Category: समाज_धर्म_न्याय_शिक्षा_राजनीति

यह कैसी लोक अदालत?

Bahas

क्या यह सम्भव है कि दो पक्षों के बीच चल रहे किसी वैधानिक/न्यायिक विवाद की सुनवाई किसी लोक अदालत में उस स्थिति में भी पूरी कर ली जाये (और फैसला भी सुना दिया जाये) जब उस विवाद के अपीलकर्ता ने अपने प्रकरण की सुनवाई उस लोक अदालत में करने की सहमति दी ही नहीं हो? Continue reading

म० प्र० राज्य सूचना आयोग की खोखली सफाई

Sarokar

सजग और राष्ट्रीय जागरण मंच ने बीती ४ जून को उसके द्वारा अपनाई जा रही घोर अपारदर्शिता के विरोध में म० प्र० राज्य सूचना आयोग को जो ज्ञापन दिया था उससे आयोग में हड़कम्प मचने के संकेत आने लगे हैं। आयोग बैक पुट पर है। Continue reading

अपनी कार्य-शैली को तत्काल प्रभाव से पार-दर्शी बनाये आयोग

Sarokar

स्वयं राज्य सूचना आयोग ही जब अधिनियम के अन्तर्गत् अपने बन्धनकारी दायित्व की उपेक्षा कर रहा है तो कोई यह अपेक्षा कैसे कर सकता है कि वह प्रदेश के विभिन्न लोक-प्राधिकरणों द्वारा अपने कार्यालयों में इसके पालन की निगरानी करने जैसी जिम्मेदारी का सचमुच ही निर्वाह करता होगा? Continue reading

क्या संदिग्ध है सूचना-प्रदाय में सूचना आयुक्त की भूमिका?

Bahas

स्वयं आयुक्त यह कहते हुए देखे गये हैं कि आदेश पारित करने के बाद से उनको अपनी जान का खतरा दिखने लगा है! सवाल यह है कि जो कोई भी धमकी दे रहा है वह सीधे-सीधे सूचना आयुक्त से इतना नाराज क्यों है? और, जानकारी माँग कर मामले को खोद निकालने वाले आवेदक को उसने बख्श क्यों दिया है? Continue reading

केजरी ‘जंग’ : केवल अहं की लड़ाई नहीं

Sarokar

केजरीवाल एक नये किस्म की अराजकता के बीज बो रहे हैं। देश की सम्प्रभुता को चोटिल कर एक क्षत्रप सम्प्रभु सत्ता के निर्माण की एक नयी सोच दे रहे हैं। वे शायद इसे दिल्ली के बाहर भी विस्तार देने का इरादा रखते हैं। कहीं यह देश को एक नये किस्म के नक्सल-वाद की ओर बढ़ाने का संकेत तो नहीं है? Continue reading

सूचना के अधिकार को तिलांजलि देता राज्य सूचना आयोग

Sarokar

आयोग की कार्य-शैली आरम्भ से ही दूषित रही है। इसके प्रामाणिक उदाहरण भी सामने आते रहे हैं। इन्हीं प्रमाणों में कुछ ‘माननीयों’ पर लगे ‘स्वार्थ-सिद्धि’ के अत्यन्त गम्भीर आरोप भी सामने आ चुके हैं। जिन पर आरोप लगे हैं, उनमें से अनेक के पास स्वयं को निर्दोष प्रमाणित करने लायक जमीन भी उपलब्ध नहीं है। Continue reading

…और गजेन्द्र फन्दे पर झूल गया!

Sarokar

गजेन्द्र के उस तथाकथित सुसाइड-नोट की विषय-वस्तु को, तार्किक रूप से, मृतक की निजी व्यथा का ईमान-दार कथन नहीं माना जा सकता है। इस नोट में यह कहीं नहीं लिखा गया है कि वह आत्म-हत्या कर रहा है। और इसी से, यह बड़ा स्पष्ट संकेत निकलता है कि उक्त विषय-वस्तु किसी अन्य ‘विचारक’ के उपजाऊ मष्तिष्क की हाई-ब्रिड फसल थी। Continue reading

यथार्थ-परक नजरिया पत्रकारिता को काल-जयी बनाता है

Sarokar

चुनौती-भरी प्रति-स्पर्धा में सालों-साल अपनी साख को अक्षुण्ण बनाये रखना हर दैनिक के बूते की बात नहीं है। नियमित अन्तराल से प्रकाशित होने वाली समाचार-पत्रिकाओं के लिए तो यह और भी दुश्कर है। ऐसा कर पाने के लिए दृष्टि का केवल निर्मल होना नहीं बल्कि उसका गहरा होना भी आवश्यक है। Continue reading