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कोविड-१९ बनाम महामारी : कथ्य-२

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आयुर्वेद पीड़ित व्यक्ति के भौतिक (Physical) अवलोकनों से प्राप्त होने वाली जानकारियों के आधार पर अलग-अलग दोषों में अलग-अलग भौतिक सुधारों को अपने उपचार का लक्ष्य बनाती है और तदनुसार ही अपनी औषधि निर्धारित करती है। जबकि होमियोपैथी व्यक्ति-विशेष से सम्बन्धित दैहिक (Phisiological) सूचनाओं का मूल्यांकन कर, और फिर अवचेतन में विलुप्त-प्राय हो चुकी इन दैहिक क्षमताओं को पुनर्जागृत कर, उन्हें ही सम्बन्धित व्यक्ति का समग्रित उपचार करने की प्रेरणा देती है। Continue reading

कोविड-१९ बनाम महामारी : कथ्य-१

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वैसे तो इसमें अन्तिम विजय मानव की ही होगी; किन्तु, उसकी यह विजय सदा स-शर्त रहेगी — विषाणु का समूल नाश कभी नहीं होगा। क्योंकि, ऐसे किन्हीं भी प्रयासों से विनष्ट होने से बच रहे विषाणु स्वयं को परिवर्धित कर अपनी प्रकार के भविष्य के समूहों को ऐसे प्रत्येक प्रयास-विशेष के प्रति पूरी तरह से प्रतिरोधी बना लेंगे। सरल शब्दों में, मानव तथा विषाणु के बीच अस्तित्व का ऐसा सन्तुलन सदा बना रहेगा जिसका पलड़ा एक सीमा तक मनुष्य के पक्ष में झुका होगा।
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कोविड-१९ बनाम महामारी : तथ्य

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परम्परा-वादी विज्ञानियों के लिये उनके द्वारा परिभाषित जीवों से परे जीवन का कोई और अस्तित्व नहीं है। उनकी यह नकारात्मकता चिकित्सा-जगत्‌ का एक ऐसा बड़ा गड्ढा है जिसमें स्वास्थ्य और जीवन-रक्षा की व्यापक सम्भावनाएँ दफ़न हो जाती हैं।
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म० प्र० राज्य सूचना आयोग की खुली पोल

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म० प्र० राज्य सूचना आयोग आयोग पर बड़ा सवाल उठा है। गैर सरकारी सामाजिक संगठन सजग ने मुख्य सूचना आयुक्त से ही पूछ लिया है कि क्या आयोग स्वयं को देश के समस्त नियमों, कायदों, कानूनों, स्थापित व्यवस्थाओं और मर्यादाओं से ऊपर मानता है? Continue reading

पद्म-सम्मान का अधिकारी नहीं, ब्लैक-लिस्टेड नागरिक

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‘पद्म’ सम्मानों का जमीनी तथ्य यह है कि यह सम्मान किसी भारतीय के ऐसे प्राकृतिक, आधार-भूत या संवैधानिक अधिकार नहीं हैं जिन्हें वह किसी न्यायिक चार-दीवारी के भीतर जाकर अपने लिए ‘सुरक्षित’ कर सके। Continue reading

चुनाव आयुक्‍त उवाच

‘मोह-भंग होने से पहले ही लोक-तन्त्र की कमियों को दूर करना होगा वरना जनता तख्ता पलट देगी।’ यह सन्देश था मुख्य चुनाव आयुक्‍त क़ुरैशी का जो उन्होंने लखनऊ में कानून मन्त्रालय की कोर कमेटी के सम्मेलन से दिया।

ठण्डे-सन्तुलित दिमाग से विचारें तो अपने आप में बड़ा खतरनाक है इसका निहितार्थ। यथार्थ लोक-तन्त्र की स्थापना की घोर बेचैनी में की गयी किसी गम्भीर जन-कोशिश को इतने नकारात्मक भाव में रखना, प्रकारान्तर से, चौ-तरफा भ्रष्‍ट और निरंकुश होते राजनैतिक-प्रशासनिक-विधाई तन्त्र के हाथ से सत्ता-सुख के छिन जाने के भय को शब्द देने जैसा ही कलुषित कृत्य है। खास तौर से तब जब यह ऐसे संविधान-प्रतिष्‍ठित संस्था-प्रमुख की ओर से रखा गया हो जिसके अपने जिम्मे में लोक-तन्त्र की आधार-भूत कुञ्‍जी की देख-भाल की जिम्मेदारी हो।

ठीक ही तो कहा गया है, ‘पर उपदेश, कुशल बहुतेरे!’

(३१ जनवरी २०११)

गिरना अपनी ही खोदी खाई में

Fourth Pocket

थैंक्स टु विकीलीक्स एण्ड राजा, रह-रह कर खयाल आ रहा है कि एक न एक को भगवान सद्‌-बुद्धि जरूर देगा कि जिनके अपने घर शीशे के होते हैं उन्हें दूसरों के शीश-महलों पर पत्थर फिकते देख कर खुश नहीं होना चाहिए। Continue reading

साल के सबसे बड़े हँसगुल्ले

Fourth Pocket

वैक्सीन महा-घोटाले के जिम्मे-दार माने जा रहे थे। तभी सीधे कैग में चले गये। लीपा-पोती कितनी सफाई से होती है, इसके अनुभवी हैं। लतीफ़ा है कि शुंगलू का एक्सपीरिएंस संकट की इस भीषण घड़ी में बड़ा काम आयेगा। Continue reading