Jyoti Prakash

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सूचना के अधिकार को तिलांजलि देता राज्य सूचना आयोग

Sarokar

आयोग की कार्य-शैली आरम्भ से ही दूषित रही है। इसके प्रामाणिक उदाहरण भी सामने आते रहे हैं। इन्हीं प्रमाणों में कुछ ‘माननीयों’ पर लगे ‘स्वार्थ-सिद्धि’ के अत्यन्त गम्भीर आरोप भी सामने आ चुके हैं। जिन पर आरोप लगे हैं, उनमें से अनेक के पास स्वयं को निर्दोष प्रमाणित करने लायक जमीन भी उपलब्ध नहीं है। Continue reading

बलात्कार-पीड़िता की पहचान

Bahas

बहस में कूदे तमाम राजनैतिक दलों और उनके धुरन्धरों को समझना होगा कि आईपीसी की धारा २२८-ए यौन-प्रताड़ित को उसके द्वारा भोगी जा चुकी प्रताड़ना से आगे की सामाजिक प्रताड़ना से संरक्षित करने के लिए जोड़ी गयी थी, उसे अपने नैसर्गिक अधिकारों से वंचित करने के लिए नहीं। Continue reading

‘कुत्ता-न्याय’

Twarit

जानते हैं, तेज रफ़्तार निकलते वाहनों के पीछे सड़क के कुत्ते ऐसे क्यों भौंकते-दौड़ते हैं जैसे ड्राइवर को काट कर ही छोड़ेंगे? दरअसल, उनमें से किसी ना किसी के किसी ना किसी नातेदार को तेज रफ़्तार वाहनों ने कुचल कर मारा हुआ होता है। Continue reading

…और गजेन्द्र फन्दे पर झूल गया!

Sarokar

गजेन्द्र के उस तथाकथित सुसाइड-नोट की विषय-वस्तु को, तार्किक रूप से, मृतक की निजी व्यथा का ईमान-दार कथन नहीं माना जा सकता है। इस नोट में यह कहीं नहीं लिखा गया है कि वह आत्म-हत्या कर रहा है। और इसी से, यह बड़ा स्पष्ट संकेत निकलता है कि उक्त विषय-वस्तु किसी अन्य ‘विचारक’ के उपजाऊ मष्तिष्क की हाई-ब्रिड फसल थी। Continue reading

यथार्थ-परक नजरिया पत्रकारिता को काल-जयी बनाता है

Sarokar

चुनौती-भरी प्रति-स्पर्धा में सालों-साल अपनी साख को अक्षुण्ण बनाये रखना हर दैनिक के बूते की बात नहीं है। नियमित अन्तराल से प्रकाशित होने वाली समाचार-पत्रिकाओं के लिए तो यह और भी दुश्कर है। ऐसा कर पाने के लिए दृष्टि का केवल निर्मल होना नहीं बल्कि उसका गहरा होना भी आवश्यक है। Continue reading

‘आप’ का सबसे बड़ा सबक

Sarokar

आन्दोलन में सामाजिक सोच चाहे जितना भी गहरा हो, इस सोच को राजनीति के साँचे में कतई नहीं ढाला जा सकता है। आन्दोलन राजनीति के भटकाव को नियन्त्रित करने वाली जन-धारा है। ऐसी आदर्श स्थिति में किसी जन-आन्दोलन का सत्ता में विलोप कैसे किया जा सकता है? भले ही वह उसी के कारण अस्तित्व में आयी हो। Continue reading

आदर्श ग्राम पर आदर्श सवाल : ३

Sarokar

कुल मिला कर दो प्रकार के शोर गूँज रहे हैं। पहला औसत उथली समझ के व्यक्तियों के लिए है जबकि दूसरा तनिक ज्यादा बौद्धिक बहस-बाजों को समर्पित। किन्तु, विरोध के इन दोनों ही शोरों में एक दुर्भाग्य-जनक समानता है — दोनों ही कृषि-भूमि के अधिग्रहण के विरोधी नहीं हैं। सारा विरोध या तो वाजिब शर्तों के या फिर वाजिब दामों के निर्धारण पर सिमटा हुआ है। Continue reading

आदर्श ग्राम पर आदर्श सवाल : २

Sarokar

केन्द्र की कागजी लफ़्फ़ाजी के प्रकाश में सवाल यह है कि विकल्पों के चुनाव का अधिकार क्या सच में गाँवों के हाथ में होगा? या, विकल्पों के निर्धारण के विकल्प पर शासन-प्रशासन के गिनती के पूर्वाग्रहित कर्ता-धर्ताओं का स्वत्वाधिकार होगा? गाँवों की जीवन शैली मूलत: कृषि-प्रधान है, आदर्श ग्राम योजना क्या इसे संरक्षित रख पायेगी? Continue reading