Jyoti Prakash

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मतलब की खेती : ‘दाल’ नहीं ‘कमाई’ काटते राज-नेता

हमारा सोच आर्थिक-व्यापारिक अधिक हो गया है। वह नैतिकता-सामाजिकता के निम्नतर स्तर पर पहुँच गया है। कोई अचरज नहीं कि खेसारी-समर्थक ‘वैज्ञानिक’ लॉबी को गलतियाँ करने से कोई गुरेज नहीं है; गुरेज है तो केवल इस पर कि ऐसी गलतियाँ कतई नहीं की जायें जिनसे ‘अधिकतम्’ आर्थिक कमाई मिलने में कोई कसर रह जाती हो।

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स्वयं को अधिनियम से ऊपर मानने लगा है म० प्र० राज्य सूचना आयोग

न्यायिक इतिहास का यह पहला अवसर था जब न्यायिक निराकरण का संवैधानिक अधिकार प्राप्त कोई पीठ किसी प्रकरण में अपना अन्तिम निराकरण आदेश परित कर देने के बाद, स्वत: प्रेरित और/अथवा स्फूर्त हो कर उसी प्रकरण की सुनवाई को नये सिरे से आरम्भ करने वाली थी।

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मध्य प्रदेश राज्य सूचना आयोग : काम के ना धाम के, अढ़ाई मन अनाज के!

लगता है कि म० प्र० राज्य सूचना आयोग में या तो अधिनियम की वैधानिक समझ के लिए आवश्यक रहने वाली आधार-भूत योग्यता के स्थान पर अ-योग्य और अ-पात्रों की भी नियुक्तियाँ हुई हैं या फिर ऐसे सारे व्यक्ति जानते-समझते हुए अधिनियम के ध्येय, मंशा और प्रावधानों की पूर्ति में अड़ंगा डालने की नीयत से कार्य …

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म० प्र० राज्य सूचना आयोग : सवाल वही पुराना

अधिनियम के व्यापक हित में है कि मेरे उठाये आज के सवाल पर आयोग की ओर से ही तथ्यों का कोई त्वरित स्पष्टीकरण आये। आयोग की चुप्पी का अर्थ होगा कि अधिनियम की सार्थकता म० प्र० राज्य सूचना आयोग के विद्यमान ढाँचे में सुरक्षित नहीं है। तब, महामहिम राज्यपाल महोदय पर संवैधानिक कदम उठाने का …

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खेत बदौलत जिये इन्सान, फिर क्यों भूखा मरे किसान?

राजधानी भोपाल की हुजूर तहसील में अधिकांश ग्राम पंचायतों में किसानों की खरीफ फसल प्राकृतिक आपदा का शिकार हो चुकी है। यहाँ ऐसे किसान उँगलियों पर ही गिने जा सकेंगे जिनकी खरीफ फसलें खेतों से खलिहानों तक पहुँचेंगी। और, पहुँचेंगी भी तो इतनी जिसे ठीक-ठाक कहा जा सके। किसानों ने खड़ी फसल के खेतों को …

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सुन-बहरे को सुनाई पड़ जाना!

संकेत हैं कि आयोग की कन-पटी पर ‘जूँ के रेंगने’ जैसा कुछ न कुछ प्रभाव तो पड़ा ही है। यों आयोग ने, केवल दिखावे के लिए ही, एक तरह से मुखौटा लगाया है। लेकिन, किसी सुन-बहरे को इसके लिए विवश कर पाने को कि वह स्वीकारे कि बहरा-पन उसका कोरा दिखावा रहा क्या कोई नगण्य …

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राज्य सूचना आयोग के मुख्य आयुक्त के नाम खुला पत्र

आयोग के गठन की निरर्थकता और दुर्दशा की द्विविधा का यथार्थ-परक निवारण करने के लिए यह खुला पत्र लिखने विवश हुआ हूँ ताकि, आयोग के मुखिया को यह सूचित हो कि उसके अपने ही कार्यालय में आयोग के साथ ही अधिनियम की भी सच्ची उपयोगिता को प्रमाणित करने की घड़ी एक बार फिर से आ …

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राज्य सूचना आयोग : क्या स्वयं आयोग के भीतर है अधिनियम की सही समझ?

अधिनियम के बन्धन-कारी पालन की दुर्भाग्य-जनक उपेक्षा के लिए क्या केवल विभिन्न सरकारी विभाग ही जिम्मेदार रहे हैं? क्या म० प्र० राज्य सूचना आयोग की अपनी भूमिका इस जिम्मेदारी से कतई मुक्त रही है? सम्भवत:, ऐसी ही किसी सामाजिक पीड़ा के मूल्यांकन के बाद इस पुरातन उक्ति ने जन्म लिया था कि ‘पर उपदेश, कुशल …

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