Category: समाज_धर्म_न्याय_शिक्षा_राजनीति

यथार्थ-परक नजरिया पत्रकारिता को काल-जयी बनाता है

चुनौती-भरी प्रति-स्पर्धा में सालों-साल अपनी साख को अक्षुण्ण बनाये रखना हर दैनिक के बूते की बात नहीं है। नियमित अन्तराल से प्रकाशित होने वाली समाचार-पत्रिकाओं के लिए तो यह और भी दुश्कर है। ऐसा कर पाने के लिए दृष्टि का केवल निर्मल होना नहीं बल्कि उसका गहरा होना भी आवश्यक है।

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‘आप’ का सबसे बड़ा सबक

आन्दोलन में सामाजिक सोच चाहे जितना भी गहरा हो, इस सोच को राजनीति के साँचे में कतई नहीं ढाला जा सकता है। आन्दोलन राजनीति के भटकाव को नियन्त्रित करने वाली जन-धारा है। ऐसी आदर्श स्थिति में किसी जन-आन्दोलन का सत्ता में विलोप कैसे किया जा सकता है? भले ही वह उसी के कारण अस्तित्व में …

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मोदी की बनारस ‘विजय’ का तात्पर्य

यद्यपि परिणाम १६ मई को ही सामने आयेगा लेकिन इतना तो आज ही कहा जा सकता है कि बीते कल का दिन भारतीय प्रजा-तन्त्र में एक महत्व-पूर्ण घटना-क्रम का बीज बो गया है। १६ मई को तो यह पता चलेगा कि ८ मई को बोये गये बीज का फल बबूल के रूप में निकलेगा या …

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चुनाव आयोग ने की देश की सबसे बड़ी अदालत की खुली अवमानना

निर्वाचन आयोग कोई भी बचकानी सफ़ाई भले देता फिरे लेकिन वह इसे झुठला नहीं पायेगा कि उसने न्यायिक आदेश के पालन के अपने महत्व-पूर्ण दायित्व की खुली अवहेलना की है। और, यह उसके द्वारा सर्वोच्च न्यायालय की सोच-समझ कर की गयी अवमानना से रत्ती भर भी कम नहीं है।

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सूचना आयोग ही नहीं, अन्य कईयों के चेहरे पर कालिख पोत गयी लोक अदालत

अन्तत:, सूचना आयोग ने अपनी हेकड़ी पूरी कर ही ली। परिणाम ‘हासिल आया शून्य’ ही रहा या फिर ‘किसी-किसी को कुछ-कुछ हासिल भी हुआ’; यह गहरी समीक्षा का विषय है। ऐसी निष्पक्ष समीक्षा से ही यह निष्कर्ष निकल पायेगा कि २९ मर्च २०१४ की लोक अदालत राज्य सूचना आयोग के साथ ही राज्य में पदस्थ …

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अधिनियम की मंशा को ठेंगा दिखाता राज्य सूचना आयोग

सूचना का अधिकार अधिनियम, २००५ की मूल मंशा जानकारियों तक नागरिक की पहुँच सुनिश्चित करना है। इस उद्देश्य के लिए अधिनियम में ‘सूचना आयोग’ जैसी वह स्वायत्त व्यवस्था भी गढ़ी गयी है जो, कागजों पर, शासन-तन्त्र के हस्तक्षेप से सर्वथा स्वतन्त्र है। लेकिन संकेत हैं कि म० प्र० राज्य सूचना आयोग ने ही अधिनियम का …

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बिटिया की सीख

गर्व से कहती हूं कि मैं बेटी हूँ। मुझे दया अथवा सहानुभूति से मत देखिये। मुझे सबकी बराबरी का वह सम्मान दीजिये जिसे नकार कर आप स्वयं के ही अपमानित होने के द्वार खोलते हैं। लिंग-भेद के आधार पर, श्रेष्‍ठता की कोई तलाश कतई स्वीकार्य नहीं है क्योंकि यह एक दो-धारी तलवार है।

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गांगुली विवाद : खेत खाने की जुगत भिड़ाती बागड़ें

ऐसा कम ही हुआ है जब किसी ने अपने अस्तित्व के औचित्य पर प्रश्‍न उठाये हों। और, ऐसा तो हुआ ही नहीं है कि किसी ने स्वयं अपनी ही शुचिता के मिथक पर उँगली उठायी हो। किन्तु न्याय-मूर्ति गांगुली से जुड़े ताजे प्रशिक्षु-विवाद ने ऐसी सम्भावनाओं को जन्म दिया है कि यह भरोसा करने को …

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