Category: अर्थ_कृषि_उद्योग_श्रम

खेसारी की खेती को कानूनी मंजूरी का मतलब जन-स्वास्थ्य से छलावा

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खेसारी का जहर नये सिरे से फन उठा रहा है। इसे कुचलना ही होगा। नहीं तो, ऐसा अनर्थ होगा जिससे मुक्ति की कोई राह कभी नहीं ढूँढ़ी जा सकेगी। एक अनर्थ को रोक सकने की तन्त्र की असमर्थता उस अनर्थ को सामाजिक और कानूनी मान्यता देने की अपनी बद-नीयती को जायज कैसे ठहरा सकती है? Continue reading

फिर से फन उठाता खेसारी का जहर

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आधी-अधूरी और अपुष्ट सूचनाएँ उपलब्ध करा खेसारी दाल की खेती को कानूनी मान्यता देने की खबर है। खबर के साथ सोचे-समझे कुतर्क फैलाये जा रहे हैं। खेसारी से जिनके व्यापारिक स्वार्थ जुड़े हैं उनके द्वारा भी, कुछ तथा-कथित कृषि-विज्ञानियों द्वारा भी और शासन-प्रशासन तन्त्र से जुड़े निहित स्वार्थी तत्वों द्वारा भी। Continue reading

मतलब की खेती : ‘दाल’ नहीं ‘कमाई’ काटते राज-नेता

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हमारा सोच आर्थिक-व्यापारिक अधिक हो गया है। वह नैतिकता-सामाजिकता के निम्नतर स्तर पर पहुँच गया है। कोई अचरज नहीं कि खेसारी-समर्थक ‘वैज्ञानिक’ लॉबी को गलतियाँ करने से कोई गुरेज नहीं है; गुरेज है तो केवल इस पर कि ऐसी गलतियाँ कतई नहीं की जायें जिनसे ‘अधिकतम्’ आर्थिक कमाई मिलने में कोई कसर रह जाती हो। Continue reading

खेत बदौलत जिये इन्सान, फिर क्यों भूखा मरे किसान?

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राजधानी भोपाल की हुजूर तहसील में अधिकांश ग्राम पंचायतों में किसानों की खरीफ फसल प्राकृतिक आपदा का शिकार हो चुकी है। यहाँ ऐसे किसान उँगलियों पर ही गिने जा सकेंगे जिनकी खरीफ फसलें खेतों से खलिहानों तक पहुँचेंगी। और, पहुँचेंगी भी तो इतनी जिसे ठीक-ठाक कहा जा सके। किसानों ने खड़ी फसल के खेतों को भी हाँकना शुरू कर दिया है। Continue reading

तैयार रहिए, नये ‘तिवड़ा’ घोटाला के लिए!

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खेसारी दाल (तिवड़ा) तो एक बहाना है। मध्य प्रदेश सरकार में से कोई भी यह सचाई उजागर करने को तैयार नहीं है कि इकार्डा को एक सुरक्षित जगह की तलाश थी क्योंकि मध्य-पूर्व की अस्थिरता से उसे अपना बोरिया-बिस्तर बाँधना पड़ा है। और, मध्य प्रदेश सरकार इसके लिए पट गयी। बिना सोचे-समझे। Continue reading

गरीबों के नाम पर नया शिगूफ़ा

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गरीब को प्रोटीन उपलब्ध कराने के बरसों पुराने झुन-झुने के नाम पर छोड़ा गया एक नया शिगूफ़ा सामने आया है। अन्तर्राष्ट्रीय बिरादरी दावा कर रही है कि प्रयोग-शालाओं में तैयार की जाने वाली ‘सुरक्षित’ खेसारी, दाने-दाने और पैसे-पैसे को मोहताज गरीब की, प्रोटीन की सारी आवश्यकताओं की पूर्ति करेगी। Continue reading

आदर्श ग्राम पर आदर्श सवाल : ३

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कुल मिला कर दो प्रकार के शोर गूँज रहे हैं। पहला औसत उथली समझ के व्यक्तियों के लिए है जबकि दूसरा तनिक ज्यादा बौद्धिक बहस-बाजों को समर्पित। किन्तु, विरोध के इन दोनों ही शोरों में एक दुर्भाग्य-जनक समानता है — दोनों ही कृषि-भूमि के अधिग्रहण के विरोधी नहीं हैं। सारा विरोध या तो वाजिब शर्तों के या फिर वाजिब दामों के निर्धारण पर सिमटा हुआ है। Continue reading

आदर्श ग्राम पर आदर्श सवाल : २

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केन्द्र की कागजी लफ़्फ़ाजी के प्रकाश में सवाल यह है कि विकल्पों के चुनाव का अधिकार क्या सच में गाँवों के हाथ में होगा? या, विकल्पों के निर्धारण के विकल्प पर शासन-प्रशासन के गिनती के पूर्वाग्रहित कर्ता-धर्ताओं का स्वत्वाधिकार होगा? गाँवों की जीवन शैली मूलत: कृषि-प्रधान है, आदर्श ग्राम योजना क्या इसे संरक्षित रख पायेगी? Continue reading