कोविड-१९ बनाम महामारी : कथ्य-२

Sarokar

आयुर्वेद पीड़ित व्यक्ति के भौतिक (Physical) अवलोकनों से प्राप्त होने वाली जानकारियों के आधार पर अलग-अलग दोषों में अलग-अलग भौतिक सुधारों को अपने उपचार का लक्ष्य बनाती है और तदनुसार ही अपनी औषधि निर्धारित करती है। जबकि होमियोपैथी व्यक्ति-विशेष से सम्बन्धित दैहिक (Phisiological) सूचनाओं का मूल्यांकन कर, और फिर अवचेतन में विलुप्त-प्राय हो चुकी इन दैहिक क्षमताओं को पुनर्जागृत कर, उन्हें ही सम्बन्धित व्यक्ति का समग्रित उपचार करने की प्रेरणा देती है।

विश्व के प्रत्येक कोने में आज-कल इन्हीं ज्वलन्त प्रश्नों की गूँज सुनाई देती मिल जाती है कि ‘विषाणु का प्रकार-विशेष किसी व्यक्ति-विशेष को अपने दुष्प्रभावों की चपेट में ले पायेगा या नहीं? और यदि ले भी पाया तो, उस व्यक्ति-विशेष पर ऐसी किसी चपेट के दुष्प्रभावों के विस्तार की सीमा-रेखा कहाँ खिची होगी?’ और क्योंकि उपचार हो अथवा बचाव, इन प्रश्नों का सीधा सम्बन्ध चिकित्सा के आयुर्वेद तथा होमियोपैथी, दोनों ही, दर्शनों से है; इसलिए ऐसे आधार-भूत बिन्दुओं पर इनकी परस्पर समीक्षा का बहुत महत्व है। यह इसलिए कि, वह कोविड-१९ हो या वायरस-जनित कोई अन्य अस्वस्थता, ऐसी समीक्षा से ही उनके उपचार/समाधान हेतु समुचित औषधि/चिकित्सा-विधा का निर्धारण सम्भव है।

इसमें दो मत नहीं कि कम से कम इस एक बिन्दु पर चिकित्सा की यह दोनों विधायें एक-मत हैं कि इनमें औषधि-निर्माण की अपनी-अपनी जो प्रक्रियायें हैं उनमें कच्चे औषधीय पदार्थों का अपना समूचा स्वरूप ही प्रयुक्त होता है। अर्थात्‌, उनमें से किसी कारक-विशेष को पृथक कर उससे औषधि नहीं बनायी जाती। जबकि इसके उलट, अधिकांश एलोपैथी औषधियों के निर्माण में पृथक-करण की इसी विधि का प्रयोग किया जाता है।

किन्तु, ऐसी आधार-भूत एक-रूपता के बाद भी आयुर्वेद तथा होमियोपैथी पारस्परिक रूप से सर्वथा भिन्न हैं। पहली बात तो यह है कि जहाँ एक ओर आयुर्वेद में औषधीय पदार्थ की पर्याप्त भौतिक मात्रा का प्रयोग होता है तथा इसमें (अधिक गहरी प्रभाव-शीलता के लिये) उत्तरोत्तर अधिक मात्राओं के उपयोग का भी प्रावधान है; वहीं दूसरी ओर होमियोपैथीय औषधियों के निर्माण में औषधीय पदार्थ की न्यूनतम्‌ भौतिक मात्रा ही प्रयुक्त होती है। इतना ही नहीं, इस विधा में औषधीय पदार्थ की भौतिक मात्रा को न्यूनतम्‌ करते जाने की कोई सीमा-रेखा भी नहीं खिची है अधिकांश अवसरों पर तो, भौतिक सत्यापन की पराकाष्ठा पर पहुँच कर, किसी पदार्थ-विशेष की उपस्थिति/अनुपस्थिति की पुष्टि करने की आधुनिक विज्ञान की क्षमता भी होमियोपैथी की औषधि-विशेष में प्रयुक्त हुए मूल औषधीय पदार्थ की भौतिक उपस्थिति की पुष्टि नहीं कर पाती है।

वहीं दूसरी बात यह है कि इन दोनों विधाओं के अन्तर्गत्‌ औषधियों के निर्धारण के सैद्धान्तिक आधार (त्रिदोष/कॉन्स्टिट्यूशन) परस्पर भिन्न हैं। अस्वास्थ्य-विशेष के लिये आयुर्वेदीय औषधियों का निर्धारण ‘वात’, ‘कफ़’ तथा ‘पित्त’ के रूप में रेखांकित की गयी तीन भौतिक (Physical) विशिष्टताओं के आधार पर किया जाता है; जबकि इसके उलट होमियोपैथिक औषधियाँ ‘सोरिक’, ‘साइकोटिक’ तथा ‘सिफ़िलिटिक’ के रूप में वर्गीकृत की गयी तीन दैहिक (Phisiological) विशिष्टताओं के आधार पर निर्धारित होती हैं।

एक तीसरी बात और भी है। वह यह कि आयुर्वेदिक चिकित्सा-पद्धति में उपचार की पहल (Initiative) हमेशा औषधीय पदार्थ (Substance) के हाथों में होती है। जबकि इसके उलट, होमियोपैथी का चिकित्सा-दर्शन कहता है कि ऐसी कोई पहल औषधीय पदार्थ के हाथों में नहीं होती। होमियोपैथिक औषधियाँ दिये जाने पर, समस्त पहल व्यक्ति-विशेष का अपना शरीर ही करता है।

यहीं चिकित्सा की आयुर्वेदीय और होमियोपैथीय पद्धतियों के बीच का यह दार्शनिक अन्तर भी सदा ध्यान में रखने योग्य है कि जहाँ उपचार की आयुर्वेदीय विधि में मानव-शरीर के अवचेतन में विहित क्षमताओं की सर्वथा उपेक्षा होती है, वहीं इस उपचार-विधि से उपचार करा रहे व्यक्ति पर औषधियों की भौतिक मात्रा का लम्बी अवधि तक नियमित/लगातार रूप से भी प्रयोग होता है। और क्योंकि, औषधि-विशेष की भौतिक मात्रा के प्रयोग की प्रत्येक व्यक्ति की अपनी अलग सुरक्षा-सीमा होती है; इसका उल्लंघन होने पर, आरम्भ में जिन औषधियों के वाँछित लाभ मिलते दिखायी देते हैं, बाद में उन्हीं औषधियों के अपने ही ऐसे अवाँछित द्वितीयक (Secondary) लक्षण उभरने की सम्भावनाएँ पनपती हैं जिनके दुष्चक्र में फँस जाने पर पुन: सहज-स्वस्थ्य हो पाना पीड़ित व्यक्ति के लिये दुष्कर हो जाता है।

जबकि इसके उलट, होमियोपैथीय पद्धति इन तीन आयामों के समुचित समन्वय के पश्चात्‌ ही अपनी औषधि निर्धारित करती है (अ) व्यक्ति-विशेष के अवचेतन में विहित उसकी अपनी दैहिक सूचनाएँ; (ब) उसमें विहित वे दैहिक सूचनाएँ जिनका जुड़ाव उसकी अपनी बीती पीढ़ियों से हो; और (३) औषधीय पदार्थों में अन्तर्विहित ऐसी सूचनाएँ जो उनमें, उनके अपने विकास-क्रम से, जुड़ती आयी हों। यही नहीं, क्योंकि होमियोपैथीय औषधियों में औषधीय पदार्थ की मात्रा नगण्य की सीमा तक न्यून होती जाती है; इसकी सटीक औषधि तथा उसकी समुचित मात्राओं के उपयोग से किये जाने वाले उपचार में ऐसे किसी अवाँछित द्वितीयक लक्षण के उभरने की सम्भावना नहीं होती है।

फिर, होमियोपैथी के चिकित्सा-दर्शन में बहुत सारी औषधियाँ ऐसी भी हैं जिनकी निचली शक्तियाँ (तुलनात्मक रूप से अधिक भौतिक मात्राएँ) व्यक्ति के उन लक्षणों पर काम करती हैं जिन्हें समझ की सुविधा के लिये ‘प्राथमिक’ कहा जा सकता है; जबकि इन्हीं की उच्च शक्तियाँ (तुलनात्मक रूप से कम भौतिक मात्राएँ) व्यक्ति के उन लक्षणों पर काम करती हैं जिन्हें समझ की सुविधा के लिये ‘द्वितीयक’ कह सकते हैं। यही नहीं, यह दोनों लक्षण परस्पर विपरीत-ध्रुवी होते हैं। उदाहरण के लिये, व्यक्ति-विशेष की कब्ज की शिकायत के निवारण के लिये यदि होमियोपैथीय औषधि निचली शक्ति (Potency) में निर्धारित होती है तो उसी व्यक्ति-विशेष में प्राकृतिक कारणों से उभरने वाले दस्तों के लिये इसी औषधि-विशेष को समुचित उच्चतर शक्ति में दिये जाने का प्रावधान है।

स्पष्ट है, चिकित्सा की आयुर्वेद और होमियोपैथी विधाएँ इस अर्थ में एक-रूपता रखती हैं कि दोनों ही व्यक्ति के आन्तरिक सुरक्षा-तन्त्र की सुदृढ़ता को अपना लक्ष्य निर्धारित करती हैं। किन्तु, यह दोनों चिकित्सा-विधाएँ इस अर्थ में परस्पर भिन्न-रूपा भी हैं कि जहाँ आयुर्वेद पीड़ित व्यक्ति के भौतिक अवलोकनों से प्राप्त होने वाली जानकारियों के आधार पर अपनी औषधि निर्धारित करती है; वहीं होमियोपैथी में व्यक्ति-विशेष से सम्बन्धित दैहिक सूचनाओं के मूल्यांकन को औषधि-निर्धारण का आधार बनाया जाता है।

यद्यपि, तुलनात्मक समीक्षा के इस बिन्दु पर यह जोड़ना भी आवश्यक है कि इससे यह निष्कर्ष निकालना त्रुटि-पूर्ण होगा कि आयुर्वेद एक अस्वास्थ्य-कर चिकित्सा-विधा है; तथापि, यह तो है ही कि उपर्युक्त तुलना इस आवश्यकता को बल दे कर रेखांकित करती है कि यहाँ इन दोनों विधाओं की और भी सूक्ष्म समीक्षा की जानी चाहिये।

अपने आप में कतई अकाट्य उपर्युक्त तुलनात्मक समीक्षा से दो तथ्य रेखांकित होते हैं (अ) वह कोविड-१९ (अथवा विषाणु-जनित कोई अन्य बीमारी) हो या फिर अन्यान्य कारणों से उत्पन्न हुईं विविध स्वास्थ्य-समस्यायें, चिकित्सा-प्रक्रिया में आयुर्वेद तथा होमियोपैथी अपने-अपने स्तरों पर, और अपने-अपने ढंग से भी, सीधे-सीधे अस्वास्थ्य के कारक जीवाणु/विषाणु को नहीं बल्कि पीड़ित व्यक्ति के शरीर को अपना लक्ष्य बनाती हैं; और (ब) आयुर्वेद, त्रिदोष पर आधारित स्वास्थ्य-दोषों के प्रकाश में, भौतिक आधारों पर औषधि का निर्धारण करती है जबकि इसके उलट, होमियोपैथी सम्बन्धित व्यक्ति के अवचेतन में विहित उन दैहिक जानकारियों का समग्रित समन्वय कर उपचार करती है जिन्हें वह उसका कांस्टिट्यूशन कहती है।

दोनों विधाओं का उपर्युक्त अन्तर बहुत आधार-भूत है। क्योंकि, इसकी युक्ति-युक्त समीक्षा यह बतलाती है कि जहाँ आयुर्वेद पीड़ित के अलग-अलग दोषों में अलग-अलग भौतिक सुधारों को अपने उपचार का लक्ष्य बनाती है और तदनुसार ही औषधि निर्धारित करती है; वहीं होमियोपैथी व्यक्ति-विशेष के अवचेतन में विलुप्त-प्राय हो चुकी दैहिक क्षमताओं को पुनर्जागृत कर, उन्हें ही सम्बन्धित व्यक्ति का समग्रित उपचार करने की प्रेरणा देती है।

इस अन्तर के निहितार्थ बिल्कुल दो-टूक हैं परिस्थितियों के पुन: विपरीत होने पर आयुर्वेदीय विधि से उपचारित व्यक्ति को फिर-फिर उपचार की आवश्यकता पड़ती रहेगी। और, सम्भव है कि यह प्रक्रिया अन्त-हीन भी हो जाये। जबकि इसके विपरीत, होमियोपैथी से उपचारित हुए व्यक्ति को उपचार की इतनी निरन्तर आवश्यकता नहीं होती। यहाँ, इस सम्भावना को स्वीकारने में कोई द्विविधा नहीं कि व्यक्ति-विशेष को होमियोपैथीय औषधियों की आवश्यकता एकाधिक बार भी पड़े। किन्तु, इसमें भी दो राय नहीं हैं कि जहाँ ऐसे दोहरावों के बीच का परस्पर अन्तराल उत्तरोत्तर बढ़ता जायेगा वहीं इस प्रकार से पुन: पीड़ित होते व्यक्ति के स्वास्थ्य-दोष की गम्भीरता में भी पर्याप्त कमी आती जायेगी। और, ऐसी स्थिति आती ही है कि व्यक्ति उस दोष से स्थायी मुक्ति पा लेता है।

उपर्युक्त तथ्य जितना द्विविधा-रहित है, उसका निहितार्थ भी उतना ही स्पष्ट है   होमियोपैथी उस व्यक्ति को विद्यमान जीवन-काल में अंगीकार किये गये स्वास्थ्य-दोषों से तो मुक्त करती ही है; वंश-गत्‌ रूप से उसमें आये स्वास्थ्य-दोषों से भी मुक्ति दिला सकती है। यही नहीं, उसकी ऐसी मुक्ति के बाद उसके जीवन में आयी उसकी अगली पीढ़ी भी इन वंश-गत्‌ स्वास्थ्य-दोषों से सदा के लिये मुक्त रहती है।

स्पष्ट है, इस स्तर पर आकर आयुर्वेद की तुलना में होमियोपैथी एक श्रेष्ठतर चिकित्सा-विधा स्थापित होती है।

और क्योंकि होमियोपैथी व्यक्ति-विशेष के अवचेतन में विहित उन दैहिक जानकारियों को उसके अस्वस्थ होने का आधार मानती है जिन्हें वह उसका कांस्टिट्यूशन कहती है, यहाँ यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि समान वातावरण और परिस्थितियों में क्या व्यक्ति-विशेष ही अस्वस्थ होंगे जबकि शेष का स्वास्थ्य सामान्य बना रहेगा? यहीं यह प्रश्न भी जन्म लेगा कि तब ऐसे व्यक्ति कौन होंगे जो विषाणु-विशेष के अतिक्रमण से अस्वस्थ हो सकते हैं?

विकट से प्रतीत होते इस प्रश्न का अत्यन्त सहज उत्तर होमियोपैथी के पास है। यह समझाता है कि इसका भेद व्यक्तियों के अपने ही जीवन-चक्रों के आरम्भ से जुड़ी, उनके अपने अतीत की, क्लिष्टताओं में छिपा है। सरल शब्दों में कहें तो, वही व्यक्ति ऐसे अतिक्रमण से अस्वस्थ होंगे जिनके शरीर, अपने कांस्टिट्यूशन-विशेष के कारण, सम्बन्धित विषाणु-विशेष को अंगीकार करने और अपने भीतर उसका पालन-पोषण करने को आतुर/तत्पर होंगे।

जबकि, जिन व्यक्तियों में ऐसे विषाणुओं को अंगीकार करने और/अथवा अपने भीतर उनका पालन-पोषण करने की प्राकृतिक आतुरता/तत्परता नहीं रहती है; उनमें यदि वह विषाणु प्रवेश कर भी लें तो वह (१) या तो, प्रकृति द्वारा उसके लिये पूर्व-निर्धारित समय-सीमा में, स्वयं नष्ट हो जाते हैं; (२) या फिर शरीर में, ऐसी एक न्यून सी सीमा से आगे अपनी संख्या का विस्तार किये बिना, केवल निष्प्रभावी अर्थ तथा संतुलन की अवस्था में, पड़े रहते हैं जिसमें उनकी उपस्थिति के बाद भी उन व्यक्तियों के स्वास्थ्य का सामान्य भाव बना रहता है। दूसरे शब्दों में, वह व्यक्ति-विशेष किसी ऐसी गम्भीर स्वास्थ्य-समस्या से पीड़ित नहीं हो पाते हैं जिसके लिये सम्बन्धित विषाणु-विशेष जाना जाता है।

यही नहीं, होमियोपैथी की सार्थक औषधियों के समुचित प्रयोग से व्यक्ति को उसके कॉन्स्टिट्यूशन सम्बन्धी दोषों से भी मुक्ति दिलायी जा सकती है। और इस प्रकार, उन व्यक्तियों के शरीरों को भी उन विषाणु-विशेष के दुष्प्रभावों से सर्वदा के लिये मुक्त किया जा सकता है जिनके बारे में यह माना जाता है कि या तो उनके और विषाणु के बीच तुला का दण्ड सदा विषाणु के पक्ष में झुका होता है अथवा इन दोनों के बीच अस्तित्व का एक प्राकृतिक सामन्जस्य बना रहता है।

और, अन्त में सिद्धान्त के धरातल पर लाख टके का यह सवाल कि ‘कोरोना विषाणु अथवा कोविड-१९ की आज की ज्वलन्त परिस्थिति में, आम जन के लिये, क्या होमियोपैथी की कोई पूर्व-निर्धारित औषधि सुझायी जा सकती है?’ दशकों का अनुभव मुझे इसका उत्तर, किसी सी संशय से परे, पूरी सकारात्मकता से देने को प्रेरित करता है। कोरोना की सार्स (२००२), बर्ड/एवियन फ़्लू (२००३), स्वाइन फ़्लू (२००९-१०), तथा मर्स (२०१९) जैसी, ‘कोविड-१९’ की पिछली बतायी जा रहीं पीढ़ियों से जुड़े होमियोपैथी की औषधियों के सफल प्रयोग इस सकारात्मकता के ठोस आधार हैं।

वह कोविड-१९ हो अथवा वायरस-जनित कोरोना के रोगों का कोई अन्य प्रकार, सभी के बारे में बनी मोटी समझ बतलाती है कि इसका दुष्प्रभाव मूलत: मनुष्य के फेफड़ों को प्रभावित करता है। और, इसका निहितार्थ यह है कि यदि व्यक्ति के फेफड़ों को एक सीमा से आगे अस्वस्थ होने से रोक दिया जाये तो सम्बन्धित व्यक्ति के स्वास्थ्य को चिन्ता-जनक होने से बचाया जा सकता है। इतना ही नहीं, उसका सामान्य स्वास्थ्य एक संक्षिप्त अवधि के भीतर पुन: स्थापित भी किया जा सकता है। और क्योंकि एक स्वस्थ जीव की यह सहज-स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है कि एक बार भुगत लेने के बाद, भविष्य के ऐसे किसी प्रयास से स्वयं को सुरक्षित रखने के लिये, वह अपने भीतर प्राकृतिक रूप से ही सम्बन्धित आक्रान्ता की एण्टी-बॉडी बनाने लगता है; आक्रान्ता के उस प्रकार-विशेष के दुष्प्रभावों से सदा के लिये सुरक्षित बन जाता है।

यहीं होमियोपैथी के उपचार का विशेष महत्व रेखांकित होता है। क्योंकि इसके माध्यम से की जाने वाली सामान्य स्वास्थ्य स्थापना द्वि-आयामी होती है। जैसा कि यहाँ पहले लिखा जा चुका है, उपचार की दूसरी विधियाँ बाहरी प्रयासों पर आधारित होकर ही उपचार करने का प्रयास करती हैं; जबकि इसके उलट, होमियोपैथी शरीर के अन्तस्‌ में बिसरा दी गयी क्षमताओं को पुनर्जागृत करने को ही अपनी चिकित्सा का आधार बनाती है। इसका बहुत स्पष्ट लाभ यह होता है कि इसके माध्यम से किया जाने वाला उपचार सम्बन्धित शरीर को आक्रान्ता के किसी प्रकार-विशेष के लिये ही नहीं बल्कि उसके अगले-पिछले सभी प्रकारों के किन्हीं भी दुष्प्रभावों से मुक्त होने की भी स्वाभाविक तथा स्थायी क्षमता प्रदान करता है।

सम्भव है कि इस बिन्दु पर बहुतों के मन में यह प्रश्न उठने लगा हो कि क्या होमियोपैथी कोविड-१९ के उपचार का ऐसा कोई ठोस सुझाव दे सकती है जो सामान्य जन की समझ में तो आये ही, उसकी पहुँच के भीतर भी हो? इनके अतिरिक्त यह चार प्रति-प्रश्न उठने भी स्वाभाविक हैं (१) वे कौन सी औषधियाँ होंगी?; (२) इनकी कितनी मात्राएँ लेनी होंगी?; (३) इन्हें कैसे और कब लेना होगा?; और (४) क्या रोक-थाम तथा उपचार, दोनों में ही, इन पर निर्भर हुआ जा सकता है?

यद्यपि सार्स, बर्ड/एवियन फ़्लू, स्वाइन फ़्लू, तथा मर्स से जुड़े होमियोपैथी की औषधियों के सफल प्रयोग ऐसे सभी प्रश्नों के उत्तर पूरी सकारात्मकता से देने के ठोस आधार हैं। फिर भी, विज्ञान के आधार-भूत दर्शन पर इसका एक संक्षिप्त स्पष्टीकरण आवश्यक है।

यहीं यह भी आवश्यक है कि ऐसा कोई भी स्पष्टीकरण मोटे रूप से उन दोनों आयामों को अपने में समेटे जो कोविड-१९ के दुष्प्रभावों के केन्द्रक हैं। और क्योंकि, कोविड-१९ के दुष्प्रभाव (१) वायरस-जनित हैं तथा (२) मूलत: फेफड़ों को ही अपने मारक प्रभाव का केन्द्र बनाते हैं; विकराल होती दिख रही इस समस्या से मुक्ति उसी उपचार से मिल सकती है जो न केवल एण्टी वायरल हो, फेफड़ों की समस्याओं के सटीक उपचार से भी उसका सीधा सम्बन्ध हो।

और, होमियोपैथी की चिकित्सा-पद्धति का निचोड़ बतलाता है कि उसकी यह चार औषधियाँ इन दोनों धरातलों पर सौ टंच खरी ठहरती हैं (१) एकोनाइट नेपेलस, (२) आर्सेनिकम अल्बम, (३) यूपेटोरियम परफोलियेटम और (४) रस टॉक्सिकोडेण्ड्रान। इनमें भी आर्सेनिकम अल्बम तथा रस टॉक्सिकोडेण्ड्रान को शेष दोनों पर प्राथमिकता दी जा सकती है।

क्योंकि उपरोक्त चारों औषधियाँ कोरोना के विषाणु के मारक प्रभाव की सम्भावना को सिरे से निरस्त करती हैं; परिणाम यह होता है कि शरीर की रोग-प्रतिरोध की आन्तरिक क्षमता के विकास को पूरे अवसर मिल जाते हैं और अति-शीघ्र ही रोग से मुक्ति पायी जा सकती है। यही नहीं, कोई लक्षण सामने आये बिना ही यदि यह औषधियाँ दे दी जायें तो, रोग-प्रतिरोध की आन्तरिक क्षमता के विकास के उपरोक्त आधार पर ही, इनसे रोकथाम की आवश्यकताएँ भी पूरी हो जाती हैं। किन्तु, रोकथाम और रोग-मुक्ति में औषधियों की कुल मात्रा तथा उनके दोहराव में पर्याप्त अन्तर अवश्य रहेगा।

यहीं यह बात भी सदा स्मरण रखनी होगी कि यद्यपि होमियोपैथी की औषधि-निर्धारण की उत्कृष्टता इसी में है कि कोई एक औषधि ही चुनी जाये तथापि तब औषधि के चयन के सुस्पष्ट आधार होने भी आवश्यक हैं। किन्तु दुर्भाग्य से, कोविड-१९ को लेकर मचाये जा रहे आज के हाहाकार में इतना धीरज न तो पीड़ित के पास है और ना ही चिकित्सकों के पास। ऊपर से ‘बाजार-जनित लोभ’ का वातावरण आम जन को भ्रमित करने को उधार भी बैठा है। ऐसे में, उपरोक्त चारों औषधियों को मिला कर दिया जाना अधिक श्रेयस्कर है।

इसी बिन्दु पर यदि कोविड-१९ से जुड़े उन दावों/आरोपों को भी पर्याप्त महत्व दिया जाये जो कहते हैं कि इसे चीन की वुहान स्थित सैन्य प्रयोग-शाला में रचे गये ऐसे षडयन्त्र ने अस्तित्व दिया है जिसमें, कोरोना के पूर्व-वर्ती विषाणुओं और मलेरिया के पर-जीवी के बीच कोई प्रायोगिक घाल-मेल किया गया है; तो उपरोक्त चारों औषधियों के अतिरिक्त होमियोपैथी की मलेरिया ऑफिसिनेल नामक औषधि भी इस सूची में जुड़ जाती है।

(१२ जुलाई २०२०)

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