Category: समाज_धर्म_न्याय_शिक्षा_राजनीति

स्पैक्‍ट्रम-आबंटन महा घोटाले की जाँच : सुलगता सवाल

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा घोटाले की जाँच की निगरानी के सूत्र अपने हाथ में रखने के निर्णय को लेकर यदि यह कहा जाए कि इसने स्वतन्त्र भारत के, अब तक के, सबसे कठिन प्रजातान्त्रिक पहलू की सर्वथा नई, श्रृंखला -बद्ध, दार्शनिक बहस को भी सुलगा दिया है तो इसे प्रतिष्‍ठा का अहंकारी सवाल नहीं बनाया जाना …

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सुदर्शन बनाम सोनिया : क्यों फिसली जुबान?

सोनिया के नातेदार विन्सी के माध्यम से इन्दिरा की सुरक्षा में इटालियन सेंध लगने से जुड़ी सम्भावना और इटली के खुफ़िया-तन्त्र द्वारा एसपीजी कमाण्डो को अपमानित किये जाने के विवरणों से प्रभावित होते हुए इन्दिरा और राजीव की हत्या में ‘सीआईए वाया सोनिया’ जैसा दावा करना सुदर्शन की तकनीकी, किन्तु बड़ी गम्भीर, भूल थी।

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ब्लैक-मेलिंग के मोहरे या शातिर खिलाड़ी?

मुख्य सूचना आयुक्‍त से बेहद आधारभूत खुला जन-सवाल है कि, इतने साल संवैधानिक पद और प्रतिष्‍ठा की अत्यन्त पौष्‍टिक मलाई छानते हुए, इतनी उच्च संवैधानिक संस्था की काल्पनिक निरीहता का रोना रोने से परे ब्लैकमेलिंग के इस शाश्‍वत्‌ दोष के निवारण की दिशा में उनका अपना ऐसा तात्विक योगदान वास्तव में क्या रहा जिससे अधिनियम …

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धर्म-निरपेक्षता का आडम्बर

धर्म-निरपेक्षता का सोच अप्राकृतिक है क्योंकि यह अपने-अपने वैयक्‍तिक स्वार्थों को फलीभूत करने के सोच से उपजा आडम्बर है। दुर्भाग्य से, हम ऐसे गुरुजनों से वञ्‍चित होते जा रहे हैं जो समाज, समुदाय और सम्प्रदाय में भेद करने लायक शिक्षा दे सकें।

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अग्नि-परीक्षा-२ : परीक्षा तो सूचना का अधिकार अधिनियम की भी

Sarokar

अधिनियम को लोक सूचना अधिकारी की वैधानिक जवाबदेही के अपने ब्रह्मास्‍त्र को सर्वोच्च न्यायालय में होने जा रही वैधानिक बहस में प्रतिष्‍ठित कराना ही होगा। यह उसकी बड़ी अग्नि-परीक्षा होगी क्योंकि यदि वह ऐसा नहीं कर पाया तो अधिनियम अपनी भावना और उद्देश्य, दोनों ही, सदा के लिए गँवा बैठेगा। सूचना का अधिकार अधिनियम की …

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अग्नि-परीक्षा-१ : परीक्षा में झुँकी न्याय की भारतीय अवधारणा

Sarokar

बलि की बेदी के खूँटे से साक्षात्‌ न्याय की भारतीय अवधारणा ही बाँध दी गयी है। बिना परिणामों की गहराई पर विचार किये ही न्याय की भारतीय अवधारणा को अग्नि-परीक्षा में झौंक दिया गया है। परम्परा से कहीं बहुत गहरा है न्याय की भारतीय अवधारणा का आसन्न संकट।

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मतदाता का अधिकार : लोक-तन्त्र के अस्तित्‍व की गारण्टी

लोक-तन्त्र को अब, ‘मतदान के अधिकार’ की नहीं अपितु ‘मतदाता के अधिकार’ की स्थापना की दरकार है क्योंकि मतदाता का अधिकार बहुत व्यापक है जबकि मतदान का उसका अधिकार तो लोक-तन्त्र के इस यथार्थ और व्यापक अधिकार की प्राप्‍ति का एक साधन मात्र है।

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