय हो उठते हैं।

विषाणु का प्रकार चाहे जो हो, अपने अस्तित्व की रक्षा के प्रति जन्म-जात्‌ रूप से इतना ‘सतर्क’ और ‘समझदार’ होता है कि वह उसमें योग-दान कर रहे जीव के अस्तित्व को सर्वथा नष्ट नहीं करता है। इसका कारण बिल्कुल सहज है — अपने अस्तित्व की रक्षा के लिये विषाणु एक अनुकूल जीवित कोशिका पर ही आश्रित है। और इसलिये, यदि उस जीव-विशेष का अस्तित्व पूरी तरह से समाप्त हो जाये तो उस पर निर्भर उस विषाणु का अपना भी अस्तित्व शेष नहीं रहेगा। प्रकारान्तर से, यह शिकार तथा शिकारी के बीच उभरने वाले एक स्वाभाविक सह-अस्तित्व का उत्तम उदाहरण है जिसे ‘अस्तित्व की विशिष्टता’ कह सकते हैं।

इसका सरल सा निहितार्थ जहाँ यह है कि विषाणुओं के किसी भी प्रकार-विशेष का सर्वथा नाश कर देने का कोई भी मानवीय प्रयास कभी सफल नहीं होगा। वहीं इसका एक गूढ़ार्थ भी है जो समझाता है कि ऐसे किन्हीं भी प्रयासों से विनष्ट होने से बच रहे विषाणु स्वयं को परिवर्धित कर अपनी प्रकार के भविष्य के समूहों को ऐसे प्रत्येक प्रयास-विशेष के प्रति पूरी तरह से प्रतिरोधी बना लेंगे। अर्थात्‌, जब तक कोई प्रायोगिक विधि प्रयोग-शाला और/अथवा अनुसंधान-शाला से निकल कर विषाणु-विशेष पर, व्यापक रूप से, प्रयुक्त होने लायक विकसित होती है; तब तक वह व्यवहारिक संसार में विषाणुओं के उस प्रकार-विशेष पर प्रभावी रूप से प्रयुक्त होने लायक रहती ही नहीं है।”

उपर्युक्त परिकल्पना कोविड-१९ से जुड़े समस्त आधार-भूत प्रश्नों का समुचित समाधान करने में अपने-आप में पूरी तरह से समर्थ है। यहाँ तक कि, कोविड-१९ के प्रभाव की भिन्नता की बात एक राष्ट्र-विशेष की तुलना में किसी अन्य राष्ट्र-विशेष के सन्दर्भ में हो या फिर एक ही राजनैतिक और/अथवा भौगोलिक क्षेत्र में बसने वाले समाज के विभिन्न सदस्यों के सन्दर्भ में; इनके बीच इस महामारी के प्रभावों की भिन्नता का स्पष्टीकरण भी इस परिकल्पना में समुचित रूप से विहित है।

कोविड-१९ के दुष्प्रभाव के परिप्रेक्ष्य में, इस बिन्दु पर, विचारवानों के मष्तिष्क में कौंधने वाले यह तीन स्वाभाविक प्रश्न महत्व रखते हैं कि (अ) क्या प्रभावित भौगोलिक क्षेत्रों की सारी मानव-आबादी कोविड-१९ की चपेट में आयेगी?; (ब) यदि नहीं तो क्यों? और (स) यदि समूची आबादी सिरे से इसकी चपेट में नहीं आने वाली है तो इस भेद के पीछे भूमिका अदा करने वाले कारक क्या हैं? और वे कौन व्यक्ति होंगे जो इसके दुष्प्रभाव से बचे रहेगें?

एलोपैथी के पास इनमें से किसी भी प्रश्न का कोई तार्किक समाधान नहीं है। यह इसलिये कि चिकित्सा की यह विधा विशुद्ध रूप से एकांगी है। और, एकांगी इसलिये कि औसत रूप से यह केवल शरीर में बलात्‌ अतिक्रमण करने वाले कारकों को ही अपना लक्ष्य बनाती है। अर्थात्‌, यहाँ ऊपर प्रस्तावित परिकल्पना इसके सोच से कोसों दूर छूटी रहती है। जिसका परिणाम यह होता है कि जहाँ एक ओर व्याधि-विशेष के लौट आने का भय सदा रहने-सर्वदा वाला है, वहीं दूसरी ओर ऐसी व्याधि के कारक विषाणुओं का निरन्तर अधिक बलवान/क्षमतावान होते जाना भी शत्‌-प्रतिशत्‌ सुनिश्चित है। यही नहीं, व्याधियों तथा उनके एलोपैथिक उपचारों के इतिहास के ईमानदार दार्शनिक विश्लेषण से जुड़े प्रत्येक पन्ना इसी सुनिश्चितता की इस आधार-भूत सचाई से भरा पड़ा है कि अतीत में, व्याधि-विशेष पर, प्रभावी मानी गयी प्रत्येक एलोपैथिक औषधि धीरे-धीरे, उसी पर, प्रभावहीन सी होती जाती है।

इस बिन्दु पर, यह जोड़ना महत्व-पूर्ण ही नहीं बल्कि आवश्यक भी है कि यह व्यक्ति-विशेष की अपनी विशिष्टता होती है जो निश्चित करती है कि उसके स्वास्थ्य पर विषाणु-विशेष का कोई दुष्प्रभाव पड़ेगा या नहीं; और यदि पड़ेगा भी तो वह कितना गम्भीर होगा?

एलोपैथिक चिकित्सा-विधा में अस्तित्व की ऐसी विशिष्टता को अलग से कोई विशेष महत्व नहीं मिला है। जबकि इसके उलट, आयुर्वेद और होमियोपैथी चिकित्सा-विधाओं में अस्तित्व की ऐसी विशिष्टताओं को आधार-भूत महत्व प्राप्त है। इसे, बड़ी सीमा तक, आयुर्वेद में वर्णित त्रिदोष और होमियोपैथी में वर्णित कॉन्स्टिट्यूशन के अर्थों में देखा-समझा जा सकता है जो किसी व्यक्ति-विशेष की अपनी विशिष्टताएँ ही हैं। और, यही निर्धारित करती हैं कि विषाणु का प्रकार-विशेष किसी व्यक्ति-विशेष को अपने दुष्प्रभावों की चपेट में ले पायेगा या नहीं? और यदि ले भी पाया तो, उस व्यक्ति-विशेष पर ऐसी किसी चपेट के दुष्प्रभावों के विस्तार की सीमा-रेखा कहाँ खिची होगी?

(०७ जुलाई २०२०)

(जारी है . . .)