Category: अर्थ_कृषि_उद्योग_श्रम

आईसीआईसीआई का मकड़-जाल : २

Sarokar

बीती १२ जून को जबलपुर में आयोजित पत्रकार वार्ता में स्वयं-सेवी संगठन सोशल एण्ड ज्युडीशियल एक्शन ग्रुप (सजग) के अध्यक्ष डॉ० ज्योति प्रकाश ने SARFAESIA के प्रावधानों पर गम्भीर सवाल उठाये और कहा कि उसमें ऐसे किसी न्यायिक नियन्त्रण का प्रावधान नहीं है जो वसूली की किसी अनैतिक अथवा सरासर असत्य प्रक्रिया को, उसके आरम्भ …

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आईसीआईसीआई का मकड़-जाल : १

Sarokar

आईसीआईसीआई के आर्थिक दुराचारों से जुड़ी ढेरों खबरें बीते दिनों राष्‍ट्रीय और अन्तर्राष्‍ट्रीय सुर्खियों में रही हैं। लोक सरोकारों के प्रति अदम्य लालसा रखने वाले स्वयं-सेवी संगठन सोशल एण्ड ज्युडीशियल एक्शन ग्रुप (सजग) ने अब इन सुर्खियों में एक नया आयाम जोड़ दिया है।

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गाँवों को गाँव ही रहने दो

Sarokar

गाँव का निवासी जब शहर को पलायन करता है तब अपने साथ केवल श्रम की, और यदि वह कुशल है तो अपनी निजी कुशलता की भी, सौगात ले जाता है। उसका गाँव उसके पीछे ही छूट जाता है। लेकिन जब शहरी व्यक्‍ति गाँव की ओर कदम बढ़ाता है तब वह अपनी सहायता के लिए शहर …

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आईसीआईसीआई के गोरख-धन्धे

Sarokar

आईसीआईसीआई होम फ़ाइनेन्स कं० अपने ग्राहकों से वसूली राशियों की पावती को महीनों बाद की तारीखों में दर्ज करती है। तो क्या आईसीआईसीआई होम फ़ाइनेन्स कं० ग्राहकों से वसूली राशियों को सट्‍टा, शेयर, हवाला या तस्‍करी जैसे गैर-कानूनी धन्धों में ‘बेनामी’ रूप से लगाती है?

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सपना ही है स्याह-सर्द रात के बाद की गर्माहट

Ateet Ka Jharokha

यह विडम्बना नहीं तो और क्या है कि हमारे सामने अभी भी यह साफ़ नहीं है कि, आज ही सही, हम उस त्रासदी की आँच में झुलस रहे पीड़ितों के लिए ऐसा कुछ क्या कर सकते हैं जो समर्थ रहते हुए भी हमने तब केवल इसलिए बिल्कुल नहीं किया कि हम प्रत्यक्ष-परोक्ष स्वार्थों से आकण्ठ …

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APPRECIATION

Atithi-Vichar

‘कृषि’ और ‘सूचना-प्रौद्योगिकी’ जैसे दो सुदूर कोनों को एक साथ साध कर देश और समाज के लिए कुछ कर पाने का सपना सँजोते अजय कुमार ((www.farmerswelfare.org)) ने नेशनल एण्डोन्मेण्ट फ़ॉर द ह्यूमेनिटीज़ (नेह) द्वारा प्रायोजित वार्षिक जैफ़रसन भाषण-माला के अन्तर्गत्‌ वेण्डेल ई बेरी ((Noted poet, essayist, novelist, farmer and conservationist.)) द्वारा २३ अप्रैल २०१२ को …

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सत्ता-भूख में उपवास की नौटंकी

वह सत्ता की भूख की बेहद अनोखी मिसाल होती। सरकार तो खाती-पीती रहती लेकिन अपने सियासी बयानों और लोक-लुभावनी अदाओं से बेबस किसानों को, पेट भरने लायक मुआवजा देने-दिलवाने की, बरसों से चली आ रही नौटंकी का नया संस्करण दिखाता उसका मुखिया भूखा बैठा रहता।

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किसान राज-नीति

Sarokar

भोपाल के ताजे परिदृष्य में आम शहरी आदमी द्वारा यह सवाल उठाया जाना क्या सरासर अनैतिक होगा कि हर सिक्के की तरह किसानों द्वारा लहरा-लहरा कर दिखाई जा रही तस्वीर का भी अपना दूसरा पहलू है? नैतिकता से ही जुड़े कुछ सवाल उलटकर करने की घड़ी आ गयी है।

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