कोविड-१९ बनाम महामारी : तथ्य

Sarokar

परम्परा-वादी विज्ञानियों के लिये उनके द्वारा परिभाषित जीवों से परे जीवन का कोई और अस्तित्व नहीं है। उनकी यह नकारात्मकता चिकित्सा-जगत्‌ का एक ऐसा बड़ा गड्ढा है जिसमें स्वास्थ्य और जीवन-रक्षा की व्यापक सम्भावनाएँ दफ़न हो जाती हैं।

‘कोरोना’ अब एक ऐसी ध्वनि का पर्याय बन चुका है जिसकी धीमी सी भी आहट बड़े-बड़े साहसियों के पसीने छुड़ा देती है। और, इसके पीछे उनका ही बड़ा हाथ है जिनके कन्धों पर इस ध्वनि को निर्मूल कर देने का नैतिक दायित्व है। वह भी, इसके शोर में बदल जाने से पर्याप्त पहले। जहाँ सारा कुछ एक सोचे-समझे षडयन्त्र के अन्तर्गत्‌ हो रहा है, वहीं इस षडयन्त्र की एकाधिक धुरियाँ हैं सभी अपने-अपने व्यापक आर्थिक हितों से ओत-प्रोत!

सुनने-पढ़ने में यह ‘व्यापक आर्थिक हित’ जितना अधिक अस्पष्ट-धुँधला लगता है, यथार्थ संसार में यह उतना ही अधिक स्पष्ट और सहज-सरल है। बिल्कुल, दो और दो के योग के चार होने की तरह! चौंकिये नहीं, सारा खेल ‘बाजार’ का है। और राजनैतिक-प्रशासनिक तन्त्र के कल-पुर्जे ही नहीं, विज्ञान-जगत्‌ के नामी-गिरामी ‘विशेषज्ञ’ तक इस बाजार में बड़े सलीके से अपनी-अपनी भूमिका अदा कर रहे हैं। बिल्कुल बिकी हुई गोटियों की तरह। सारा गणित यह है कि जिस देश और/अथवा जिस व्यक्ति की गोटियाँ इस बाजार पर उसका वर्चस्व स्थापित करा पाने में सफल होंगी; वही निकट भविष्य का आर्थिक, और इस तरह से राजनैतिक भी, सिर-मौर होगा। बाजार के गणित का यह सोच इस सोची-समझी दिशा में निरन्तर आगे बढ़ रहा है कि समस्या के पहले से ही उपलब्ध एक भी सहज-सरल हल की स्वीकार्यता को सिरे से कुछ इस तरह से नकारा जाये कि अभी तक अनुपलब्ध, किसी काल्पनिक और अतिक्लिष्ट, उपाय को तलाशने-परोसने की हाय-तौबा मचे। और, इस तरह, अरबों-खरबों की उगाही का एक नया बाजार खड़ा तो किया ही जा सके उसे कब्जे में लिया भी जा सके।

सावधानी के लिये, यहाँ इस जमीनी सचाई को भी अपनी समझ के कोष में रेखांकित कर सहेजे रहना होगा कि प्रतिद्वन्द्वी हितों को पटकनी देने की होड़ में अब, समझे जा सकने वाले हितों के परस्पर टकराव का, ऐसा दौर भी चल पड़ा है जिसमें आम आदमी के सामने कुतर्कों की नित नयी बाढ़ें परोसी जाने लगी हैं।

कोरोना वायरस डिसीज १९ (कोविड-१९) से जुड़े आँकड़ों को नित-प्रतिदिन परोस कर एक भयाक्रान्त भविष्य दिखाने की होड़ मची है। इसमें कोई मतभेद नहीं कि जो कुछ दिखाया-समझाया जा रहा है यदि वह सचमुच ही यथार्थ है तो इस धरती पर मनुष्य का जीवन अब वास्तव में भयावह होने वाला है। या फिर, आज के मनुष्य का कोई भविष्य ही शेष नहीं रहेगा। किन्तु, सारा पेंच इस ‘सचमुच के यथार्थ’ की सचाई तथा इसी से सीधे जुड़े ‘नये बाजार की नवीनता’ में है। यही कारण है कि, भले ही वे एक-दूसरे के व्यावसायिक प्रतिद्वन्द्वी हों, कृत्रिम बाजार के इस सृजन में उसके सारे खिलाड़ी पस्पर कन्धा सटाये खड़े हैं।

कोविड-१९ को लेकर दुनिया भर के कथित वैज्ञानिक बाजारों से प्रतिदिन खबरों की एक नयी बाढ़ सी उफन रही है। ऐसी प्रत्येक खबर जहाँ एक ओर, डराते हुए से अन्दाज में, पिछली खोज के निरर्थक और/अथवा प्रभाव-हीन होने की सूचना देती है; वहीं दूसरी ओर वह उपचार के उसके सुझाये एक नये और अति क्लिष्ट विकल्प के सर्वथा प्रभावी होने का दावा भी ठोकती है। इस सब के बीच सारे ही दावों-प्रतिदावों में इस एक बिन्दु पर सहमति होती है कि कोविड-१९ का अस्तित्व, और इस तरह से मनुष्यों पर इसके दुष्प्रभाव की सम्भावनाएँ भी, सदा के लिये बनी रहेंगी। यों, यह सचाई भी है किन्तु इस सच के दो पहलू हैं। पहला पहलू वह है जिसे दिखा कर बाजार लोगों को डरा रहा है। जबकि, इस सच का दूसरा पहलू यह है कि कोविड-१९ पृथ्वी के भविष्य को मनुष्य-विहीन नहीं कर सकता है। यद्यपि सार्स (२००२), बर्ड/एवियन फ़्लू (२००३), स्वाइन फ़्लू (२००९-१०), और मर्स (२०१९) को इसके सबसे नये उदाहरणों में गिनाया जा सकता है; फिर भी निहित स्वार्थों द्वारा इस दूसरे पहलू की समझ को षडयन्त्र-पूर्वक अवरुद्ध किया जा रहा है।

दूसरे शब्दों में, अब मनुष्य को इसके साथ सह-अस्तित्व का भाव रखते हुए ही जीने की आदत डालनी होगी! या, यह कहना अधिक उचित होगा कि समय के साथ आदमी कोविड-१९ नामक इस नये हौए के साथ भी सहज भाव से जीना सीख लेगा। बिल्कुल वैसे ही, जैसे कि उसने इसके पूर्वजों के, या फिर दूसरे विषाणुओं के भी, सन्दर्भों में अतीत में कर दिखाया है।

अस्तित्व के उद्भव से आरम्भ हुआ प्रकृति का समूचा इतिहास साक्षी है कि भले ही आदत-परिवर्तन के ऐसे सामंजस्य से विद्रोह करने वालों का अस्तित्व सिरे से मिट गया हो, अस्तित्व-हीन होने से बचने के लिये परिस्थितियों से सामंजस्य बैठाने वालों की अगली पीढ़ियाँ इस पृथ्वी पर मजे से फल-फूल रही हैं। प्रजाति और/अथवा प्रकार से परे अस्तित्व का मूल आधार, प्रकृति के आरम्भ के पहले पल से ही उसमें रच-बस चुकी, उसकी इसी ‘प्रकृति’ पर टिका है जिसे विविध प्रकारों से विकास का दर्शन कहा गया है।

जीवन के अस्तित्व से जुड़ी उपरोक्त आधार-भूत सचाई में निहित गूढ़ दर्शन को कुछ इस तरह से समझा जा सकता है

१.  उत्पत्ति तथा अन्त के प्रकृति-प्रदत्त चक्र से जुड़ा प्रत्येक अस्तित्व अपने भीतर यह आनुवांशिक गुण ले कर ही धरती पर आता है कि बात चाहे उसकी प्रजाति/उसके प्रकार के विद्यमान स्वरूप की रक्षा की हो या फिर स्वयं उसके ही अपने अस्तित्व की सुरक्षा की; चुनौती की किसी भी स्थिति में वह सबसे पहले ‘जैसा है, वैसा ही बने रहने’ का हर सम्भव प्रयास करता है। किन्तु यदि, विपरीत हुई स्थितियाँ इतनी प्रबल हों कि अपने मूल स्वरूप को कायम रखते हुए, अस्तित्व बचाने के उसके सारे प्रयास निरर्थक हो रहे हों; तब वह स्वयं को कुछ इस तरह से परिवर्धित कर लेता है कि मूल स्वरूप-गुण भले ही कुछ बदल जायें, कम से कम उसकी प्रजाति/उसके प्रकार विशेष का अस्तित्व तो बचा रहे;

२.  उपरोक्त चुनौती-पूर्ण स्थितियों को मोटे रूप में दो प्रकारों में वर्गीकृत किया जा सकता है (अ) किसी अस्वाभाविक ब्रह्माण्डीय कारण से, अकस्मात्‌ ही उत्पन्न होने वाली; और (ब) किन्हीं जैविक और/अथवा प्राकृतिक घटना-क्रमों के फल-स्वरूप, स्वाभाविक रूप से शनै:-शनै: उभरने वाली;

३.  इनमें से पहली स्थिति पर, पृथ्वी पर मौजूद, किसी भी अस्तित्व का न तो कोई नियण्त्रण होता है और ना ही कोई हस्तक्षेप। जबकि, इसके उलट, दूसरी स्थिति के लिये वही पूरी तरह से जिम्मेदार होता है। और, इसके मूल में अस्तित्व-रक्षा तथा अस्तित्व-विस्तार के बीच होने वाला वह स्वाभाविक संघर्ष है जिसका एक पक्ष वह स्वयं होता है जबकि दूसरे पक्ष के रूप में उसी परिवेश में उपस्थित, उसी के जैसी मन:स्थिति के साथ जी रहा, भिन्न प्रजाति/प्रकार का कोई अन्य अस्तित्व;

४.  जीवों के बीच का उपरोक्त संघर्ष, प्रकारान्तर से, आक्रान्त और आक्रान्ता के बीच होने वाले परस्पर द्वन्द्व का ऐसा मामला है जो सीधे-सीधे दोनों के ही अस्तित्व की रक्षा से जुड़ा है। और क्योंकि इसी में उसके अस्तित्व की रक्षा निहित है, विजेता का प्रयास अधिकतर यही रहता है कि पराजित का अस्तित्व समाप्त हो जाये।

    यहाँ इस ‘अधिकतर’ का महत्व बहुत है। और क्योंकि ‘आक्रान्त’ की तुलना में ‘आक्रान्ता’ हमेशा अधिक विशाल तथा अधिक क्षमता वाला होता है, औसतन, विजय आक्रान्ता को ही मिलती है।

यद्यपि, इसका एक परन्तुक भी है जो बतलाता है कि उपर्युक्त समझ केवल और केवल जीवों के बीच बने परस्पर सन्दर्भों तक ही सीमित है, जीव तथा विषाणु के बीच होने वाला संघर्ष इसके दायरे में नहीं आता है;

५.  अपने मेजबान के ही अस्तित्व पर निर्भर विषाणुओं के विशेष सन्दर्भ में, इस समझ का आधार पूरी तरह बदल जाता है। वह इसलिये कि इनके परस्पर द्वन्द्व में, जिस तरह आक्रान्त अपना अस्तित्व बचा पाता है ठीक उसी तरह आक्रान्ता का अस्तित्व भी, ले-देकर ही सही, पूरी तरह समाप्त होने से बच रहता है।

    सरल शब्दों में, अन्त-हीन से दिखने वाले ऐसे मरणान्तक संघर्ष की पराकाष्ठा में दोनों ही स्वयं को परस्पर कुछ इस तरह परिवर्धित कर लेते हैं कि एक-दूजे के लिये प्राण-घातक होते हुए भी दोनों का ही अस्तित्व बचा रहे। इसे सह-अस्तित्व की एक प्रकार की स्वाभाविक/प्राकृतिक परिणति कहा जा सकता है। यह विवशता-जनित एक ऐसी ‘स्वीकृति’ है जिसमें यदि इनमें से किसी एक को अवसर मिल जाये तो वह दूसरे के अस्तित्व को मिटाने तत्काल तत्पर हो जाये। ‘सह-अस्तित्व’ के इसी बिन्दु में ‘जीवन’ की यह दार्शनिक सचाई भी निहित है कि आक्रान्त तथा आक्रान्ता के बीच अनन्त काल से चलता आया यह द्वन्द्व, अपवादी परिस्थितियों को छोड़ कर, भविष्य में भी सतत्‌ रूप से चलता रहेगा;

६.  स्वास्थ्य के विशेष सन्दर्भ में, जहाँ उपर्युक्त का एक परन्तुक है जो बतलाता है कि यद्यपि आक्रान्ता की तुलना में आक्रान्त हमेशा अति विशाल होता है फिर भी पहली विजय औसतन आक्रान्ता को ही मिलती है। और इसीलिए, अस्तित्व-रक्षा की प्रक्रिया हमेशा आक्रान्त की ओर से ही आरम्भ होती है।

वहीं इस बिन्दु पर एक स्पष्टीकरण भी महत्व-पूर्ण है। इसके अनुसार, सैद्धान्तिक रूप से विरलतम्‌ ही सही, यद्यपि इस सम्भावना को सिरे से नकारा नहीं जा सकता है कि वह आक्रान्त (invaded) हो अथवा आक्रान्ता (invader), परिस्थिति-विशेष में दोनों ही के एक अथवा एकाधिक जीव-विशेष को तो नष्ट किया जा सकता है तथापि इस स्वीकृति का बड़ा पेंच यह है कि ऐसा केवल आक्रान्त अथवा आक्रान्ता विशेष के बिखरे हुए जीवों और/अथवा उनके किसी समूह-विशेष के सीमित सन्दर्भ में ही सम्भव है।

    जाहिर है, जीव-जनित पस्थितियाँ चाहे जो हो जायें, समूल विनष्टि की कोई सम्भावना व्यापक और समान भाव से न तो आक्रान्त की समूची प्रजाति पर लागू होती है और ना ही आक्रान्ता के समूचे प्रकार पर;

७.  सह-अस्तित्व की इस समझ और इसकी बन्धन-कारी प्राकृतिक आदत के उपर्युक्त दर्शन की आंशिक समझ को ही आज के प्रचलित विज्ञान में ‘विकास-वाद का सिद्धान्त’ माना गया है।

यह सारा सह-अस्तित्व बहुत सापेक्षी है। वह इसलिये कि, सारे आक्रान्तों और सारे ही आक्रान्ताओं के बीच कोई पारस्परिक सम्बन्ध प्राकृतिक रूप से बनता ही हो यह आवश्यक नहीं है। यह सम्बन्ध किसी विशेष आक्रान्त और किसी विशेष आक्रान्ता के बीच ही होता है। किन्तु, इसकी भी एक सीधी-सरल सी शर्त है कि इसमें आक्रान्त एक सम्पूर्ण जीव हो जबकि आक्रान्ता एक विषाणु। जहाँ दो विषाणुओं के बीच ऐसे किसी सम्बन्ध की कोई सम्भावना नहीं होती है, वहीं सह-अस्तित्व का यह भाव भक्षक तथा भक्ष्य का पारस्परिक सम्बन्ध रखने वाले दो सम्पूर्ण जीवों के आड़े नहीं आता है।

जीव के अस्तित्व को चुनौती देने वाला कारक चाहे जो हो, क्योंकि सारा पेंच अस्तित्व-रक्षा की इसी बन्धन-कारी प्राकृति की समझ में है; कोविड-बाजार का प्रत्येक महारथी आम आदमी के बीच इस दर्शन और उसके दूरगामी स्वाभाविक लाभों की ऐसी सहज समझ के रास्ते में हर सम्भव रोड़े अटकाने में जुटा है। कारण बिल्कुल स्पष्ट है यदि अस्तित्व तथा अस्तित्व-रक्षा की यह समझ आम हो जाती है तो आम आदमी तथ्यों और आँकड़ों की सारी भयावहता को भी सहज भाव में लेना आरम्भ कर देगा। और, इसका स्वाभाविक परिणाम यह होगा कि कोरोना को ले कर मची दिख रही आज की सारी हाय-तौबा सिरे से समाप्त हो जायेगी।

भटकाव से बचने की सारी सावधानी रखते हुए, इसी बिन्दु पर जोर दे कर यह जोड़ना भी आवश्यक है कि अपने आप में पूर्ण समझा जाने वाला विकास-वाद का आज का सिद्धान्त यथार्थ में अपूर्ण है। क्योंकि, विकास के इस दर्शन में पृथ्वी पर जीव के हुए विकास के साथ ही वनस्पति तथा पदार्थ के भी विकास की वह सारी परिभाषाएँ सम्मिलित नहीं की गयी हैं जिन्हें विज्ञान की दुनिया के महान्‌ दार्शनिक सर जगदीश चन्द्र बसु ने ‘जीवन’ के दायरे में शामिल तो किया ही था, प्रमाणित भी किया था।

अपने प्रयोग के माध्यम से तब बसु ने स्थापित किया था कि कार्य-शीलता के अधिकतम्‌ दबाव की स्थिति में लाये जाने पर लोहे के मैग्नेटिक ऑक्साइड के व्यवहार में, आश्चर्य-जनक रूप से, मांसपेशी जैसी समानता देखने को मिलती है। उन्होंने जहाँ एक ओर यह दिखलाया था कि जिन्हें विज्ञान जीव मानता है उन्हीं की तरह अकार्बनिक पदार्थ (मैटीरियल) में भी कार्य-दक्षता की अपनी एक सीमा होती है। इसके पार ले जाने पर वह, अपने विशिष्ट तरीके से, न केवल स्वयं में आयी थकान को प्रदर्शित करता है अपितु उसकी इस थकान को धीमे कम्पन वाली मालिश अथवा हल्के गर्म पानी के स्नान से दूर भी किया जा सकता है।

उदाहरण के लिए, यदि किसी धार-दार सरौते (या फिर कैंची) से लगातार काटने का कार्य लिया जाता है तो एक समय बाद यह लगने लगता है कि उस सरौते (या फिर कैंची) की धार भोथरी हो चली है। किन्तु, अपने उक्त प्रदर्शन से बसु ने प्रमाणित किया कि यथार्थ में धार भोथरी नहीं होती है; अपितु, लगातार श्रम करने से उनके प्रायोगिक सरौते की धातु में बिल्कुल वैसी ही थकान आ गयी थी जैसी कि श्रम की अधिकता से जीव की मांसपेशियों में आती है। तब उन्होंने यह भी दिखाया कि धीमे कम्पन वाली मालिश अथवा हल्के गर्म पानी के स्नान से इस थकान को दूर भी किया जा सकता है बिल्कुल किसी जीव की तरह!

सन्‌ १९०० के उनके द्वारा प्रदर्शित इन परिणामों से विज्ञानियों का ध्यान पहली बार उस सोच की ओर आकर्षित हुआ जिसने मिथकों को विज्ञान की मुख्य धारा में स्थान देने की माँग की। यह माँग इसलिए उठी क्योंकि अपने प्रयोग के माध्यम से बसु ने न केवल अकार्बनिक पदार्थ की कार्य-दक्षता के उसकी थकान से जुड़े होने को प्रदर्शित कर दिया था अपितु इससे भी आगे जाते हुए उन्होंने भौतिकी के इस कल्पनातीत दर्शन को भी स्थापित कर दिया था कि प्रकृति की कथित आभासी विविधता (Apparent diversity) में भी पारस्परिक रूप से एक आधार-भूत एकता (Fundamental unity) मौजूद है। यही नहीं, तभी उन्होंने यह भी स्थापित किया कि दैहिक (Physiological) तथा भौतिक (Physico-chemical) पारस्परिक रूप से सम्बन्धित हैं।

सवाल उठाने के माहिर इस बिन्दु पर यह सवाल उठा सकते हैं कि कोविड-१९ की चर्चा के बीच जगदीश चन्द्र बसु के उपर्युक्त प्रयोग के उल्लेख का औचित्य क्या है?

दरअसल, औचित्य के ऐसे सवालों को उठाने वाले उस ‘आधुनिक विज्ञान’ के परम्परा-वादी हैं जो जीवन को केवल उनके द्वारा परिभाषित जीवन के सीमित दायरे में ही देखते हैं और सर जगदीश चन्द्र बसु द्वारा प्रतिपादित उपर्युक्त जीवन-दर्शन को सिरे से नकारते हैं। दूसरे शब्दों में, परम्परा-वादी विज्ञानियों के लिये उनके द्वारा परिभाषित जीवों से परे जीवन का कोई और अस्तित्व नहीं है। उनकी यह नकारात्मकता चिकित्सा-जगत्‌ का एक ऐसा बड़ा गड्ढा है जिसमें स्वास्थ्य और जीवन-रक्षा की व्यापक सम्भावनाएँ दफ़न हो जाती हैं।

इस सम्बन्ध में आगे और बात करने के पहले कोविड-१९ तथा उससे मुक्ति की उन आधार-भूत सूचनाओं/स्वीकृतियों पर एक विहंगम्‌ दृष्टि डाल लेना सार्थक होगा जो अब तक आधुनिक चिकित्सा-विज्ञान की ध्वज-वाहक बन चुकी हैं

विषाणु एक ऐसा अस्तित्व है जो कोषिका-विहीन होता है तथा इकलौते आरएनए से बना होता है। और इसी कारण से, अपने अस्तित्व के लिये विषाणु सदा ही किसी न किसी जीव पर निर्भर होते हैं। कोविड-१९ का कारक बतलाया जा रहा कोरोना वायरस विषाणुओं के ‘कोरोनाविरिडाए समूह’ से सम्बन्ध रखता है। ६५ से लेकर १२५ नैनोमीटर तक के आकार के बतलाये जा रहे इन गोलाकार विषाणुओं का बाहरी स्वरूप नुकीले रेशों से आच्छादित होता है। इसी नुकीले, रेशे-दार बाहरी आवरण के कारण इसका नाम-करण ‘कोरोना’ किया गया है। कोविड-१९ पर चर्चा करते समय, यह तथ्य सदा ध्यान में रखा जाना चाहिये इसे फैलाने के लिये जिम्मेदार विषाणु, आकार के हिसाब से, अभी तक ज्ञात सारे विषाणुओं में सबसे भारी-भरकम है। इस तथ्य का एक निहितार्थ यह भी है कि, सामान्य परिस्थितियों में, यह विषाणु हवा में तैरते हुए विचरण नहीं कर सकता है।

सन्‌ २००२ से पहले तक यह माना जाता रहा है कि कोरोनाविरिडाए समूह के सदस्य केवल जानवरों को ही संक्रमित कर सकते हैं। किन्तु, २००२ में जब पहली बार ‘सीवियर एक्यूट रेस्पिरेटरी सिण्ड्रोम’ (सार्स) का प्रकोप देखने में आया तब यह ज्ञात हुआ कि यह विषाणु मनुष्यों को भी अपनी चपेट में ले सकते हैं। इसके लगभग एक दशक बाद, जब मध्य-पूर्व के देशों में ‘मिडिल ईस्ट रेस्पिरेटरी सिण्ड्रोम’ का प्रकोप सामने आया तब पता चला कि वह कोरोना विषाणु के ही एक भिन्न स्वरूप ‘मर्स’ की देन था।

बीच की अवधि में बर्ड फ्लू अथवा एवियन फ्लू और स्वाइन फ़्लू के प्रकोप भी देखने को मिले। यों, बर्ड फ्लू का प्रभाव पहली बार सन्‌ १९९६ में चीन में बत्तखों के बीच देखा गया था; किन्तु १९९७ में पहली बार हाँगकाँग में उसे बत्तखों के अलावा मुर्गियों और जंगली पक्षियों को भी संक्रमणित करते पाया गया। इसके बाद नवम्बर २००३ में उसने महामारी का रूप लिया जिसका व्यापक प्रभाव एशिया, अफ़्रीका, यूरोप और मिडिल ईस्ट के देशों में हुआ था। जनवरी २००९ से अगस्त २०१० के बीच दुनिया ने स्वाइन फ्लू नामक एक अन्य महामारी का भी प्रकोप देखा जिसके लिये एच१एन१ प्रकार के विषाणु को जिम्मेदार ठहराया गया।

कोविड-१९ के प्रकोप के विस्फोट से पहले तक यह माना जाता रहा कि कोरोना विषाणु मनुष्यों में, केवल मामूली से और स्वयं ही समाप्त हो जाने वाले, स्वाँस सम्बन्धी संक्रमण फैलाते हैं। किन्तु हाल ही में, सन्‌ २०१९ के अन्त में, चीन के व्यावसायिक गतिविधि-केन्द्र वुहान में पहली बार जिस कोरोना वायरस का भीषण प्रकोप देखने मिला; ‘इण्टरनेशनल कमेटी ऑन टेक्सोनॉमी ऑफ़ वायरसेज़’ ने उसका नामकरण ‘सार्स-कोव-२’ और उसके प्रभाव से होने वाली बीमारी का नाम-करण ‘कोविड-१९’ किया। इसके पहली बार वुहान में सामने आने से चीनी शोध-कर्ताओं ने अपनी ओर से इसका नामकरण ‘वुहान कोरोना वायरस’ किया। इस वायरस को कोरोना वायरसों के ‘बीटा ग्रुप’ का बतलाया जा रहा है।

कोविड-१९ एक अत्यधिक संक्रामक बीमारी है। और, कोई स्वस्थ व्यक्ति यदि किसी संक्रमित व्यक्ति से कम दूरी के सम्पर्क में आता है तो इस बात की सम्भावनाएँ बहुत अधिक हैं कि वह भी इस विषाणु से संक्रमित हो जाये। यह इसलिये हो सकता है क्योंकि कोरोना-प्रभावित व्यक्ति के खाँसने, छींकने अथवा साँस छोड़ने से बाहर वातावरण में आने वाली अति सूक्ष्म बूँदें, स्वाँस लेने की प्रक्रिया में, उस स्वस्थ व्यक्ति के भी शरीर में प्रवेश पा सकती हैं। और इस तरह, उनमें मौजूद विषाणु उस स्वस्थ व्यक्ति के फेफड़ों तक पहुँच सकते हैं। चीन के वुहान प्रान्त में पहले-पहल अस्तित्व में आया कहा जा रहा कोरोना वायरस इसी तरह से फैल कर आज दुनिया के १०० से अधिक देशों में महामारी का महा-प्रकोप मचा रहा है।

आरम्भ में, आम जन को समझाया जा रहा था कि सांस लेने में परेशानी होना, छाती में दर्द या दबाव महसूस होना, थकान और बुखार होना कोरोना वायरस के प्रभाव से ग्रसित होने के लक्षण हैं। किन्तु इसमें बदलाव कर अब यह समझाया जाने लगा है कि कोविड-१९ अलाक्षणिक (Asymptomatic) होती जा रही है। दूसरे शब्दों में, यदि कोविड-१९ का कोई ज्ञात लक्षण दिखायी नहीं भी दे रहा हो तब भी जाँच किये जाने पर व्यक्ति-विशेष उससे ग्रसित हुआ पाया जा सकता है।

यद्यपि विज्ञान-जगत्‌ से इस ज्वलन्त प्रश्न का कोई निष्चयात्मक उत्तर अभी तक सामने नहीं आया है कि यह सार्स-कोव-२ अथवा कोविड-१९ नामक यह बीमारी अस्तित्व में कैसे आयी? फिर भी, इसे लेकर कुछ परिकल्पनाएँ उभरी हैं जिनमें से निम्न चार प्रमुख हैं

(१) किन्हीं विशेष परिस्थितियों में, प्रश्नाधीन कोरोना विषाणुओं से पूर्व के कोरोनाविरिडाए समूह के किसी प्रकार के किसी/किन्हीं सदस्य अथवा उसके एक समूह में परिस्थिति-जन्य विकास का कोई ऐसा बड़ा दौर आया हो जिसके परिणाम में, उसके परिवर्धित हो जाने से, कोविड-१९ वाला नया प्रकार अस्तित्व में आया हो;

(२) मांसाहर के निमित्त पक्षी, मछली, कछुए तथा रेंगने वाले जीवों के साथ-साथ खरगोश आदि विविध स्तन-पायी प्राणियों की बिक्री के लिये प्रसिद्ध चीन के वुहान स्थित वेट-बाजार में आने वाले मनुष्यों और इन जीवों को पहले से ही संक्रमित कर चुके कोरोना वायरस के विषाणुओं के बीच होने वाले परस्पर निकट सम्पर्क से कोरोना वायरस के कोविड-१९ वाले किसी प्राथमिक प्रकार ने मनुष्य के शरीर तक अपनी आरम्भिक पैठ बनायी हो;

(३) अभी तक अज्ञात किन्हीं विशेष परिस्थितियों में, पहले से ही अस्तित्व में आ चुके कोरोनाविरिडाए समूह के किसी प्रकार के किसी/किन्हीं सदस्य के गुण-धर्म में हुए किसी परिस्थिति-जन्य विकास के स्थान पर; कोविड-१९ वाला एक बिल्कुल नया विषाणु अस्तित्व में आया हो;

(४) जैसा कि आरोप लगाया जा रहा है, वुहान में स्थित चीन की किसी गुप्त सैन्य-प्रयोग-शाला में कोरोनाविरिडाए समूह और मलेरिया के विषाणुओं के किन्हीं प्रकारों के बीच परस्पर जीव-विज्ञानी घाल-मेल कर, युद्धक उपयोग में लिया जा सकने वाला, यह एक बिल्कुल नया तथा अधिक घातक कोई विषाणु अस्तित्व में लाया गया हो।

(जारी है . . .)

1. Similarities Between the Non-living and the Living : Jagdis Chandra Bose; by S N Bose; National Book Trust, India; page 27.

2. Similarities Between the Non-living and the Living : Jagdis Chandra Bose; by S N Bose; National Book Trust, India; page 28.

3. Similarities Between the Non-living and the Living : Jagdis Chandra Bose; by S N Bose; National Book Trust, India; page 32.