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पद्म-सम्मान का अधिकारी नहीं, ब्लैक-लिस्टेड नागरिक

Sarokar

‘पद्म’ सम्मानों का जमीनी तथ्य यह है कि यह सम्मान किसी भारतीय के ऐसे प्राकृतिक, आधार-भूत या संवैधानिक अधिकार नहीं हैं जिन्हें वह किसी न्यायिक चार-दीवारी के भीतर जाकर अपने लिए ‘सुरक्षित’ कर सके।

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चुनाव आयुक्‍त उवाच

‘मोह-भंग होने से पहले ही लोक-तन्त्र की कमियों को दूर करना होगा वरना जनता तख्ता पलट देगी।’ यह सन्देश था मुख्य चुनाव आयुक्‍त क़ुरैशी का जो उन्होंने लखनऊ में कानून मन्त्रालय की कोर कमेटी के सम्मेलन से दिया। ठण्डे-सन्तुलित दिमाग से विचारें तो अपने आप में बड़ा खतरनाक है इसका निहितार्थ। यथार्थ लोक-तन्त्र की स्थापना …

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गिरना अपनी ही खोदी खाई में

Fourth Pocket

थैंक्स टु विकीलीक्स एण्ड राजा, रह-रह कर खयाल आ रहा है कि एक न एक को भगवान सद्‌-बुद्धि जरूर देगा कि जिनके अपने घर शीशे के होते हैं उन्हें दूसरों के शीश-महलों पर पत्थर फिकते देख कर खुश नहीं होना चाहिए।

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साल के सबसे बड़े हँसगुल्ले

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वैक्सीन महा-घोटाले के जिम्मे-दार माने जा रहे थे। तभी सीधे कैग में चले गये। लीपा-पोती कितनी सफाई से होती है, इसके अनुभवी हैं। लतीफ़ा है कि शुंगलू का एक्सपीरिएंस संकट की इस भीषण घड़ी में बड़ा काम आयेगा।

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गन्दगी से नहीं, शर्मिन्दगी से बचाव

Fourth Pocket

वह तनिक भी शर्मिन्दा नहीं हैं। उस जैसा नेता तो बस, लीडर्स ही तय कर सकता है। भीड़ ही जुटा सकता है। और उसने ऐसा करके दिखा भी दिया था। भविष्य के एक होन-हार पीएम से इससे ज्यादा आस नहीं रखनी चाहिए।

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छाछ भी फूँक-फूँक कर पीना

Fourth Pocket

सरकोजी ने दूसरे तलाक की घड़ियाँ गिनना चालू कर दिया है। कन्फ़र्म नहीं हूँ। फिर भी अनुमान है कि पहली बीबी भी पाँच फुट छह इंच से नीची नहीं रही होगी। नहीं तो, और क्या खास वजह हो सकती थी?

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मीठे और कड़वे का शाश्‍वत्‌ भेद

Fourth Pocket

अपनी एक ‘निजी’ बात-चीत का खुलासा कर ईमान-दारी की मीडियाई वाह-वाही के सबसे बड़े हक़दार बने महानुभाव अब अपनी किसी दूसरी ‘निहायत निजी’ भ्रष्‍ट बात-चीत के सार्वजनिक होने को रोकने कोर्ट की शरण में हैं।

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‘आई’ से ‘शी-ही’ तक गांधी का अव-मूल्यन

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समझ नहीं पा रहा हूँ कि उन दबी-छुपी फुस-फुसाहटों से अपना पीछा कैसे छुड़ाऊँ जो बे-वजह सी सफाई देती नजर आती हैं कि यह कांग्रेस का निहायत अन्दरूनी मामला है, देश-दुनिया का इससे क्या लेना-देना?

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