Category: विज्ञान_स्वास्थ्य

एड्स : निशाने पर कुछ और

Ateet Ka Jharokha

तथ्यों की खोज-बीन बतलाती है कि एड्स यौन-व्यभिचार से कहीं अधिक चिकित्सा-व्यभिचार का दुष्परिणाम है। विशुद्ध वैज्ञानिक यथार्थ तो यह भी है कि मातृत्व भरा स्नेहिल स्पर्श भी, कुछ खास स्थितियों में, किसी-किसी को संक्रमित कर सकता है। विश्‍व स्वास्थ्य संगठन द्वारा प्रायोजित लेख अथवा विज्ञापन चाहे जितना दावा करें, रोग-विज्ञान की इस सचाई को झुठलाया नहीं जा सकता है। Continue reading

घेंघा : असली बीमारी तो लूट की है

Ateet Ka Jharokha

‘आधुनिक’ विज्ञान कहता है कि, आम तौर पर, आयोडीन की यह जरूरत सहज-सामान्य खान-पान से पूरी हो जाती है। जबकि, इसी के समानान्तर समाज-विज्ञानी तथ्य बतलाता है कि घेंघा-मुक्‍त क्षेत्रों की तुलना में घेंघा-पीड़ित क्षेत्रों में शोषण बहुत अधिक है। Continue reading

विकास-वाद का सिद्धान्त

Ateet Ka Jharokha

होमिअपैथी विकास-वाद की इसी धारणा के दायरे में काम करती है। इस विज्ञान की कुञ्‍जी विकास की प्रक्रिया में निहित है। Continue reading

The Theory of Evolution

Ateet Ka Jharokha

Homoeopathy works on this premise of evolution — the process of evolution holds the key. Continue reading

वैदिक दर्शन में मिलेगी होमिअपैथी की समझ

Ateet Ka Jharokha

होमिअपैथी औषधियाँ, पदार्थ के भौतिक-रासायनिक गुणों से परे, उसके उन जैविक गुणों का उपयोग करती हैं जिनकी अब कल्पना तो की जाने लगी है लेकिन, समुचित कसौटियों के अभाव में, जो अभी तक परखे नहीं जा सके हैं। Continue reading

होमिअपैथी का अनन्त आकाश

Ateet Ka Jharokha

समुचित होमिअपैथी औषधि-उपचार से रोग-मुक्‍ति तो होती ही है, व्यक्‍ति की दबी-छिपी मानसिक और बौद्धिक योग्यताओं के निखार में भी मदद मिलती है। और तब वह अपनी शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक क्षमता के शिखर को छू सकता है। राष्‍ट्र के विकास का यह ऐसा महत्वपूर्ण पहलू है जिसकी भूमिका अभी तक आँकी ही नहीं गयी है। Continue reading

वैक्सीन की पोल : स्वयं पंगु है, पोलियो-मुक्‍ति का दावा

आज २०१०-११ में, स्वयं पोलियो-प्रतिरक्षण ही पोलियो फैलाने वाला सबसे बड़ा कारक बनने के जोखिम पर खड़ा है। पिलायी जाने वाली पोलियो वैक्सीन का कमजोर किया गया विषाणु बीमारी फैलाने लायक अपनी मजबूती एक बार फिर से पाने के लिए उन बच्चों के एण्टेरोवायरसेज़ से आनुवांशिक जानकारी एकत्र कर लेता है जिनको यह प्रभावित करता है। Continue reading

लँगड़े झूठों पर खड़े खेसारी के ‘वैज्ञानिक’ सोच

Sarokar

हमारा सोच नैतिकता-सामाजिकता के निम्नतर स्तर पर पहुँच गया है। कोई अचरज नहीं कि खेसारी-समर्थक ‘वैज्ञानिक’ लॉबी को गलतियाँ करने से कोई गुरेज नहीं है; गुरेज है तो केवल इस पर कि ऐसी गलतियाँ कतई नहीं की जायें जिनसे ‘अधिकतम’ आर्थिक कमाई मिलने में कोई कसर रह जाती हो। Continue reading