Category: अतीत का झरोखा

किसे नहीं जरूरत संयम की?

Ateet Ka Jharokha

यह सही हो सकता है कि अतीत में मतदाता राजनैतिक चालबाजों के झाँसे में आ गया हो। ऐसा आगे भी हो सकता है। लेकिन मुद्दों को समझने, और उन्हें तय करने का भी, मतदाता का अधिकार उससे केवल इस सोच के आधार पर छीना नहीं जा सकता कि वह अन-पढ़ या कि गँवार है, और इसलिए, इतना ना-समझ है कि सहजता से बरगलाया जा सकता है। Continue reading

खेतिहर मजदूर का कुल मोल

Ateet Ka Jharokha

बीते सप्‍ताह म० प्र० के पन्ना जिले से एक किशोर को थोड़े से अनाज के ऐवज में प्रदेश के ही सतना जिले के किसी किसान के यहाँ गिरवी रखने की खबर सुर्खियों में रही। ख़बर अधिक सुर्ख़ इसलिए रही कि किशोर के परिवार ने तो घटना की पुष्‍टि की लेकिन पन्ना का पूरा का पूरा प्रशासनिक अमला जहाँ एक ओर इसे झुठलाने में लगा हुआ है वहीं दूसरी ओर उसने जोड़-तोड़-जुगाड़ कर सम्बन्धित किशोर को उसके घर वापस पहुँचा दिया है। Continue reading

रतन मोल भाजी, कौड़िन मोल खाजा!

Ateet Ka Jharokha

कौड़ी और रत्‍न को आँकने का प्रजा-तान्त्रिक अन्दाज बड़ा अनोखा है। पिछले सालों में होमिअपैथी की वैधानिक पढ़ाई तब तक पूरी नहीं हुई जब तक एलोपैथी के ‘पैथॉलॉजी’ और ‘प्रेक्टिस ऑफ मेडिसिन’ जैसे लिखित और प्रैक्टिकल उत्तीर्ण न कर लिये गये हों। और अब तो एम०बी०बी०एस० पाठ्य-क्रम में होमिअपैथी के मूल सिद्धान्त शामिल किये जा रहे हैं। Continue reading

कानून नागरिक के लिए है, नागरिक कानून के लिए नहीं

Ateet Ka Jharokha

एक सहज सवाल है कि नजरें इतनी नीची करके कि वे बन्द सी ही बनी रहें, आखिर कब तक जिया जा सकेगा? सच है कि नागरिक को कानून के प्रति जिम्मेदार बनना पड़ेगा पर कानून की भी अपनी जिम्मेदारियाँ होती हैं कि नहीं? Continue reading