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Jyoti Prakash http://www.jyotiprakash.me Tue, 17 Dec 2019 16:28:24 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=4.9.8 नीयत का झोल http://www.jyotiprakash.me/2019/12/%e0%a4%a8%e0%a5%80%e0%a4%af%e0%a4%a4-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%9d%e0%a5%8b%e0%a4%b2/ Tue, 17 Dec 2019 16:19:22 +0000 http://www.jyotiprakash.me/?p=14721

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नीयत का झोल। नागरिकता संशोधन अधिनियम को लेकर बनाये-बढ़ाये जा रहे माहौल के पीछे छिपी नीयत का भारी झोल बड़ी आसानी से देखा जा सकता है। शर्त केवल यही है कि देखने वाले ने कोई निहित-स्वार्थी चश्मा ना पहना हो। मतलब, वह तथ्यों को विशुद्ध तथ्य की तरह देखने को राजी हो। कांग्रेस की अगुआई …

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Twarit

नीयत का झोल।

नागरिकता संशोधन अधिनियम को लेकर बनाये-बढ़ाये जा रहे माहौल के पीछे छिपी नीयत का भारी झोल बड़ी आसानी से देखा जा सकता है। शर्त केवल यही है कि देखने वाले ने कोई निहित-स्वार्थी चश्मा ना पहना हो। मतलब, वह तथ्यों को विशुद्ध तथ्य की तरह देखने को राजी हो।

कांग्रेस की अगुआई में अधिनियम का विरोध शुरू तो ‘राजनीति’ से हुआ लेकिन, ओबैसी जैसों की पहल पर जल्दी ही ‘धार्मिक’ होता गया!

जो खुली आँखों देखना ही नहीं चाहते उन्हें छोड़ दें तो बाकी सबों ने देखा है कि जैसे-जैसे सरकारी पक्ष की ओर से ‘भीतरी’ (अर्थात देशज) और ‘बाहरी’ (अर्थात परदेशी) मुस्लिमों पर देश को भरोसे में लेना शुरू किया गया, वैसे-वैसे साम्प्रदायिकता-प्रधान उग्र हुजुमों की ओर से ‘पहले से ही भारत में संसाधनों और रोजगार के अवसरों की कमी’ होने के भड़काऊ तर्क, परोसने बढ़ते गये।

देश के ‘सुविधा-जनक राज्यों’ में भड़कायी-फैलाई जा रही उच्श्रृंखल हिंसक आग के पीछे नीयत का यही झोल इकलौता खलनायक है।

(१७ दिसम्बर २०१९))

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गांधी बनाम सावरकर http://www.jyotiprakash.me/2019/12/%e0%a4%97%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%a7%e0%a5%80-%e0%a4%ac%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%ae-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%b5%e0%a4%b0%e0%a4%95%e0%a4%b0/ Sun, 15 Dec 2019 06:51:03 +0000 http://www.jyotiprakash.me/?p=14714

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वो इन्दिरा थी, कोई गांधी नहीं। ताकि सनद रहे और वक़्त पर काम आये — राहुल-प्रणीत ताजे ‘गांधी-सावरकर’ विवाद ने बरबस ही बीते इंदिरा-युग की एक याद ताजी कर दी। बात उन दिनों की है जब तत्कालीन प्रधान मन्त्री श्रीमति इन्दिरा गांधी का सत्ता-मद अपने अहं की पराकाष्ठा पर था। तब कविवर पं० भवानी प्रसाद …

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Twarit

वो इन्दिरा थी, कोई गांधी नहीं।

ताकि सनद रहे और वक़्त पर काम आये — राहुल-प्रणीत ताजे ‘गांधी-सावरकर’ विवाद ने बरबस ही बीते इंदिरा-युग की एक याद ताजी कर दी।

बात उन दिनों की है जब तत्कालीन प्रधान मन्त्री श्रीमति इन्दिरा गांधी का सत्ता-मद अपने अहं की पराकाष्ठा पर था। तब कविवर पं० भवानी प्रसाद जी मिश्र ने कविता के माध्यम से उनके इस दम्भ पर गम्भीर टिप्पणी की थी। समय और जगह की सार्थक बचत के लिये, (राहुल की नानी, इन्दिरा गांधी को सम्बोधित) उस बहु-चर्चित कविता की केवल वह सम-सामयिक पंक्ति ही यहाँ उद्धृत है जो आज के सन्दर्भ में, प्रकारान्तर से, राहुल को सम्बोधित हुई भी कही जा सकती है –

“…तू इन्दिरा है, कोई गांधी नहीं।”

(१५ दिसम्बर २०१९)

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जो ना माने सयानों की सीख… http://www.jyotiprakash.me/2019/11/%e0%a4%9c%e0%a5%8b-%e0%a4%a8%e0%a4%be-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%b8%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a5%80%e0%a4%96/ Mon, 11 Nov 2019 16:51:44 +0000 http://www.jyotiprakash.me/?p=14709 महाराष्ट्र की राजनीति ने आज फिर से ‘आधी छोड़ एक को धाये, आधी बची न पूरी पाये’ वाली पुरातन कहावत को चरितार्थ कर दिया!

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३७० तो बहाना है http://www.jyotiprakash.me/2019/10/%e0%a5%a9%e0%a5%ad%e0%a5%a6-%e0%a4%a4%e0%a5%8b-%e0%a4%ac%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a4%be-%e0%a4%b9%e0%a5%88/ Sat, 26 Oct 2019 16:44:10 +0000 http://www.jyotiprakash.me/?p=14702

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कश्मीर को लेकर १९४९ में, केवल राष्ट्रपति के आदेश से, भारतीय संविधान में जोड़ी गयी धारा ३७० के कुछ अंश संवैधानिक विधि-विधान पूर्वक हटा क्या लिये गये; कुछ लोगों के लिये जैसे साक्षात्‌ महा-प्रलय ही घट गया! इस जमात का प्रत्येक मोहरा टिटहरी की तर्ज पर आसमान की ओर पैर किये पड़ा दिन-रात टिटहरा रहा है।

इसी साल ५ अगस्त को देश की संसद्‌ के दोनों सदनों ने बहुमत से भारतीय संविधान की धारा ३७० के कुछ अंश निरस्त कर दिये। संविधान यह वे अंश थे जिनका सहारा लेकर, विशुद्ध साम्प्रदायिक आधार पर अविभाजित भारत से विलग हुआ, पाकिस्तान अपने पाँव पूरे कश्मीर पर भी पसारने का प्रयास करता रहा है।

ऐतिहासिक और कानूनी तथ्यों की बारीकियों से कतई अनभिज्ञ रहने वाले अधिकांश भोले भारतीय यह समझ पाने में सिरे से असफल रहे हैं कि धारा ३७० के यह अंश कश्मीर को हड़प लेने की पाकिस्तानी विस्तार-वादी मंशा को हवा देने में किस तरह सहायक हो रहे थे? इन्हीं भारतीयों को कुछ कथित बुद्धि-जीवी भारतीय भी पूरे प्राण-पण से बरगला रहे हैं। और, आभासी दुनिया इसमें उनका सबसे बड़ा आसरा है। इसी माध्यम से एक पत्रिका ‘सबलोग’ का सितम्बर २०१९ अंक मुझे भी भेजा गया जिसमें संविधान की (अस्थाई) धारा ३७० के कुछ अंशों को हटाने की ‘अवैधानिकता’ को पानी पी-पी कर कोसा गया है। इस पक्ष को रखने के लिये, झूठ से सराबोर, भर-पूर समझाइशें परोसी गयी हैं।

उदाहरण के लिये, इसमें एक श्रीमान्‌ विनोद शाही का लेख है। लेख का शीर्षक है, ‘कश्मीर को कश्मीरियत ही बचा सकती है’। कहने को तो यह एकदम सुपाच्य शीर्षक कहा जायेगा। किन्तु, सरल से दिखने वाले इस शीर्षक के विस्तार में जो आलेख है वह लेखक और उनकी मण्डली की बदनीयती से अटी पड़ी है। इसमें आधार-भूत तथ्य में, भाषायी छल से, एक गम्भीर असत्य उँड़ेला गया है कि कश्मीर के तत्कालीन महाराजा हरीसिंह ने जो संधि भारत सरकार से की थी और, महाराजा कश्मीर-विलय के लिये ‘सशर्त’ सहमत हुए थे। मंशा यह संकेत देने की है कि धारा ३७० भारतीय संविधान का अंश बनेगी और वह संविधान का अटल और अपरिवर्तनीय हिस्सा रहेगी। सारा भ्रम-जाल गणित के समीकरणों के ‘जबकि, ऐसा है तो ऐसा होगा’ वाली तर्ज पर इस एक झूठे के ताने-बाने के चौगिर्द बुना गया है कि महाराजा की यह शर्त बाकायदा संधि का हिस्सा थी।

जाहिर है, धारा ३७० का हटाया जाना तो बस एक बहाना है। असली मकसद तो १९४७ की भारत-विभाजन की प्रक्रिया को निरन्तर रूप से बनाये रखना है। क्योंकि, उनके जैसों के लेख देश में भयंकर बद-हजमी पैदा करेंगे; पहले पत्रिका से उठाये गये विनोद शाही के सन्दर्भित लेख के निम्न अंशों का संज्ञान लेना महत्व-पूर्ण होगा —

“..जब कश्मीर का भारत में कुछ शर्तों के आधार पर विलय हो गया था, तो इसका सहज परिणाम यह होना चाहिए था कि वहाँ भारतीयता का संस्कृति के रूप में विकास होता और उसके तहत कश्मीरियत की बात केन्द्र में आती। परन्तु हालात ऐसे हुए कि बात तीनों सम्भव विकल्पों के लिए खुली रह गयीं। कुछ लोग वहाँ आज भी पाकिस्तान में जाने की बात करते हैं। कुछ लोग आज भी आजाद होना चाहते हैं, जबकि बहुत से लोग भारतीय संघ में रहते हुए विशेषाधिकारों को गँवाये बिना विकास करना चाहते हैं।

…कश्मीर को इस असमंजस की स्थिति में डालने के लिए उन साम्प्रदायिक ताकतों की बड़ी भूमिका है, जो कश्मीर में कश्मीरियत तो चाहते हैं, पर भारतीयता के लिए कोई गुंजाइश नहीं पाते। लेकिन उनके लिये कश्मीरियत भी अधिक महत्व नहीं रखती, जिनकी निगाह में मुस्लिम राज्य के रूप में कश्मीर के होने की बात सबसे ऊपर है। पर आज जब धारा ३७० के कुछ प्रावधानों को हटाकर कश्मीर के विशेषाधिकार बहुत हद तक समाप्त कर दिए गए हैं, तो बात फिर से कश्मीरियत के विकास के आस-पास आकर अटक गयी है।

…धारा ३७० के कुछ प्रावधान हटाकर उसे कमजोर करने से कश्मीर अब अपने विशेषाधिकार खो बैठा है। इन विशेष अधिकारों का इतिहास हमें इस राज्य के लोगों की रजामन्दी के महत्त्व को समझने की ओर ले जाता है। इनकी मौजूदगी ने १९४७ के उन हालात को अभी तक जिन्दा बनाये रखा है जिनके तहत यहाँ के सीमान्त प्रदेशों के लोग यह तय करने के लिये आजाद हो पाते हैं कि वे भारत के साथ रहना चाहते हैं या नहीं। और यदि वे आजाद रहना चाहते हैं, तो भी उसमें उनकी रजामन्दी सर्वोपरि हो जाती है। स्पष्ट है कि यह बात राष्ट्र-वादी विचार-धारा के बिल्कुल अनुकूल नहीं है, जिसका मूल सरोकार भारत की अखण्डता है। यह अखण्डता अब लोक चित्त में निर्विवाद रूप में स्वीकृत हो गयी है। इसका विरोध करने के लिये हमें राष्ट्र-वाद को बहु-संख्यक हिन्दू का साम्प्रदायिक अजेण्डा कहना पड़ता है।

…कश्मीर का भारत में कुछ शर्तों के आधार पर विलय हो गया था। कश्मीरियत को ठीक से समझें तो पायेंगे कि इसके इस ओर भारतीयता है और दूसरी ओर साम्प्रदायिक आधारवाले मुस्लिम राष्ट्र की परिकल्पना है।”

आज २६ अक्टूबर है। और, १९४७ में आज ही के दिन कश्मीर के महाराजा ने अपने अधीन जम्मू और कश्मीर के भारत में विलनीकरण की संधि की थी। इसलिये १९४७ में की गयी इस संधि के शब्दश: उद्धरण का आज से उत्तम दिन मेरी दृष्टि में कोई दूसरा नहीं है। भारतीय गण-तन्त्र का अमंगल चाहने वालों द्वारा इस संधि के सशर्त होने के भ्रम-जाल को काटने के लिये भी यही दिन सर्व-श्रेष्ठ होगा —

“…Whereas the Indian Independence Act 1947, provides that as from the fifteenth day of August, 1947, there shall be set up an Independent Dominion known as India, and that the Government of India Act, 1935 shall, with such omission, additions, adaptations and modifications as the governor-general may by order specify, be applicable to the Dominion of India.

…And whereas the Government of India Act, 1935, as so adapted by the governor-general, provides that an Indian State may accede to the Dominion of India by an Instrument of Accession executed by the Ruler thereof.

…Now, therefore, I Shriman Inder Mahander Rajrajeswar Maharajadhiraj Shri Hari Singhji, Jammu and Kashmir Naresh Tatha Tibbetadi Deshadhipathi, Ruler of Jammu and Kashmir State, in the exercise of my sovereignty in and over my said State do hereby execute this my Instrument of Accession and

  1. I hereby declare that I accede to the Dominion of India with the intent that the governor-general of India, the Dominion Legislature, the Federal Court and any other Dominion authority established for the purposes of the Dominion shall, by virtue of this my Instrument of Accession but subject always to the terms thereof, and for the purposes only of the Dominion, exercise in relation to the State of Jammu and Kashmir (hereinafter referred to as “this State”) such functions as may be vested in them by or under the Government of India Act, 1935, as in force in the Dominion of India, on the 15th day of August, 1947, (which Act as so in force is hereafter referred to as “the Act”).
  2. I hereby assume the obligation of ensuring that due effect is given to the provisions of the Act within this state so far as they are applicable therein by virtue of this my Instrument of Accession.
  3. I accept the matters specified in the schedule hereto as the matters with respect to which the Dominion Legislatures may make laws for this state.
  4. I hereby declare that I accede to the Dominion of India on the assurance that if an agreement is made between the Governor General and the ruler of this state whereby any functions in relation to the administration in this state of any law of the Dominion Legislature shall be exercised by the ruler of this state, then any such agreement shall be deem to form part of this Instrument and shall be construed and have effect accordingly.
  5. The terms of this my Instrument of accession shall not be varied by any amendment of the Act or of the Indian Independence Act 1947 unless such amendment is accepted by me by an Instrument supplementary to this Instrument.
  6. Nothing in this Instrument shall empower the Dominion Legislature to make any law for this state authorizing the compulsory acquisition of land for any purpose, but I hereby undertake that should the Dominion for the purposes of a Dominion law which applies in this state deem it necessary to acquire any land, I will at their request acquire the land at their expense or if the land belongs to me transfer it to them on such terms as may be agreed, or, in default of agreement, determined by an arbitrator to be appointed by the Chief Justice Of India.
  7. Nothing in this Instrument shall be deemed to commit me in any way to acceptance of any future constitution of India or to fetter my discretion to enter into arrangements with the Government of India under any such future constitution.
  8. Nothing in this Instrument affects the continuance of my sovereignty in and over this state, or, save as provided by or under this Instrument, the exercise of any powers, authority and rights now enjoyed by me as Ruler of this state or the validity of any law at present in force in this state.
  9. I hereby declare that I execute this Instrument on behalf of this state and that any reference in this Instrument to me or to the ruler of the state is to be construed as including to my heirs and successors.

…Given under my hand this 26th day of OCTOBER nineteen hundred and forty seven.

(Hari Singh, Maharajadhiraj of Jammu and Kashmir State)

I do hereby accept this Instrument of Accession. Dated this twenty seventh day of October, nineteen hundred and forty seven.

(Mountbatten of Burma, Governor General of India)”

(२६ अक्टूबर २०१९)

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महाकाली की कथा सिखाती है गांधी की अहिन्सा का पूरा दर्शन http://www.jyotiprakash.me/2019/10/%e0%a4%ae%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%a5%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%96%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a5%80-%e0%a4%b9%e0%a5%88-%e0%a4%97/ Wed, 02 Oct 2019 17:37:50 +0000 http://www.jyotiprakash.me/?p=14689

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कथित ‘औसत समझ’ के उलट, महाकाली आदमी और आदमीयत को केन्द्र में रखने वाला प्रतीक है। और, महाकाली की गाथा में ही अहिन्सा का गांधी-वादी आदर्श अपनी पूर्णता में निखरता है।

कुछ स्वार्थों ने हमारे समाज की सांस्कृतिक विरासत को आज काफी विकृत कर दिया है। और, यह सचमुच चिन्ता की बात है। किन्तु यह चिन्ता, खलने से हटकर, सहज है। इस चिन्ता का पनपना, और उसका सहज-भावी होना भी, केवल इसलिए है कि वह अतीत को आज भी उपयोगी मानती है। और, ऐसा मानकर हम अपने बीच घर कर गयी बुरी और अग्राह्य रूढ़ियों को तोड़ना चाहते हैं।

परन्तु रूढ़ियों को तोड़ने के नाम पर जो हाथ और दिमाग आज तेजी से चल रहे हैं, उन्हें न तो हमारी संस्कृति से कुछ लेना-देना है और ना ही आम आदमी की ताकत स्थापित करने की उनकी कोई मंशा ही है। जबकि सच में तो, कम से कम भारतीय समाज के सन्‍दर्भ में, यह दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। हमारी मान्यताओं को तोड़ने के प्रयासों के पीछे जो इरादे काम कर रहे हैं वे, बस, हमारा आत्म-विश्‍वास भर डिगाना चाहते हैं। उन्हें भरोसा है कि इस धरातल पर हमारे टूट जाने के बाद राष्‍ट्र-विखण्डन के सारे सूत्र स्वयमेव उनके हाथ में होंगे।

क्या सचमुच हमारी संस्कृति, हमारी धार्मिकता, हमारे आदर्श आज के अनुरूप नहीं हैं? इन्हें ‘अनुरूप नहीं’ बताने वाले राजनीति के उस खेल को खेलने में जुटे हैं जो आदमी को आदमी मानती ही नहीं है। वह उसे जानवर (बल्कि, मशीन) से अधिक का दर्जा देने को तैयार नहीं है। और विश्‍वास कीजिए, इस बुद्धि-विलास की आलोचना करना हिन्दू धर्मान्धता अथवा तथाकथित साम्प्रदायिकता कतई नहीं है।

आदि-शक्‍ति के एक स्वरूप की ओर हमारा ध्यान जाता तो जरूर है लेकिन सम्‍भवत: इसका कारण उसकी विकरालता है। क्या कभी हमने इस तरह भी सोचा है कि गांधी का आदर्श अपने सबसे शक्‍ति-शाली स्वरूप में इसी पौराणिक गाथा में निखरता है? क्या कभी हमने इस सम्‍भावना को टटोला है कि हमारे सामाजिक मूल्यों के परिप्रेक्ष्य में महाकाली आदमी और आदमीयत को केन्द्र में रखने वाला ऐसा प्रतीक है जिसे भुलाकर अथवा झुठलाकर हम रूढ़ियाँ नहीं, आदमीयत की श्रेष्‍ठता स्थापित करने का अपना ऐसा सपना तोड़ रहे हैं जिसे गांधी के माध्यम से अब समूची दुनिया में मान्यता मिल चुकी है?

निहित स्वार्थ अच्छे से अच्छे वातावरण में भी अपने लिए जगह बना ही लेते हैं। इस अर्थ में स्वार्थ रक्‍तबीज है जिस पर चोट होते ही उसके रक्‍त की हर एक गिरी हुई बूंद एक नया स्वार्थ पैदा करती है ताकि समाज पर उसकी पकड़ और मजबूत हो। इस शक्‍तिशाली बुराई को समूह की (हिंसक) महाशक्‍ति से सोखने का जो प्रयोग अतीत में हमारे समाज में हुआ (या नहीं हुआ था तो, हमें सीख देने के लिए ही सही, जिसकी कहानी गढ़ी गयी), उसका ही नाम महाकाली है।

तब समाज की सारी अच्छी ताकतों को इकट्‍ठा करके हिंसा को हिंसा के ही प्रयोग से समाप्‍त करने का जो तरीका अपनाया गया था, उसका दु:खद्‌ अनुभव यह है कि न चाहते हुए भी, ताकत का एक नया उन्माद पैदा हुआ था। इस उन्माद में विवेक सूख गया था। रक्‍तबीज का रक्‍त पीते-पीते महाकाली अपना आपा खो बैठी थी और तब हाहाकार मच गया था। हिंसा की इस नयी महाशक्‍ति को रोकना तब किसी भी ताकत के बूते की बात नहीं रह गयी थी।

और तब प्रयोग हुआ था अहिंसा का, प्रेम का, सत्याग्रह का। नीलकण्ठ महाकाली की राह में लेट गये थे। अन्धा उन्माद उन्हें भी कुचलता हुआ बढ़ सकता था, यदि शिव के सत्याग्रह में ताकत की थोड़ी सी भी हेकड़ी होती; महाशक्‍ति के प्रति वैमनस्य की जरा सी भी भावना अथवा अपनी किसी कमजोरी की थोड़ी सी भी हिचक होती। कथानक बतलाता है कि तब ताकतवर शिव की सी निरपेक्ष सापेक्षता ही तब शक्‍ति के उन्माद को शान्त कर सकी थी।

ताकत के खिलाफ, हिंसा के खिलाफ, उन्माद के खिलाफ; सामूहिक ताकत का प्रयोग स्थापित हिंसक प्रतीक का नाश भले ही कर दे किन्तु, अन्‍तत:, उससे भी बड़े एक नये हिंसक उन्माद के ताण्डव की ही राह खोलता है। इसके विपरीत सक्षम की अहिंसा हिंसक मनोवृत्ति को समाप्‍त करने की आधार-भूत सामाजिक आवश्यकता को पूरा करती है।

यही गांधी ने कहा था। यही हमारी सामाजिक-सांस्कृतिक धरोहर है। गांधी ने तो दरअसल संस्कृति की, आदमीयत की, नब्ज पर हाथ भर रखा था। एक ईमानदार वैद्य की तरह। तमाम स्वार्थों से परे, पूरी निस्पृहता से। और तब, प्रकृति के सामंजस्य में आदमीयत कैसे चिरकाल तक जीवित रह सकती है; इस बारे में हमें वे विचार सुझाये थे जिन्हें स्वार्थ में अन्‍धे होकर हम जान-बूझकर भुलाते जा रहे थे। शायद आज भी भुलाना ही चाहते हैं। और इसके लिए सारा दोष अपने सामाजिक अतीत पर, अपनी सांस्कृतिक विरासत पर, मढ़ रहे हैं ताकि स्वार्थों का हमारा मार्ग निष्कण्टक होता जाए।

(२ अक्टूबर २०१९)

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नये सिरे से लिखना होगा भारतीय संविधान http://www.jyotiprakash.me/2019/08/%e0%a4%a8%e0%a4%af%e0%a5%87-%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a5%87-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%96%e0%a4%a8%e0%a4%be-%e0%a4%b9%e0%a5%8b%e0%a4%97%e0%a4%be-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b0/ Thu, 29 Aug 2019 07:49:35 +0000 https://www.jyotiprakash.me/?p=12468

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भारतीय संविधान के लिखे, स्वीकार किये और लागू किये जाने की प्रक्रिया के वैधानिक रूप से खोट-पूर्ण होने को स्वीकारने और इस कारण से समूची प्रक्रिया को नये सिरे से पुन: पूरा करने से कोई ऐसा महा-प्रलय नहीं आने वाला है जो सम्प्रभु भारत राष्ट्र के भौतिक और / अथवा प्रशासनिक अस्तित्व को हल्की सी खरोंच तक लगा पाये।

‘भारतीय संविधान की दुहाई’ देश में आजकल फैशन हो चुका है। ‘फैशन’ इसलिये क्योंकि ऐसे व्यक्ति भी दिन-रात यही दुहाई देते मिल जाते हैं जो अपने हितों के सामने संविधान की मान-मर्यादा की होली जलाने से भी कोई परहेज नहीं करते हैं। वह ऐसा इसलिये करते हैं क्योंकि ऐसी दुहाई उन्हें उस धुन्धलके दायरे (ग्रे एरिया) जैसी वह सुविधा-जनक ढाल दे देती है जिसकी ओर इंगित कर वे ‘काले के सफेद’ और ‘सफेद के काले’ होने की तोड़-मरोड़ वाली अपनी मन-चाही समीक्षा दुनिया को परोस पाते हैं।

इसीलिये, उसके प्रति पूरी वैधानिक निष्ठा रखते हुए भी, देश के संविधान की ‘संवैधानिक शुचिता’ पर एक सर्वथा नयी बहस का आरम्भ आवश्यक हो गया है। यह बहस केवल इन दो बिन्दुओं पर केन्द्रित होनी चाहिये – (१) किसी भी राष्ट्र के संविधान की सर्व-मान्य ‘वैधानिक’ परिभाषा क्या है? और, (२) इस परिभाषा की कसौटी पर भारतीय संविधान कितना खरा ठहरता है? जहाँ तक परिभाषा का प्रश्न है, किसी भी सम्प्रभु प्रजातान्त्रिक राष्ट्र का वही ‘संविधान’ वैधानिक मान्यता रखता है जिसे उस राष्ट्र के आम नागरिकों द्वारा निर्वाचित बहुसंख्य प्रतिनिधित्व की सहमति / स्वीकृति के आधार पर लिखा, स्वीकारा और लागू किया गया हो।

स्पष्ट है कि स्वतन्त्र-सम्प्रभु भारतीय गणतन्त्र के संविधान की संवैधानिक शुचिता की धुरी इसी ज्वलन्त पहेली के समाधान पर आश्रित होगी कि, दुनिया भर में निर्विवाद रूप से मान्य, उपर्युक्त वैधानिक कसौटी क्या उसे यथार्थ में ही ‘भारतीय नागरिकों द्वारा निर्वाचित बहुसंख्य प्रतिनिधित्व की सहमति / स्वीकृति के आधार पर लिखा, स्वीकारा और लागू किया गया’ स्वीकारती है? ‘पहेली’ इसलिये कि आम भारतीयों की बात तो छोड़िये, कानून और न्याय के विभिन्न दायरों से जुड़े बड़े और नामचीन धुरन्धरों ने भी भारतीय संविधान के लिखे, स्वीकारे और लागू किये जाने से जुड़े जमीनी तथ्यों की इन बारीकियों को जानने और उनकी वैधानिक समीक्षा करने की आवश्यकता को कभी आवश्यक ही नहीं समझा। अपने-अपने कारणों से, सभी के लिये भारतीय संविधान एक सर्वथा वैध ‘संवैधानिक’ दस्तावेज है!

यहीं, यह समझ लेना आधारभूत रूप से महत्वपूर्ण होगा कि इस पहेली के दो पहलू हैं – (१) भारतीय संविधान को ‘सर्वथा वैध मानना’ और, (२) उसे ‘वैध ठहराना’। यह भी कि, इसके पीछे दोनों ही पक्षों की अपनी-अपनी गम्भीर व्यवहारिक विवशताएँ हैं।

सारी तथ्यात्मक विसंगतियों के बाद भी भारतीय संविधान को वैध ठहराने एक-जुट होने वालों के पास अघोषित निजी हितों और अव्यक्त राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं की अपनी-अपनी लम्बी सूचियाँ हैं। वे जानते हैं कि भारतीय संविधान का, वैधानिक रूप से, सर्वथा असंवैधानिक होना स्वीकार लिये जाने से उनके यह सारे स्वार्थ और क्षुद्र महत्वाकांक्षाएँ सदा के लिये रसातल पहुँच जायेंगी। इसके उलट, उसके लिखे, स्वीकारे और लागू किये जाने की समूची प्रक्रिया की सारी तथ्यात्मक विसंगतियों को जान और समझ लेने के बाद भी भारतीय संविधान को वैध ही मान लेने की बात करने वाले ऐसा केवल इसलिये कर रहे हैं क्योंकि वे इस एक काल्पनिक आशंका से आक्रान्त हैं कि ऐसा नहीं होने के परिणाम-स्वरूप अनिश्चय भरी अराजक परिस्थितियाँ निर्मित होंगी जो व्यापक रूप से देश / जन हित के सर्वथा विपरीत होंगी।

निहित-स्वार्थों और निजी महत्वाकांक्षियों के माथों पर पड़ने वाले बलों की किंचित् भी परवाह नहीं की जानी चाहिये। लेकिन, संविधान के असंवैधानिक ठहरा दिये जाने की कथित ‘व्यवहारिक’ परिणतियों से आशंकित होने वालों को विधानों और कानूनों से जुड़ी यह सचाई भी स्वीकारनी चाहिये कि कानून में ‘अपवाद का नियम’ अपने आप में सर्वथा वैधानिक माना गया है। यह एक ऐसा वैधानिक दर्शन है जो कहता है कि किसी परिस्थिति-विशेष में, केवल अपवाद-स्वरूप, परम्परा से हट कर भी नियम-विधान बनाये और स्वीकारे जा सकते हैं। किन्तु, ऐसे विधानों का अस्तित्व अपवाद को स्वीकारने को विवश करने वाली ऐसी परिस्थिति के बने रहने तक ही सीमित रहता है।

अर्थात्, अपवाद स्वीकारने को विवश करने वाली परिस्थिति से मुक्ति पा लेने के बाद, यथा-सम्भव शीघ्रता से, अपवाद-स्वरूप स्वीकारे गये ऐसे नियम-विधान के अस्तित्व को पारम्परिक रूप से स्वीकारे गये नये विधि-विधानों से बदल दिया जाना चाहिये। दूसरे शब्दों में, अपवाद-जनित परिस्थितियों में बने विधानों के अस्तित्व में रहने के कारण, संवैधानिक अर्थों में, जो कुछ घट चुका है; बदली हुई परिस्थिति में उसका अस्तित्व स्वयंमेव शून्यवत् नहीं हो जाता है। अपितु उस ‘घट चुके’ के अस्तित्व को उसी स्वरूप में स्वीकारते हुए भी, बदली हुई परिस्थिति में आवश्यक हो जाने पर, भविष्य के लिये नये सिरे से फिर गढ़ा जा सकता है। और, ऐसा किया जाना एक निरन्तरता को बनाये रखने वाले अर्थों में किया जाता है।

सरल अर्थ में इसे इस तरह समझा जा सकता है कि अपवाद के नियम के लागू रहने के दौरान लिये गये वैधानिक-प्रशासनिक निर्णय और उनके आधार पर निर्मित हुई जमीनी परिस्थितियाँ इस नियम के लुप्त होते ही अपने आप में स्वयं ही विलुप्त नहीं हो जाती हैं। किन्तु आवश्यकता पड़ने पर उनमें से प्रत्येक को चिन्हित करते हुए, नये वैधानिक-प्रशासनिक निर्णयों के आधार पर, वैधानिक रूप से बदला अवश्य जा सकता है।

स्वयं जवाहरलाल नेहरू ने भारत के स्वतन्त्र होने और / अथवा भारतीय संविधान के स्वीकृत / लागू होने से पहले, और स्वतन्त्र भारत के अस्तित्व में आने तथा संविधान के लागू हो जाने के बाद भी, यही आश्वासन भारतीयों को दिये थे।

अर्थात् भारतीय संविधान के लिखे, स्वीकार किये और लागू किये जाने की प्रक्रिया के वैधानिक रूप से खोट-पूर्ण होने को स्वीकारने और इस कारण से समूची प्रक्रिया को नये सिरे से पुन: पूरा करने से कोई ऐसा महा-प्रलय नहीं आने वाला है जो सम्प्रभु भारत राष्ट्र के भौतिक और / अथवा प्रशासनिक अस्तित्व को हल्की सी खरोंच तक लगा पाये।

इस बिन्दु पर लाख टके का केवल यही सवाल शेष रहता है कि क्या भारतीय संविधान एक वैध ‘संवैधानिक’ दस्तावेज नहीं है? और, इसका सटीक उत्तर केवल इतिहास के ये तथ्य ही दे सकते हैं जो इस दस्तावेज और उसके अस्तित्व में आने की समूची प्रक्रिया से सीधे तौर पर जुड़े हैं —

यों तो, घटनाओं और पात्रों की एक लम्बी सूची है किन्तु अंग्रेजी राज की गुलामी से मुक्ति की राजनैतिक, और प्रजातान्त्रिक भी, नींव लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के उस उद्घोष से रखी गयी थी जिसमें उन्होंने कहा था, “स्वतन्त्रता हमारा जन्म-सिद्ध अधिकार है”। १९२२, १९२८ और १९२९ में महात्मा गांधी, आम भारतवासियों व कांग्रेस द्वारा की जाने वाली “भारतीय संविधान की संरचना भारतवासियों का जन्म-सिद्ध अधिकार है” शैली की उद्घोषणाएँ यथार्थ में तिलक के इसी उद्घोष की तार्किक परिणतियाँ रही हैं। और, सैद्धान्तिक रूप से, जवाहरलाल नेहरू भी इसका मोटा प्रारूप १९२८ में भारतवासियों के समक्ष रख चुके थे। जवाहरलाल नेहरू के प्रस्ताव पर कांग्रेस ने पहली बार वयस्क मतदान के आधार पर संविधान सभा के गठन का प्रस्ताव १८ जून १९३४ को औपचारिक रूप से स्वीकृत किया था।

किन्तु, भारत की सत्ता सच्चे अर्थों में भारतवासियों के हाथों में सौंपने से बचने के लिये ब्रिटिश शासकों ने यह शर्त थोप दी कि वे स्वतन्त्रता की घोषणा तभी करेंगे जब, लगभग असम्भव सी एक सीमित समय-सीमा के भीतर, भारतवासी अपना एक संविधान स्वयं बना लें। और क्योंकि अंग्रेजों से स्वतन्त्रता-प्राप्ति तत्कालीन समय की पहली प्राथमिकता थी, संविधान सभा का गठन आम भारतवासियों द्वारा किये गये मतदान से निर्वाचित हुए प्रतिनिधियों के स्थान पर बिदाई की कगार पर खड़े अंग्रेज शासकों की रुचि तथा शर्तों के अनुकूल गठित हुई प्रान्तीय विधान सभाओं के सदस्यों द्वारा हुए नामांकित हुए प्रतिनिधियों के माध्यम से ही कराना पड़ा। और, उसमें ऐसे व्यक्तियों को भी स्थान दिया गया जो भारत स्थित रियासतों की विधान सभाओं में राजाओं द्वारा ‘सदस्य’ के रूप में नियुक्त सदस्यों द्वारा नामांकित हुए थे।

यहाँ यह आधारभूत जानकारी रखना आवश्यक है कि ब्रिटिश भारत के प्रान्तों और देशी रियासतों की यह विधान सभाएँ यहाँ के निवासी भारतीयों का वास्तविक प्रतिनिधित्व नहीं करती थीं। इसके उलट, इन प्रान्तीय विधान सभाओं के निर्वाचन हेतु (i) ब्रिटिश भारत की मात्र १० प्रतिशत्‌ चुनिन्दा जनसंख्या को ही वोट करने का अधिकार दिया गया था, (ii) इसमें से भी मात्र एक करोड़़ लोगों द्वारा ही मताधिकार का प्रयोग किया गया था, (iii) यह संख्या तत्कालीन भारत की कुल जनसंख्या का मात्र 2.5 प्रतिशत्‌ ही थी, (iv) यही नहीं, यह ‘निर्वाचन’ धर्म के संकीर्ण आधार पर कराया गया था, (v) विधान सभा सदस्यों की संख्या का बँटवारा भी हिन्दू, मुसलमान, सिख, ईसाई इत्यादि धार्मिक आधार पर निर्धारित किया गया था, (vi) किन्तु, सीटों के ऐसे धार्मिक बँटवारे में भी धार्मिक आधार पर जनसंख्या के वास्तविक अनुपातों के स्थान पर अंग्रेजों की अनुचित मन-मर्जी ही थोपी गयी थी, (vii) साथ ही, निर्वाचन में हिन्दू को मात्र हिन्दू को तथा मुस्लिम को मात्र मुस्लिम को मत देने का अधिकार दिया गया था।

जहाँ ऐसी साम्प्रदायिक संविधान सभा का गठन इस प्रधान उद्देश्य की पूर्ति के लिये किया गया था कि सम्पूर्ण भारत हेतु एक ही संविधान की रचना तो की जाये वहीं अंग्रेजों द्वारा डाले गये दबाव के पालन में यह सुनिश्चित भी किया गया था कि इस संविधान में अलग से विशेष सुविधाएँ एवं अधिकार प्रदान कर मुसलमानों को प्रसन्न किया जाये ताकि वे (i) हिन्दू-मुस्लिम भाई-चारे को स्वीकार करें, और (ii) भारत का विभाजन कर मुसलमानों के लिये पृथक राष्ट्र ‘पाकिस्तान’ के गठन की अपनी माँग छोड़ दें। इसके लिये संविधान के प्रारूप को, अलग से, मुसलमान-हितैषी बनाया गया।

जबकि इसके उलट, संविधान के ऐसे प्रारूप के स्वीकारे जाने के पश्चात्‌ किन्तु इसके पारित होने से पूर्व ही, भारत के विभाजित हो जाने और पाकिस्तान के अस्तित्व में आने से इन लक्ष्यों की पूर्ति की आवश्यकता सिरे से समाप्त हो गई। फिर भी स्व. नेहरू एवं अन्य मुस्लिम-प्रेमी नेताओं द्वारा संविधान के विशेषत: मुसलमान-हितैषी स्वरूप को यथा-वत्‌ ही रखा गया। यद्यपि इस पूरी प्रक्रिया के बीच, और उसके बाद भी, जवाहरलाल नेहरू द्वारा आम भारतवासी को लगातार इस बात के लिये आश्वस्त भी किया जाता रहा कि भविष्य में जब हमारी स्वतन्त्रता प्रचुर-पर्याप्त-परिपक्व हो जायेगी; तब वयस्क मतदान के आधार पर एक नयी संविधान सभा का चुनाव करवा कर देश के लिये एक नया संविधान फिर से लिखा जायेगा।

कांग्रेस के मेरठ सम्मेलन को सम्बोधित करते हुए २१ नवम्बर १९४६ को नेहरू ने इसी मुस्लिम-हितैषी संविधान को स्वीकारने पर जोर देते हुए सार्वजनिक रूप से कहा था कि जिन्ना ने संविधान सभा की कार्यवाही को अनिश्चित काल के लिये स्थगित करवाने का प्रयास किया था। उनका कहना था कि वे इस संविधान सभा के प्रति मोहित नहीं हैं किन्तु ‘हमने इसे स्वीकार किया है और अपने अधिकतम्‌ लाभ के लिये इसका उपयोग करना चाहिये।’ देश की तत्कालीन मन:स्थिति की नब्ज को समझते हुए तब अपने कथन में बड़े स्पष्ट शब्दों में आगे उन्होंने यह भी जोड़ा था कि ‘यह कोई अन्तिम संविधान सभा नहीं होने वाली है।’

दूसरे शब्दों में, तत्कालीन राजनैतिक परिस्थितियों की विवशता में, केवल अपवाद के नियम के आधार पर ही, आज का संविधान स्वीकृत और लागू हुआ था। इसी ऐतिहासिक सचाई में प्राकृतिक न्याय का यह बन्धनकारी दायित्व भी निहित है कि अपवाद-जन्य परिस्थिति के लिये केवल तात्कालिकता के रूप में स्वीकारे गये किसी भी अस्वाभाविक विकल्प को, ‘पत्थर की लकीर’ ठहराते हुए, अनन्त काल के लिये थोपे नहीं रखा जा सकता है।

वैसे भी, संविधान के लागू हो जाने के दो वर्षों के भीतर ही संविधान में पहले संशोधन के प्रस्ताव पर संसद में दिये अपने भाषण में तत्कालीन प्रधानमन्त्री नेहरू ने, अपनी बातें दोहराते हुए, २ जून १९५१ को कहा था कि जो संविधान अपरिवर्तित और अडिग रहता है वह चाहे जितना भी अच्छा क्यों ना हो, एक संविधान के अर्थ में, अपनी उपयोगिता खो चुका होता है। तब नेहरू ने सर्वथा बेलाग शैली में आगे यह भी जोड़ा था कि भारतीय संविधान बुढ़ा चुका था और लगातार अपनी मृत्यु को प्राप्त हो रहा था।

स्वाभाविक है, भारतीय संविधान की संवैधानिकता पर उठाये गये सवाल के हल को समझने के लिये इस बिन्दु पर यह जान और समझ लेना भी अनिवार्य है कि ‘अपवाद-जन्य परिस्थिति के लिये केवल तात्कालिकता के रूप में स्वीकारे गये अस्वाभाविक विकल्प’ का तात्पर्य क्या है? इतिहास-प्रमाणित तथ्य दर्शाते हैं कि जहाँ स्वतन्त्रता की घोषणा के लिये असम्भव सी एक सीमित समय-सीमा के भीतर अपना स्वयं का एक संविधान तैयार कर लेने की ब्रिटिश शासकों द्वारा थोपी गयी शर्त ‘अपवाद-जनित परिस्थिति’ थी; वहीं सारे वयस्क भारत-वासियों के नैसर्गिक अधिकार को दर-किनार कर उनके बीच से केवल २.५% अपने चहेतों द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधियों के पसन्दीदा व्यक्तियों के गुट को संविधान सभा घोषित करवाना ‘अस्वाभविक विकल्प’ था।

संविधान की परिभाषा को स्पष्ट करते हुए आरम्भ में ही कहा जा चुका है कि किसी भी सम्प्रभु प्रजातान्त्रिक राष्ट्र का वही ‘संविधान’ वैधानिक मान्यता रखता है जिसे उस राष्ट्र के आम नागरिकों द्वारा निर्वाचित बहुसंख्य प्रतिनिधित्व की सहमति / स्वीकृति के आधार पर लिखा, स्वीकारा और लागू किया गया हो। जबकि, ऐतिहासिक साक्ष्य स्थापित करते हैं कि भारतीय संविधान के अस्तित्व में भारत के स्वतन्त्र नागरिकों का ऐसा कोई योगदान नहीं रहा था।

इतना ही नहीं, संविधान सभा के सदस्यों ने भारत राष्ट्र नहीं अपितु अंग्रेज सम्राट और ब्रिटिश संसद्‌ के प्रति वफादारी की शपथ ली थी तथा उन्हीं की मंशा को ध्यान में रखते हुए अंग्रेजों द्वारा पारित भारत शासन अधिनियम १९३५ के अधिकांश प्रावधानों को संविधान में सम्मिलित किया था।

यद्यपि, इन ऐतिहासिक तथ्यों / आधारों के अतिरिक्त वैधानिक रूप से भी भारतीय संविधान के असंवैधानिक होने को बिल्कुल सहज रूप से इस आधार पर प्रमाणित किया जा सकता है कि भारतीय संविधान न तो स्वतन्त्र भारत के बहुसंख्य नागरिकों की अपेक्षाओं की पूर्ति करता है और ना ही यह संविधान की सर्वथा स्वीकृत परिभाषा पर खरा ठहरता है। फिर भी, केवल वैधानिक दाँव-पेंचों को ही अस्तित्व का आखिरी प्रामाणिक आधार मानने वाली बिरादरी यह सवाल उठा सकती है कि विधि की पोथियों में इन प्रमाणों को कितना बल प्राप्त है? उनके ऐसे सारे सवालों को ठण्डा करने के लिये जहाँ एक ओर ऐसे व्यक्तियों को भारतीय संविधान की उस प्रस्तावना को, अलग से रेखांकित कर, पढ़ाना होगा जिसका आरम्भ ही ‘हम भारतीय’ (वी द पीपुल ऑफ़ इण्डिया) से होता है; वहीं दूसरी ओर उन्हें भारतीय विधिक इतिहास के इस एक तथ्य का भी स्मरण कराना होगा कि भारतीय संविधान की प्रस्तावना को ले कर सर्वोच्च न्यायालय की संवैधानिक पीठों द्वारा समय-समय पर ऐसे मार्ग-दर्शक निर्णय पारित किये गये हैं जिनमें, निर्विवाद रूप से, यह स्थापित किया जा चुका है कि भारतीय संविधान की आत्मा उसकी प्रस्तावना में स्थित है।

उदाहरण के लिये, एस आर चौधरी वि० पंजाब राज्य मामले में देश के सर्वोच्च न्यायालय ने पारित किया है कि प्रस्तावना उस स्रोत की ओर इंगित करती है जहाँ से संविधान आता है। जबकि केशवानन्द भारती वि० केरल राज्य मामले में उसने ठहराया है कि किसी सामान्य प्रस्तावना के विपरीत भारतीय संविधान की प्रस्तावना को उसके अंग के रूप में परखा जाना चाहिये। माधवराव सिन्धिया वि० केन्द्र मामले में न्यायालय ने घोषित किया है कि प्रस्तावना संविधान का अविभाज्य अंग है। और, एस आर चौधरी वि० पंजाब राज्य मामले में ही सर्वोच्च न्यायालय ने यहाँ तक कहा है कि ‘हम भारतीय’ (वी द पीपुल ऑफ़ इण्डिया) शब्द भारत की गणतान्त्रिक व प्रजातान्त्रिक नीति पर जोर डालते हैं और दर्शाते हैं कि इसकी वास्तविक शक्ति नागरिकों में ही निहित है।

भारतीय संविधान के लिखे, स्वीकृत किये और लागू किये जाने के तथ्य की यह सचाई सर्वथा निर्विवाद है कि उस समूची प्रक्रिया के किसी भी अंश में, संविधान की परिभाषा के सर्व-स्वीकृत दायरों में, ‘हम भारतीयों’ से न तो कोई परामर्श लिया गया और न ही ‘हम भारतीयों’ को इस प्रक्रिया में शामिल किये गये किसी भी व्यक्ति के चयन की प्रक्रिया में भाग लेने की कोई छूट दी गयी। स्पष्ट है कि यथार्थ में तो ‘हम भारतीयों’ को संविधान का स्रोत बनाया ही नहीं गया था।

वर्ष १९४६ में विधान सभा के नामांकित सदस्यों द्वारा संविधान सभा का गठन, केवल और केवल, अविभाजित भारत के संविधान निर्माण हेतु ही किया गया था। किन्तु, मुस्लिम लीग एवं मोहम्मद अली जिन्ना द्वारा रखी गयी पृथक मुस्लिम राष्ट्र की माँग की स्वीकृति और उसकी पूर्ति के लिये पाकिस्तान का गठन कर दिये जाने से अविभाजित भारत के लिये बनाये गये संविधान के प्रारूप की यह मूल भावना विलोपित हो चुकी थी। फिर भी, विभाजित भारत के लिये उसी संविधान को स्वीकार कर शेष बचे स्वतन्त्र भारत के गैर मुस्लिम / हिन्दू नागरिकों की भावनाओं का अपमान तो किया ही गया उनके नैसर्गिक अधिकारों का हनन भी किया गया। यही नहीं, इस विभाजन के बाद भी शेष बच रहे भारत के मुसलमानों के लिये अल्पसंख्यक का दर्जा, अधिकाधिक अनाधिकृत सुविधाएँ तथा धार्मिक अधिकार आदि वह सभी विशेष अधिकार यथावत् ही जारी रखे गये जो उन्हें भारत के विभाजन को रोकने की आशा में, अनुचित रूप से, दिये गये थे।

जाहिर है, भारतीय संविधान का यह स्वरूप इसी एकांगी आधार पर बनाया गया था कि भारत के अविभाजित रूप को स्थिर रखने के लिये ऐसा करना अनिवार्य होगा! दूसरे शब्दों में, सब कुछ केवल हिन्दू-मुस्लिम एकता को कायम रखने के नाम पर किया गया था। किन्तु, यह ‘हिन्दू-मुस्लिम एकता’ दिवा-स्वप्न ही प्रमाणित हुई और भारत मुस्लिम तथा हिन्दू राष्ट्रों में विभाजित हो गया। इसके बाद भी स्व. नेहरू एवं अन्य मुस्लिम प्रेमी नेताओं द्वारा संविधान के विशेषत: मुसलमान-हितैषी स्वरूप को यथा-वत्‌ रखा गया। भारत को ‘हिन्दू राष्ट्र’ अथवा कम से कम ‘धर्म-विशेष के प्रति किसी भी रुझान से मुक्त राष्ट्र’ घोषित नहीं किया जाना भारत के विभाजन की मूल दुर्भावना और इस विभाजन के पीछे रहे व्यापक सामाजिक-राजनैतिक तथ्यों से सीख लेने के विपरीत था। इस बिन्दु पर महात्मा गांधी द्वारा १९४४ में की गयी उस टिप्पणी का उल्लेख नहीं करना इतिहास के तथ्यों से आपराधिक छेड़-छाड़ करना होगा जिसमें उन्होंने कहा था, “इतिहास में मुझे ऐसी एक भी घटना नहीं मिली है जिसमें धर्मान्तरण करने वालों और उनके वंशजों ने अपने मूल राष्ट्र से अलग स्वयं का एक स्वतन्त्र राष्ट्र होने का दावा किया हो।”

सभी निवासियों के लिये एक ही संहिता का निर्माण और धार्मिक आधार पर किसी भी तुष्टि-परक रुझान से मुक्ति की राष्ट्रीय अनिवार्यता होते हुए भी, केवल धर्म के नाम पर अपने लिये पाकिस्तान बनवा चुके उन मुसलमानों को ही भारत में अल्प-संख्यक घोषित कर पक्षपात्‌-पूर्ण सहायता का अधिकार दिया गया जो संख्या में सिख, जैन, बौद्ध इत्यादि से पर्याप्त अधिक थे। यह कृत्य विघटन के बाद स्वतन्त्रत हो रहे देश का निर्माण अपने आप में एक नये विघटन की नींव पर करने के समान था।

और क्योंकि अब, समस्त भारतवासी वास्तविक अर्थ में एक पूर्ण स्वतन्त्र व परिपक्व राष्ट्र के नागरिक होने के साथ ही ऐसी किसी परिस्थिति से भी मुक्त हो चुके हैं जो सहज, स्वाभाविक और प्राकृतिक आचरणों व नियमों को ताक पर रखते हुए महज अपवाद से आक्रान्त नियमों-कानूनों का पालन करते रहने को विवश करती हो; वयस्क मतदान के आधार पर एक नयी संविधान सभा का चुनाव करवाना और उसके माध्यम से एक नया संविधान लिखवाना आज की पहली प्राथमिकता बन चुका है।
(२९ अगस्त २०१९)

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म० प्र० राज्य सूचना आयोग की खुली पोल http://www.jyotiprakash.me/2016/07/mp-rajya-suchana-ayog-ki-khuli-pol/ Tue, 19 Jul 2016 12:06:40 +0000 https://www.jyotiprakash.me/?p=3023

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म० प्र० राज्य सूचना आयोग आयोग पर बड़ा सवाल उठा है। गैर सरकारी सामाजिक संगठन सजग ने मुख्य सूचना आयुक्त से ही पूछ लिया है कि क्या आयोग स्वयं को देश के समस्त नियमों, कायदों, कानूनों, स्थापित व्यवस्थाओं और मर्यादाओं से ऊपर मानता है? दोषी लोक सूचना अधिकारियों को अनैतिक तथा अनुचित रूप से संरक्षण …

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Sarokar

म० प्र० राज्य सूचना आयोग आयोग पर बड़ा सवाल उठा है। गैर सरकारी सामाजिक संगठन सजग ने मुख्य सूचना आयुक्त से ही पूछ लिया है कि क्या आयोग स्वयं को देश के समस्त नियमों, कायदों, कानूनों, स्थापित व्यवस्थाओं और मर्यादाओं से ऊपर मानता है?

दोषी लोक सूचना अधिकारियों को अनैतिक तथा अनुचित रूप से संरक्षण देने के गम्भीर आरोप म० प्र० राज्य सूचना आयोग पर लगते रहे हैं। लेकिन अब उसके मुख्य आयुक्त की मंशा के औचित्य पर भी बड़ा गम्भीर सवाल खड़ा किया गया है। यह सवाल गैर सरकारी सामाजिक संगठन की ओर से आयोग के मुख्य आयुक्त श्री के० डी० खान को सम्बोधित कर की गयी एक लिखित शिकायत से सामने आया है।

सामाजिक और न्यायायिक सन्दर्भों में सक्रिय स्वयंसेवी संगठन सजग ने दिनांक १२ अप्रैल २०१४ को सूचना का अधिकार अधिनियम, २००५ के तहत्‌ एक आवेदन लगा कर म० प्र० राज्य निर्वाचन आयोग से यह जानकारी माँगी थी कि सर्वोच्च न्यायालय ने परमादेश याचिका (सिविल) क्र० १६१/२००४ में दिनांक २७ सितम्बर २०१३ को पारित अपने आदेश में चुनाव आयोग को जो यह निर्देश दिया था कि वह नोटा के अधिकार के बारे में देश के आम जन को शिक्षित करने की जवाब-दारी पूरी करे, उस निर्देश के पालन के बारे में कुल क्या कदम उठाये गये थे? किन्तु निर्वाचन आयोग ने उसे कोई जानकारी उपलब्ध नहीं करायी जिसके कारण अन्तत: सूचना आयोग में द्वितीय अपील लगानी पड़ी थी।

सजग के अध्यक्ष डॉ० ज्योति प्रकाश कहना है कि नोटा के बारे में जन-मानस को शिक्षित करने का सर्वोच्च न्यायालय का निर्देश प्रजातान्त्रिक निर्वाचन प्रक्रिया में मील का पत्थर है किन्तु, निर्वाचन आयोग ने इस निर्देश के पालन के प्रति घोर चुप्पी साधी हुई है। यही नहीं, उसका भरसक प्रयास है कि सर्वोच्च न्यायालय की खुली अवमानना वाली उसकी इतनी गम्भीर हुकुम-उदूली के तथ्य सार्वजनिक नहीं होने पायें। यही कारण है कि प्रकरण की अपीली सुनवाई की प्रक्रिया में म० प्र० सूचना आयोग में भी ढेरों अनैतिक खोट वाले सोच के संकेत मिले हैं। यही नहीं, इन खोटों को आयोग के वरिष्ठों का प्रत्यक्ष-परोक्ष संरक्षण तक मिलने की सम्भावना है।

संक्षेप में मामला इस प्रकार है कि द्वितीय अपील की सुनवाई की २२ मार्च २०१६ की पेशी के बाद सजग की ओर से सूचना आयोग में आवेदन लगा कर कुछ दस्तावेजों की प्रमाणित नकलों की माँग की गयी थी। इन नकलों में मुख्य सूचना आयुक्त द्वारा उस दिन लिखी गयी प्रकरण की ऑर्डरशीट की नकल भी शामिल थी। किन्तु, आयोग की ओर से पत्र लिख कर माँगी गयी नकलें देने से यह कहते हुए कि मना कर दिया गया कि मुख्य आयुक्त द्वारा लिखी गयी कोई ऑर्डरशीट प्रकरण की नस्ती में है ही नहीं! अन्य नकलों के बारे में लिख दिया गया कि आयोग को समझ में ही नहीं आया है कि आवेदक ने किन दस्तावेजों की नकलें चाही थीं?

Complaint filed with Chief Information Commissionerक्योंकि, नकलों के आवेदन पर आयोग से मिला यह जवाब चौंकाने वाला था इसलिए डॉ० ज्योति प्रकाश ने १८ अप्रैल २०१६ को मुख्य सूचना आयुक्त श्री के० डी० खान से मुलाकात की और उस पत्र को लिखने वाले आयोग के अधिकारी की शिकायत की। उन्होंने यह सीधा सवाल भी किया कि क्या आयोग देश के समस्त नियमों, कायदों, कानूनों, स्थापित व्यवस्थाओं और मर्यादाओं से ऊपर है? मुख्य सूचना आयुक्त से हुई इस मौखिक शिकायत के बाद आयोग के उसी अधिकारी ने, उसी पुराने आवेदन के आधार पर, कुछ नकलें भेज दीं। भेजी गयी नकलें पर्याप्त थी अथवा नहीं, या फिर सही थीं अथवा नहीं; इस विवाद से ऊपर बड़ी बात यह रही कि दी गयी नकलों में मुख्य सूचना आयुक्त द्वारा, पुरानी तारीख में ही लिखी गयी दर्शाती, आदेशिका की वह नकल भी शामिल थी जिसके फाइल में मौजूद नहीं होने की सूचना पहले भेजी गयी थी!

किन्तु, मामले की गम्भीरता इतने पर ही समाप्त नहीं हो जाती है। इसके उलट, वह और भी बढ़ जाती है। क्योंकि, आयोग या उसके मुख्य सूचना आयुक्त द्वारा अपने उस अधिकारी के खिलाफ न तो किसी प्रकार की कोई कार्यवाही आरम्भ की गयी थी और ना ही इतने बड़े घपले की कोई जाँच ही शुरू की गयी थी। डॉ० ज्योति प्रकाश के अनुसार इस स्थिति का अत्यन्त दूर-गामी और बड़ा गम्भीर यह अर्थ था कि सारा घपला न केवल चुनाव आयोग को संरक्षित करने बल्कि सूचना आयोग द्वारा उसे दिये जा रहे इस संरक्षण की पोल को छिपाये रखने के किसी सम्भावित षडयन्त्र से भी प्रेरित था। ऐसा समझ में आता है कि आयोग में पदस्थ अधिकारी एक-दूसरे को संरक्षण देने के लिए अनैतिकता और अवैधानिकता की किसी भी सीमा को लाँघने को तत्पर हैं।

सजग ने आयोग के मुख्य आयुक्त श्री के० डी० खान को सम्बोधित कर जो लिखित शिकायत की है उसमें सारे षडयन्त्र की जाँच की माँग की गयी है। इस शिकायत में, उनके समक्ष तथ्यों के साथ की गयी मामले की मौखिक शिकायत के बावजूद मुख्य आयुक्त द्वारा बरती गयी चुप्पी पर आश्चर्य भी व्यक्त किया गया है। सजग की एक माँग यह भी है कि जाँच के परिणाम को सार्वजनिक किया जाये।

(www.sajag-india.com; १९ जुलाई २०१६ से साभार)

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म० प्र० राज्य सूचना आयोग का काला सच http://www.jyotiprakash.me/2016/05/mp-rajya-suchana-ayog-ka-kala-sach/ Sat, 07 May 2016 10:51:02 +0000 https://www.jyotiprakash.me/?p=3001

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जो सूचना आयोग सरकारी तन्त्र में सम्पूर्ण पार-दर्शिता स्थापित करने की इकलौती जिम्मेदारी के लिए गठित हुआ है, वह स्वयं न केवल घोर अ-पारदर्शी है अपितु अ-पारदर्शिता को बढ़ावा देने के नित नये हथ-कण्डे खोजने में भी जुटा है। आयोग ने तो अधिनियम का दुरुपयोग करना तक सीख लिया है। म० प्र० राज्य सूचना आयोग …

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जो सूचना आयोग सरकारी तन्त्र में सम्पूर्ण पार-दर्शिता स्थापित करने की इकलौती जिम्मेदारी के लिए गठित हुआ है, वह स्वयं न केवल घोर अ-पारदर्शी है अपितु अ-पारदर्शिता को बढ़ावा देने के नित नये हथ-कण्डे खोजने में भी जुटा है। आयोग ने तो अधिनियम का दुरुपयोग करना तक सीख लिया है।

म० प्र० राज्य सूचना आयोग अपने कार्यालय पहुँचे किसी भी सामान्य व्यक्ति को किसी प्रकरण से सम्बन्धित प्रमाणित प्रति-लिपियाँ नहीं देता। प्रमाणित प्रतियों के अभाव में कोई भी पक्ष-कार अपने प्रकरण को उच्च न्यायालय नहीं ले जा पाता। ऐसे में, यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या आयोग अपनी कार्यवाही से असन्तुष्ट पक्ष-कार के न्याय-प्राप्ति के अधिकार को बाधित करने के लिए ऐसा करता है?

ऐसे ही एक प्रकरण में जब सामाजिक सरोकारों वाली संस्था ‘सजग’ ने मुख्य सूचना आयुक्त श्री के० डी० खान से मुलाकात कर अपनी शिकायत उनके सामने रखी तो यह सच सामने आया। श्री खान ने बतलाया कि आयोग में प्रमाणित प्रति-लिपियाँ प्रदान करने की कोई परिपाटी नहीं है। इस पर जब उनसे कहा गया कि प्रमाणित प्रति-लिपियों के अभाव में कोई उच्च न्यायालय से न्याय की अपील कैसे कर पायेगा तो उनके पास ‘परिपाटी के नहीं होने’ वाली उक्त बात कहने के अलावा कोई अन्य जवाब नहीं था।

हुआ यह कि सामाजिक संगठन सोशियल एण्ड जुडीशियल एक्शन ग्रुप (सजग)  की ओर से उसके अध्यक्ष डॉ० ज्योति प्रकाश ने दिनांक २९ मार्च २०१६ को एक आवेदन आयोग कार्यालय में लगाया और संगठन के एक द्वितीय अपीली प्रकरण की नस्ती से दिनांक २२ मार्च २०१६ की सुनवाई और उससे पूर्व के कुछ दस्तावेजों की प्रमाणित प्रतिलिपियों को देने का निवेदन किया। यही नहीं, आयोग की चारित्रिक धाँधलियों से परिचित होने से उन्होंने, केवल सावधानी के रूप में, आवेदन के साथ ही पचास रुपये के मूल्य का एक पोस्टल ऑर्डर भी संलग्न कर दिया जिससे ‘समय कमाने’ और ‘प्रतिलिपियाँ भेजने में आना-कानी करने’ जैसा कोई आम हथ-कण्डा आयोग के हाथों में नहीं बचे। आवेदन से बिल्कुल स्पष्ट होता है कि आवेदक को क्या चाहिए था और यह सब उसे किस आवश्यकता तथा अधिकार के अन्तर्गत्‌ चाहिए था।

अपने प्रकरण से सम्बन्धित सभी मूल दस्तावेजों की प्रमाणित प्रतिलिपियों की स-शुल्क नकल पाना किसी भी पक्ष-कार का ऐसा वैधानिक अधिकार है जिसको ठुकराने का अधिकार किसी को भी प्राप्त नहीं है। शर्त केवल इतनी होती है कि वांछित नकलें विधानत: देय हों। यह तथ्य न्यायिक तथा अर्ध-न्यायिक प्रक्रिया से प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष अर्थ में जुड़े सभी संस्थानों का प्रत्येक जिम्मेदार अधिकारी जानता है। अति-विशिष्ट होते हुए भी सूचना का अधिकार अधिनियम, २००५ भी अपने आप में सूचना आयोगों को ऐसा कोई अधिकार नहीं देता है कि, अपवाद-स्वरूप ही सही, वह किसी पक्ष-कार को उसके इस वैधानिक अधिकार से वंचित करने की कोई छूट ले सके। यह तथ्य म० प्र० राज्य सूचना आयोग भली-भाँति जानता है। फिर भी क्योंकि, उसे ही बेहतर ज्ञात किन्हीं कारणों से, वांछित दस्तावेजों की प्रमाणित प्रतिलिपियों को देने में उसकी अरुचि थी और इसलिए भी कि वांछित प्रमाणित प्रतिलिपियाँ देने से आयोग को आगे पर्याप्त कानूनी असुविधाएँ होने वाली थीं; आयोग ने स्वेच्छाचारिता दिखलाते हुए सारी स्थापित वैधानिक प्रक्रियाओं को सूली पर टाँग देना श्रेयस्कर माना। और आवेदक को उसके कानूनी अधिकार से वंचित रखा।

Application dated 29 March 2016 for supply of Certified Copiesबाद की परिस्थितियों से उजागर हुआ कि अपनी इस अरुचि या कहिये कि बदनीयती को पूरा करने के लिए आयोग के जिम्मेदार अधिकारियों ने एक अभूत-पूर्व हथ-कण्डा अपनाया। इसके लिए मोर्चा सम्हालने की जिम्मेदारी आयोग के लोक सूचना अधिकारी संजीव पाण्डेय को सौंपी गयी जिन्होंने अपने समस्त बुद्धि-कौशल का प्रयोग करते हुए स्पष्ट रूप से ‘प्रमाणित प्रतिलिपियों’ के आवेदन को ‘सूचना-प्रदाय’ के आवेदन में बदल डाला। वह भी तब जबकि इस आवेदन के साथ आरटीआई के अन्तर्गत्‌ आवश्यक रूप से जमा किया जाने वाला दस रुपयों का विशिष्ट आवेदन शुल्क जमा ही नहीं किया गया था! आयोग के इस स्वनाम-धन्य अधिकारी ने अपने आपको लाल फीता-शाही का मँजा हुआ खिलाड़ी सिद्ध करने में कोई कसर नहीं छोड़ी और, उसके शाश्वत्‌ वैधानिक अधिकार पर टँगड़ी मारते हुए दिनांक ११ अप्रैल २०१६ को आवेदक को पत्र लिख कर सूचित किया —

 

“बिन्दु क्रमांक ०१ के सम्बन्ध में प्राप्त नस्ती अनुसार दिनांक २२/०३/२०१६ के उपरान्त पीठासीन आयुक्त महोदय द्वारा लिखी गयी आदेशिका उपलब्ध न होने से प्रदान किया जाना सम्भव नहीं हो पा रहा है; और

 

बिन्दु क्र० ०२ में उल्लेखित निवेदनों की विशिष्टियाँ स्पष्ट न होने से आवेदन के बिन्दु क्र० ०२ एवं ०३ के सम्बन्ध में अन्तिम आदेश एवं दस्तावेजों की नकल उपलब्ध कराना सम्भव नहीं हो पा रहा है।”

उक्त पत्र को पढ़ने से, बिना किसी संशय के, समझ में आ जाता है कि आयोग की यह स्पष्ट नीयत थी कि प्रमाणित प्रतिलिपियों के निवेदन को सूचना-प्रदाय के आवेदन में बदल कर दस्तावेजी नकलों को देने की बाध्यता को सालों-साल के लिए लटका दिया जाये ताकि, आयोग के दोष-पूर्ण निर्णय को न्यायालयीन चुनौती मिलने की सम्भावना को तब तक के लिए लटकाये रखा जा सके जब तक कि आरटीआई से जानकारी पाने से जुड़ी द्वितीय अपीली निराकरण तक की पूरी प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाये। समूचे घटना-क्रम और इसके पीछे छिपी आयोग की कलुषित मानसिकता से आवेदक चौंका अवश्य लेकिन उक्त पत्र के मिलने के अगले ही दिन उसने एसएमएस से आयोग के मुख्य सूचना आयुक्त श्री के० डी० खान को सजग की ओर से एक सन्देश भेजा जिसका शाब्दिक पाठ था :-

 

“यह एक गम्भीर सवाल लम्बे समय से मुझे कुरेद रहा है

 

 

क्या म० प्र० राज्य सूचना आयोग देश के समस्त नियमों, कायदों, कानूनों, स्थापित व्यवस्थाओं और मर्यादाओं से ऊपर है?

 

 

क्या मेरी इस चिन्ता का समाधान करने के लिए अपने कीमती समय में से कुछ मिनिट दे कर उपकृत करेंगे?

 

 

अपनी सुविधा का समय सूचित करें।

 

उपर्युक्त सन्देश के प्रत्युत्तर में मुख्य सूचना आयुक्त ने सन्देश भेज कर १८ अप्रैल २०१६ को मिलने बुला लिया और ‘सजग’ की ओर से डॉ० ज्योति प्रकाश, ललित श्रीवास्तव तथा अजय गौड़ मुख्य सूचना आयुक्त से उनके कक्ष में मिले। इस मुलाकात में उन्होंने मुख्य सूचना आयुक्त से जब यह प्रश्न उठाया कि आयोग के किसी निर्णय से असन्‍तुष्ट रहने पर किसी पक्ष-कार के पास कोई वैधानिक अधिकार शेष रहता भी है या नहीं तब उन्होंने बतलाया कि असन्‍तुष्ट पक्ष-कार के पास सम्बन्धित उच्च न्यायालय में परमादेश याचिका (रिट पिटीशन) दायर करने के रूप में आयोग के निर्णय को चुनौती देने का एक वैधानिक अधिकार सदा ही उपलब्ध रहता है। यह पूछने पर कि अपने इस अधिकार के प्रयोग लिए आवश्यक दस्तावेज उसे कैसे प्राप्त हो सकेंगे, उन्होंने स्वीकार किया कि असन्तुष्ट पक्ष-कार को आयोग से समस्त आवश्यक दस्तावेजों की प्रमाणित प्रति-लिपियाँ प्राप्त करना होंगी। तब ‘सजग’ की ओर से सत्यापित प्रति-लिपियों की माँग के लिए २९ मार्च २०१६ को आयोग के समक्ष लगाये गये निवेदन की छाया प्रति-लिपि मुख्य सूचना आयुक्त को दी गयी और पूछा गया कि क्या वे उक्त आवेदन में किसी प्रकार का ऐसा कोई दोष, कमी या वैधानिक त्रुटि देख पा रहे हैं जिसके आधार पर आवेदक को प्रमाणित प्रति-लिपि से वंचित किया जा सके? आवेदन को अच्छी तरह से पढ़ कर उन्होंने दो बातें कहीं — पहली यह कि वह आवेदन पूरी तरह से कानून-सम्मत था; और दूसरी यह कि उस आवेदन के माध्यम से माँगी गयी समस्त प्रतिलिपियाँ देने में आयोग को कोई आपत्ति नहीं होगी।

उक्त स्वीकारोक्तियों को सुन कर आयोग के सूचना अधिकारी द्वारा ११ अप्रैल २०१६ को उसे लिखे गये उस पत्र की प्रति-लिपि आयोग के मुखिया को दी गयी जिसमें लिखा गया था कि माँगी गयी प्रतिलिपियाँ उपलब्ध करा पाना सम्भव नहीं है। उनके द्वारा उक्त पत्र को पढ़ लेने के बाद मुख्य आयुक्त महोदय के सामने पत्र का वह निहितार्थ रेखांकित किया गया जो आयोग के साथ ही स्वयं उनकी अपनी कार्य-शैली की गुण-वत्ता पर भी प्रश्न-चिन्ह चस्पा कर रहा था। ‘सजग’ के अध्यक्ष डॉ० ज्योति प्रकाश ने कहा कि यदि आयोग के सूचना अधिकारी संजीव पाण्डेय ने केवल सचाई ही लिखी थी तो इसका तात्पर्य यह था कि २२ मार्च २०१६ की सुनवाई कर चुकने के बाद, दिनांक ११ अप्रैल २०१६ तक भी, आयोग के मुखिया ने पीठासीन आयुक्त के रूप में सम्बन्धित प्रकरण में सुनवाई की कार्यवाही का विवरण दर्ज नहीं किया था!

क्या है मामलातात्पर्य के रूप में रेखांकित होता उपर्युक्त तथ्य यदि यथार्थ भी था तो उसका ऐसा होना अनेक बड़े गम्भीर सवाल उठाता था। शायद इसीलिए, विचलित हुए आयोग के मुखिया को बोलना पड़ा कि उन्होंने तो उसी दिन अपनी आदेशिका लिख दी थी और वह प्रकरण-नस्ती में बा-कायदा मौजूद भी है। मुख्य आयुक्त के इस स्पष्टीकरण पर मुख्य आयुक्त महोदय का ध्यान सूचना अधिकारी के पत्र के उस अंश की ओर आकृष्ट किया गया जिसके अनुसार आवेदन से स्पष्ट नहीं होता था कि उसमें किन दस्तावेजों की नकलें चाही गयी थीं? और फिर, उनसे पूछ लिया गया कि क्या वे भी यही मानते हैं कि सत्यापित प्रति-लिपि के संस्था के आवेदन में वंछित दस्तावेजों की विशिष्टियाँ स्पष्ट नहीं हैं? इस पर आयोग के मुखिया ने बिना किसी हीला-हवाली किये अपने सूचना अधिकारी के ‘विनिश्चय’ को नकार दिया।

इसके बाद, इसी तरह के अन्य सन्दर्भों में आयोग से जुड़े तथ्यों और परिस्थितियों को ले कर एक लम्बी चर्चा हुई जिसके विस्तृत वर्णन से यहाँ बचना चाहता हूँ क्योंकि उससे आयोग की चाल, चरित्र तथा नीयत पर और भी गहरे ढेरों नये प्रश्न उठेंगे। किन्तु, सार रूप में यहाँ यह बतलाना आवश्यक है कि चर्चा में शामिल प्रतिनिधियों ने मुख्य आयुक्त को विस्तार से यह समझाया कि सत्यापित प्रति-लिपियों के बिल्कुल स्पष्ट निवेदन को सूचना-प्रदाय का आम आवेदन बतला कर आयोग के जिम्मेदार अधिकारी किस प्रकार से नकल देने के अपने बन्धन-कारी दायित्व को सालों-साल तक लटकाये रखने की दूषित नीयत रखते हैं। उन्होंने भी स्वीकार किया कि यह सालों-साल इसलिए लग सकते हैं क्योंकि यदि सम्बन्धित लोक प्राधिकरण का आन्तरिक तन्त्र तय कर ले तो नकलें पाने के लिए आवेदक को द्वितीय अपीली निर्णय आने तक तो रुकना ही पड़ेगा। क्योंकि, आयोग से बाहर निकल कर उच्च न्यायालय में वैकल्पिक न्यायिक अधिकार के प्रयोग की प्राथमिक शर्त यही होती है कि आयोग में उपलब्ध सभी विकल्प प्रयोग में लिये जा चुके हों। अन्त में, आयोग के मुखिया ने एक सप्ताह का समय माँगते हुए आश्वासन दिया कि वे स्वयं देखेंगे कि इस अवधि के बाद सजग को माँगी गयी सभी नकलें उपलब्ध करा दी जायें।

इसके बाद, दिनांक ०२ मई २०१६ को आवेदक को स्पीड-पोस्ट से आयोग के सूचना अधिकारी का २८ अप्रैल २०१६ की तारीख में लिखा एक पत्र मिला जिसमें उन्होंने सूचित किया कि ‘सजग’ के २९ मार्च २०१६ के आवेदन के सम्बन्ध में वे कुल १५ पृष्ठों की ‘वांछित जानकारी’ संलग्न कर भेज रहे हैं। पत्र के साथ संलग्न कर भेजे गये सभी १५ पृष्ठों के अवलोकन से स्पष्ट होता है कि उपलब्ध करायी गयी सभी प्रति-लिपियाँ सूचना का अधिकार अधिनियम, २००५ के अन्तर्गत्‌ भेजी गयी थीं! आयोग निश्चित रूप से यह दर्शाने का प्रयास करेगा कि यह एक मामूली सी तकनीकी बात है जिसका कोई विशेष महत्व नहीं है। सम्भव है, अपने व्यक्ति-गत्‌ स्तर पर स्वयं मुखिया भी ऐसा ही कहें-करें। वे कह सकते हैं कि मुख्य मुद्दा तो यह है कि वांछित नकलें, अन्तत:, उपलब्ध करा दी गयी हैं। किन्तु, मामला इतना सीधा-सपाट बिल्कुल नहीं है।

जो सूचना आयोग सरकारी तन्त्र में सम्पूर्ण पार-दर्शिता स्थापित करने की इकलौती जिम्मेदारी के लिए गठित हुआ है, वह स्वयं न केवल घोर अ-पारदर्शी है अपितु अ-पारदर्शिता को बढ़ावा देने के नित नये हथ-कण्डे खोजने में भी जुटा है। इस ताजे प्रकरण से अब तो यह भी लगने लगा है कि आयोग ने अधिनियम के अन्यथा उपलब्ध प्रावधानों का, गैर-वाजिब दरवाजे से, दुरुपयोग करना तक सीख लिया है।

आधार-भूत बात यह कि नकलों को सूचना का अधिकार अधिनियम के अन्तर्गत्‌ भेजा जाना दर्शा कर आयोग ने आवेदक के हाथ से, सदा उपलब्ध रहने वाले, परमादेश याचिका के रास्ते बलात्‌ रोक दिये हैं। इस अधिकार के प्रयोग से पहले आवेदक को अब प्रथम और द्वितीय अपीली चक्कर पूरे करने होंगे। क्योंकि, तभी समझा जायेगा कि आगे के न्यायिक हस्तक्षेप की अधिकारिता उसे मिल गयी है। और फिर, दूसरी बात यह भी कि कुछ गम्भीर सवाल तो पहले से ही उठे हुए थे, आयोग के द्वारा २८ अप्रैल २०१६ को भेजी गयी नकलों ने उन अनुत्तरित सवालों में कुछ नये आयाम और भी जोड़ दिये हैं।

बिल्कुल सीधा-सच्चा और प्राथमिक सवाल तो यही है कि सत्यापित प्रति-लिपि उपलब्ध कराने के ‘सजग’ के निवेदन को ठुकराने और माँगी गयी नकलों को नहीं देने का यदि सच में ही कोई ठोस वैधानिक आधार था तो उस आधार की बिल्कुल स्पष्ट सूचना के साथ ही नकल देने से मना किया जाना चाहिए था। दो टूक शैली में कहें तो, आयोग ने नकलें नहीं देने का निश्चय किया था तो उसके पास अपने इस निश्चय की बेबाक घोषणा करने का कलेजा भी होना चाहिए था; ना कि सूचना का अधिकार अधिनियम की शिखण्डी आड़ ले कर मामले को अनिश्चित काल के लिए लटकाये रखने की चतुर चाल चलनी थी। क्योंकि, प्रमाणित प्रति-लिपियों को देने से मनाही होने की स्पष्ट सूचना मिलने पर इससे प्रभावित होने वाले असन्तुष्ट आवेदक को कम से कम एक न्यायिक विकल्प तो उपलब्ध हो जाता है। ‘मारे भी और रोने भी नहीं दे‘ किसी गुण्डे-मवाली की चारित्रिक शोभा तो हो सकता है किन्तु ऐसा ही चरित्र-दोष क्या सूचना आयोग जैसे संवैधानिक संस्थान को भी शोभित कर पायेगा?

इतना ही नहीं, ११ अप्रैल २०१६ को आवेदक को लिखित रूप से यह सूचित करने के बाद कि ‘विशिष्टियाँ स्पष्ट नहीं होने के कारण’ वांछित ‘जानकारी’ दे पाना उसके लिए सम्भव नहीं हो पा रहा है; आवेदक द्वारा किसी भी प्रकार का कोई स्पष्टीकरण दिये बिना ही २८ अप्रैल २०१६ को आयोग द्वारा ‘वही जानकारियाँ’ भेज भी दिया जाना आयोग के मुखिया के समक्ष आयोग के चरित्र पर उठाये गये गम्भीर सवालों तथा उनसे की गयी मौखिक शिकायत के बाद हुई किसी आन्तरिक पड़ताल का केवल आधा-अधूरा परिणाम भर है। ‘आधा-अधूरा’ इसलिए कि ‘जानकारी को उपलब्ध कराने से मना कर ११ अप्रैल को सूचना अधिकारी ने ‘देय जानकारी को दबाये रखने का अपराध किया था’ जैसा तथ्य स्थापित हो जाने के बाद भी आयोग के मुखिया ने अपने इस दोषी प्रमाणित हो चुके अधीनस्थ के विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं की थी।

इस बिन्दु पर यह महत्व-पूर्ण स्पष्टीकरण देना भी आवश्यक हो जाता है कि २८ अप्रैल २०१६ को आवेदक को भेजी गयी नकलों में से केवल एक पृष्ठ की नकल ही उस दस्तावेज की है जो सत्यापित प्रति-लिपि के आवेदन के माध्यम से आयोग से माँगी गयी थीं। बाकी के पृष्ठों में से एक पृष्ठ तो द्वितीय अपीली सुनवाई की सूचना के रूप में आयोग ने पहले ही आवेदक/अपीलार्थी को भेज रखा था। और, शेष १३ पृष्ठों की नकलें पाना तो अपीलार्थी का वैधानिक अधिकार है क्योंकि सुनवाई के दौरान पीठासीन आयुक्त द्वारा इन प्रति-लिपियों को उसे देना ही देना था। वह भी, एकदम नि:शुल्क। क्योंकि, ऐसा होना न्यायिक प्रक्रिया का वैधानिक अंश होता है। सूचना-प्रदाय की आड़ में इन नकलों का देना एक नये षडयन्त्र की ओर इंगित करता है जिसकी जमीन यह है कि आयोग चाहता तो उन नकलों को दबा कर भी रख सकता था! वहीं दूसरी ओर, वांछित प्रमाणित प्रतिलिपियों को सूचना-प्रदाय के अधिनियमित दायरे में ला कर आयोग ने जहाँ अपने मुखिया की ‘सजग’ के प्रतिनिधि-मण्डल से हुई चर्चा के सारे निचोड़ को ही नकार दिया है वहीं तत्काल, आयोग से बाहर जा कर, न्यायिक चुनौती देने के विकल्प को भी अपने ही पंजे में दबाये रखा है।

क्या आयोग के सूचना अधिकारी संजीव पाण्डेय द्वारा २८ अप्रैल २०१६ को भेजी गयी नकलों का इकलौता निहितार्थ यह है कि माँगी गयी नकलों के मूल दस्तावेज प्रकरण-नस्ती में पहले से मौजूद थे और उन्होंने, उन्हें ही बेहतर ज्ञात कारणों से, इन दस्तावेजों के प्रकरण-नस्ती में नहीं होने की सर्वथा असत्य सूचना ११ अप्रैल २०१६ के लिखे अपने पत्र में दी थी? या फिर, इसका दूसरा निहितार्थ यह है कि आयोग के मुखिया के साथ सजग की हुई दो-टूक बातचीत के बाद, अपने दामन पर लगे दागों को मिटाने के लिए स्वयं मुखिया ने और उनके अधीनस्थों ने भी, सारे दस्तावेज पिछली तिथियों में या तो स्वयं तैयार किये या फिर उचित स्थानों से उन्हें बटोर कर एकत्र कराया?

जो भी हो, यह दोनों ही निहितार्थ अन-देखी करने योग्य बातें नहीं हैं। क्योंकि यह ऐसे अक्षम्य व प्रताड़नीय अपराध हैं जिन्हें मामूली और सहज-क्षम्य ठहरा कर न तो विधि को और ना ही जन-सामान्य को बरगलाया जा सकता है। किन्तु यदि, इन दोनों के अतिरिक्त कोई तीसरा या चौथा निहितार्थ भी रहा हो तो उसकी जानकारी या तो केवल आयोग को होगी या फिर स्वयं उसके मुखिया को ही।

आयोग फँस गया है। अकेला आयोग ही क्यों, स्वयं मुख्य आयुक्त भी बुरी तरह से घिर चुके हैं। अब तो वे यह कहने की, सर्वथा सुरक्षित समझी जाने वाली, स्थिति में भी नहीँ है कि ‘उन्हें प्रकरण तथा उससे जुड़े तथ्यों के बारे में कुछ पता नहीं है’ क्योंकि सारे तथ्य उनके निजी ज्ञान में हैं। देखना बस यह है कि आयोग के भीतर पसरी पड़ी, सड़ाँध मारती, गन्दगी की सफाई की दिशा में वे कौन से ठोस कदम उठाते हैं? किस-किस के विरुद्ध कौन-कौन सी कार्यवाही करते हैं? कोई कार्यवाही करते भी हैं या नहीं?

(०७ मई २०१६)

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खेसारी की खेती को कानूनी मंजूरी का मतलब जन-स्वास्थ्य से छलावा http://www.jyotiprakash.me/2016/02/khesari-matalab-jan-swasthya-se-chhalawa/ Mon, 01 Feb 2016 09:11:38 +0000 https://www.jyotiprakash.me/?p=2992

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खेसारी का जहर नये सिरे से फन उठा रहा है। इसे कुचलना ही होगा। नहीं तो, ऐसा अनर्थ होगा जिससे मुक्ति की कोई राह कभी नहीं ढूँढ़ी जा सकेगी। एक अनर्थ को रोक सकने की तन्त्र की असमर्थता उस अनर्थ को सामाजिक और कानूनी मान्यता देने की अपनी बद-नीयती को जायज कैसे ठहरा सकती है? …

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खेसारी का जहर नये सिरे से फन उठा रहा है। इसे कुचलना ही होगा। नहीं तो, ऐसा अनर्थ होगा जिससे मुक्ति की कोई राह कभी नहीं ढूँढ़ी जा सकेगी। एक अनर्थ को रोक सकने की तन्त्र की असमर्थता उस अनर्थ को सामाजिक और कानूनी मान्यता देने की अपनी बद-नीयती को जायज कैसे ठहरा सकती है?

इण्डियन काउन्सिल ऑफ़ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) के हवाले से आई एक खबर ने प्रिण्ट तथा इलेक्ट्रोनिक मीडिया में बराबरी से हल-चल मचा दी है। खबर है कि आईसीएमआर ने, स्वास्थ्य विज्ञानियों के बीच भयंकर रूप से नुकसान-देह मानी जा चुकी, खेसारी दाल को स्वास्थ्य के लिए पक्की तौर पर सुरक्षित घोषित करते हुए उसकी खेती पर लगे प्रतिबन्ध को उठाने की सिफारिश की है।

दुर्भाग्य की बात है कि आईसीएमआर ने आधी-अधूरी और अपुष्ट वैज्ञानिक सूचनाएँ उपलब्ध करा कर देश के शासन-प्रशासन को बरगलाने का दुष्प्रयास किया है। और, निहित स्वार्थी घटकों ने उसके इस प्रयास का अपने पक्ष में यथा-सम्भव दोहन कर लेने की जुगतें भी भिड़ानी आरम्भ कर दी हैं। कोई अचरज नहीं कि इस सिफारिश के पीछे इन्हीं निहित-स्वार्थी पक्षों की बरसों से काम करती आ रही लॉबी ने अपनी भूमिका अदा की हो। यही नहीं, क्योंकि देश के राजनैतिक मुखिया भी इसमें अपनी भलाई देख रहे हैं, वे भी अपने-अपने निहित-स्वार्थी कुतर्कों को फैलाते पाये जाने लगे हैं।

देशी खबरों के संसार में खेसारी दाल (लेथाइरस सेटाइवस) के तपेले में जिस प्रकार एकदम नये सिरे से उबाल आ रहा है उसे देख कर जहाँ पुरानी पीढ़ी के लोगों के बीच यह सवाल उठना सहज-स्वाभाविक है कि स्थापित हो चुके एक जहरीले खाद्य को लोगों की रसोई तक पहुँचाने की इतनी हाय-तौबा आखिर किसलिए? वहीं नयी पीढ़ी के लोगों के बीच उत्सुकता का केन्द्र इस सवाल पर टिका है कि खेसारी के मानव-खाद्य के रूप में ‘पूरी तरह से सुरक्षित होने’ के नित नये आ रहे ‘दावों’ में ऐसे क्या खोट हैं जो, उन्हें सिरे से नकारते हुए, इसकी खेती को प्रतिबन्धित रखना ही होगा?

पीढ़ियों के अन्तर से उठे यह दोनों सवाल सरसरे तौर परस्पर विपरीत भले लगते हों, लेकिन यथार्थ में तो, दोनों एक-दूसरे के इतने पूरक हैं कि इनमें से किसी एक का भी पूरी ईमान-दारी से भरा जवाब, स्वत: ही, दूसरे के समूचे यथार्थ से परिचय करा देगा।

क्योंकि, पुरानी पीढ़ी के लोग खेसारी को खाने से होने वाले भयावह नुकसान से जुडी अतीत की उस बहस के गवाह रहे हैं, खेसारी के इन नुकसानों के इतिहास और भूगोल से कतई अनभिज्ञ नई पीढ़ी की उत्सुकता से जुड़े पक्ष से ही शुरुआत करना अधिक उचित रहेगा।

यों, खेसारी दाल (अर्थात्‌ तिवड़ा) से जुड़े ज्ञान-विज्ञान के धरातल पर, केन्द्रीय खाद्य तथा नागरिक आपूर्ति मन्त्री रामविलास पासवान किसी भी स्तर की किसी समझ के अधिकृत दावेदार नहीं हैं लेकिन ताजी हवा में भागीदारी के लिए उन्होंने एक वक्तव्य ठोंक दिया है कि वे बीते पन्द्रह सालों से नियमित रूप से खेसारी दाल का सेवन करते आये हैं और उन्होंने पाया है कि मानव-खाद्य के रूप में खेसारी पूरी तरह से ‘सुरक्षित’ है। और, जिन व्यक्तियों ने खेसारी से जुड़े विभिन्न वैज्ञानिक पक्षों को कभी सुना ही नहीं है उनके लिए पासवान का यह वक्तव्य बड़ा महत्व रखता है। इसलिए उस वक्तव्य की जमीनी सचाई की समीक्षा लगे हाथों कर लेने में भलाई ही है।

खेसारी के सुरक्षित खाद्य होने के पासवान के इस दावे को मौटे तौर पर तीन धरातलों पर तौला जाना चाहिए —

पहला यह कि, अतीत में, वह स्वयं खेसारी की खेती को पूरी तरह से प्रतिबन्धित करने की वकालत पूरे जोर-शोर से करते दर्ज हो चुके हैं। वह भी राजनीति की किसी नुक्कड़-सभा में नहीं बल्कि देश की संसद में। लेकिन हाँ, तब यह विरोध उन्होंने शायद इसलिए किया था क्योंकि तब वह महज सांसद के लिए आबण्टित सीट पर पाये जाते थे और उन दिनों खुद को दलितों और गरीबों का उभरता हुआ मसीहा साबित करने का प्राण-पण से प्रयास कर रहे थे। उनके बर्ताव में आज का यह बदलाव इसलिए आया होगा क्योंकि वे यह मान कर चल रहे हैं कि अब तो वह दलितों तथा दुखियारे गरीबों के स्थापित नेता बन चुके हैं। उनके चरित्र में यह बदलाव सम्भवत: इसलिए भी आया होगा क्योंकि खेसारी-समर्थक ताजे वक्तव्य वाले उनके चारित्रिक बदलाव से, सत्ता-सुख के सदा भरे रहने वाले सकोरे पर, उनकी पकड़ को भर-पूर मदद मिलेगी।

दूसरा यह कि खेसारी और एक खास तरह के लँगड़ेपन (स्पास्टिक पैराप्लीजिया ऑफ़ लोअर लिम्ब यानि लेथाइरिज़्म) के बीच परस्पर सम्बन्ध होने के तथ्य न केवल आधुनिक विज्ञान में बल्कि आयुर्वेद के दो प्राचीन ग्रन्थों तक में बाकायदा दर्ज हैं। भाव प्रकाश निघण्टू और माधव निदान नामक इन प्रसिद्ध ग्रन्थों में खेसारी को ‘त्रिपुटा’ और उससे होने वाली बीमारी को ‘कलायखञ्ज कहा गया है।

एक तीसरा पक्ष और भी है। इसके अनुसार, मन्त्री जी आज के जिन तथा-कथित विज्ञानियों और उनके किये दावों के समर्थन में अपना मन-गढ़न्त और सरासर असत्य दावा कर गये हैं, स्वयं उनका सार है कि हाल ही में खेसारी की कुछ ऐसी ‘ताजा’ किस्में खोजी गयी हैं जिनमें खेसारी का विषैला तत्व मौजूद तो है किन्तु उसकी मात्रा ‘न्यूनतम्‌’ है!

Lathyrus sativus (Khesari dal) plant

क्योंकि, न्यूनतम्‌ विष नाम की यह छछूंदर खेसारी घोटाले की महत्व-पूर्ण कड़ी है, कड़ियों के इसी छोर से बात को आगे बढ़ाना उचित होगा। अतीत में एक बार और भी ऐसी ही एक छछूंदर, मीडिया के माध्यम से, आम आदमी के बीच छोड़ी गयी थी। केवल और केवल नुकसान-देह खेसारी को स्वीकृति दिलाने की नीयत से। तब भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद्‌ (आईसीएआर) ने दिल्ली के अपने पूसा केन्द्र के माध्यम से दावा किया था कि उसने नुकसान-कारी खेसारी दाल की ऐसी परिष्कृत किस्म विकसित की है जिसमें विषैले तत्व की मात्रा केवल ०.२४ प्रतिशत्‌ ही है। आम तौर पर उपयोग में लायी जाने वाली सरल भाषा में इस विष को बीटा ऑक्ज़ेलिल अमीनो एलानाइन (बीओएए) के नाम से पुकारा जाता है। क्योंकि प्रचलित खेसारी की सामान्य किस्मों में, औसतन, तीन से पाँच प्रतिशत्‌ तक बीओएए पाया जाता रहा है पूसा-२४ नाम की घोषित हुई यह नयी किस्म सच में ‘बहुत कम’ विषैली रही होनी चाहिए। ‘रही होनी चाहिए’ इसलिए क्योंकि जब पूसा जा कर मैंने, खेतों में वास्तविक प्रयोग के लिए, इस किस्म के बीजों के नमूनों की माँग की तब बड़े खेद-प्रकाश के साथ सूचित किया गया कि संस्थान के पास, प्रायोगिक उपयोग हेतु देने के लिए, पूसा-२४ का एक बीज भी मौजूद नहीं है। बात बीती सदी के अस्सी वाले दशक के आरम्भिक सालों की है।

चौंकाने वाले इस अनपेक्षित खुलासे से मेरी तलाश इस दिशा में मुड़ी कि यदि पूसा-२४ की इस किस्म के कोई प्रयोग किन्हीं अधिकृत प्रायोगिक खेतों में कभी हुए हों तो उनके परिणामों की रपट ही पा ली जाये। काफी खोज-बीन के बाद ऐसे कुछ दस्तावेज मेरे हाथ लग भी गये। इन दस्तावेजों से खुलासा हुआ था कि देश के स्थापित पाँच विश्व-स्तरीय कृषि-संस्थानों में पूसा-२४ की फील्ड ट्रायल में पाया गया कि मूल बीज से आरम्भ कर क्रमिक रूप से तीसरी फसल लिए जाने पर खेसारी की इस कथित न्यूनतम्‌ विषैली किस्म पूसा-२४ की जो फसल काटी गयी उसमें जहरीले बीओएए का प्रतिशत्‌ ०.२४ से बढ़ कर ३.५% से ५.५% तक पहुँच गया था!

संक्षेप में, उत्तरोत्तर अगली फसलों में खेसारी के घातक विष के लगातार बढ़ते जाने की इस चौंकाने वाली खबर ने पूसा के पास, स्वयं अपनी ही विकसित किस्म का, एक भी बीज मौजूद नहीं होने का खुला स्पष्टीकरण उपलब्ध करा दिया था। आईसीएआर आज जिन तीन विकसित किस्मों का दावा कर रहा है उनका भविष्य भी इससे भिन्न कभी नहीं रहेगा। गेहूँ से लगा कर खेतिहर पैदावार में लगने वाले किसी भी ‘उन्नत’ बीज को प्रयोग करने वाला औसत से औसत किसान भी इस तथ्य की पुष्टि कर देगा। जहाँ इसके विशुद्ध वैज्ञानिक तर्क व आधार उन्नत मास्टर बीज को बनाने की प्रक्रिया में निहित हैं वहीं यह भी उतनी ही बड़ी वैज्ञानिक सचाई है कि खेतों की मिट्‍टी की जैविक तथा रासायनिक संरचना की भिन्नता भी पुन: अधिकतम्‌ के स्तर तक बढ़ते जाने वाले इस विकार का दूसरा बड़ा कारक होती है। ऐसी कारक, जिस पर किसी का भी कोई नियन्त्रण नहीं होता। कभी हो भी नहीं पायेगा।

Lathyrus sativus_Flower

खेसारी को ले कर परोसे जाने वाले झूठों की फेहरिस्त अन्त-हीन है। जैसे, अपने में मौजूद बीओएए के कारण खेसारी, लाख प्रयासों के बाद भी, जब नुकसान-दायक होने की अपनी सदियों पुरानी पहचान से मुक्ति नहीं पा सकी तो इसको सुरक्षित बताने में जुटी लॉबी ने यह बात फैलाने में एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया कि खेसारी में नुकसान-दायी बीओएए होता ही नहीं है। दावा किया जाने लगा कि, असल में तो, खेसारी में ओडीएपी (ऑक्जेलिल डाईअमीनो प्रोपियॉनिक एसिड) नामक रसायन होता है। यह खेसारी को, पिछले दरवाजे से, लँगड़ा बनाने की जिम्मेदारी से मुक्त कराने का एक सोचा-समझा षडयन्त्र था। बीओएए के खेसारी में पाये जाने तथा इसके लँगड़ा बना देने वाले दुष्प्रभाव पर पर्याप्त ठोस वैज्ञानिक आधारों को इकट्‍ठा कर चुके होने से मेरा चौंकना स्वाभाविक था। तब, आगे की जाँच-पड़ताल से पता चला कि खेसारी-समर्थक लॉबी की सुविधा के लिए, वैज्ञानिकों ने परस्पर मिली-भगत कर, बीओएए को ओडीएपी वाला एक नया नाम दे दिया था।

राजनेताओं की बेबसी तो फिर भी समझी जा सकती है। लेकिन वैज्ञानिकों की…?

कृषि तथा पोषण विज्ञानियों की खेसारी समर्थक लॉबी से मिली-भगत को खेसारी घोटाले की दूसरी महत्व-पूर्ण कड़ी कहा जा सकता है। बिना कोई प्रयोग किये कथित प्रयोग के महत्व-पूर्ण परिणामों को पा लेने से लगा कर अपनी ही रिसर्च से निकले परिणामों को नकार देने तक इस मिली-भगत की एक लम्बी सूची है। और, चोटी के समझे जाने वाले देश के विज्ञानी इसमें शामिल घपले-बाजों के सिर-मौर रहते आये हैं। बीती सदी में अनेक अन्तर्राष्ट्रीय फोरमों में, इन विज्ञानियों की पूरी की पूरी कच्ची कलई उतारी भी जा चुकी है। देश के योजना आयोग में भी ऐसे विज्ञानियों के घिनौने कृत्यों पर अनेक महत्व-पूर्ण अधिकृत दस्तावेज जमा किये जा चुके हैं। उस दौर में खेसारी की कथित शोधों से जुड़ा एक भी नामी-गिरामी विज्ञानी आयोग को सन्तुष्ट नहीं करा पाया था कि खेसारी की खेती या फिर खेसारी का खाना मानव-स्वास्थ्य के लिए पूरी तरह से सुरक्षित है।

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खेसारी को ले कर दशकों तक छिड़ी रही बहस से कतई अन-भिज्ञ नयी पीढ़ी के लिए यह तथ्य चौंकाने वाला होगा कि आज जिस ‘पोषण-विज्ञानी’ डॉ० शान्तिलाल कोठारी का नाम खेसारी की खेती को प्रतिबन्ध से मुक्ति दिलाने वाले ‘हीरो’ की तरह सुर्खियों में है; वह, अपनी तमाम शैक्षणिक योग्यताओं तथा महिमा-मण्डित विशेषज्ञताओं के साथ, बीती सदी में छिड़ी तीखी बहसों के बीच उस समय भी मौजूद थे जब योजना आयोग अपने उपाध्यक्ष डॉ० एमजीके मेनन के निजी दिशा-निदेशन में खेसारी की सचाई को उसकी जड़ तक तलाशने में जुटा हुआ था। लेकिन भूख-हड़ताल की सार्वजनिक धमकियों से आगे, उनके पास ऐसा एक भी ठोस वैज्ञानिक तर्क अथवा तथ्य नहीं था जो आयोग को खेसारी की खेती के पक्ष में सन्तुष्ट करा पाया हो। इसके उलट, कोठारी महाशय आज भी खेसारी की खेती और खेसारी के कारण लँगड़े-पन से प्रभावित व्यक्तियों को ले कर ऐसे-ऐसे कुतर्क देते मिल जाते हैं जिन्हें सुन कर, चिकित्सा, विष-विज्ञान तथा कृषि-विज्ञान के जानकार या तो उनकी नीयत पर नही तो फिर उनकी शैक्षणिक योग्यताओं पर ही प्रश्न-चिन्ह जड़ने को विवश हो जाते हैं।

फिर भी, खेसारी का जहर नये सिरे से फन उठा रहा है। इसे कुचलना ही होगा। नहीं तो, ऐसा अनर्थ होगा जिससे मुक्ति की कोई राह कभी नहीं ढूँढ़ी जा सकेगी। एक अनर्थ को रोक सकने की तन्त्र की असमर्थता उस अनर्थ को सामाजिक और कानूनी मान्यता देने की अपनी बद-नीयती को जायज कैसे ठहरा सकती है? फिर, यह तर्क भी अपने आप में एक छलावा है कि खेसारी आम आदमी को भोजन में प्रोटीन की कमी से मुक्ति दिलायेगी। क्योंकि, यह तथा-कथित मुक्ति उतनी सीधी व सरल नहीं है जितनी कि उसे दर्शाया जा रहा है। दरअसल, खेसारी में ट्रिप्सिन इन्हिबिटर नामक एक विशिष्ट रसायन प्राकृतिक रूप से होता है। यह रसायन शरीर के पाचन-तन्त्र में मौजूद ट्रिप्सिन नामक उस एन्जाइम को अपना काम करने से रोकता देता है जो भोजन में शामिल प्रोटीन को पचाने की क्रिया में अहम्‌ भूमिका निभाता है। सरल शब्दों में इसका इकलौता तात्पर्य यही है कि खेसारी में चाहे जितना भी प्रोटीन क्यों ना हो, सामान्य घरेलू स्थितियों में खायी जाने वाली यहमहान्‌ समृद्ध दाल शरीर के लिए निरी निरुपयोगी ही रहेगी। क्योंकि, शरीर उसके प्रोटीन-भण्डार को ग्रहण ही नहीं कर पायेगा।

वहीं, इस महत्व-पूर्ण सवाल पर भी दावे-दारों ने अपने ओंठ सिले हुए हैं कि समेकित (क्‍यूमिलेटिव, यानि धीरे-धीरे शरीर में इकट्‍ठे हो कर) असर करने वाली खेसारी में ‘नगण्‍य’ जहर का क्‍या मतलब होगा? यहाँ ‘समेकित प्रभाव’ को समझ लेना भी आवश्यक है। इसका मतलब है कि जितना भी यह विष खाया जायेगा, वह पूरा का पूरा, खाने वाले के शरीर में इकट्‍ठा होता जायेगा। अर्थात्‌, खेसारी खाने वाले को एक दिन ऐसा भी देखने को मिल सकता है जब उसके शरीर में एकत्रित हुए इस विष की मात्रा उसके स्वास्थ्य के लिए ‘सुरक्षित’ सीमा-रेखा को लाँघ ले। और इस तरह, वह लेथारिज्म से प्रभावित हो जाये।

सचाई से भरे इस तर्क से बचाव का ब्रह्मास्त्र भी पोषण-विज्ञानियों ने तलाश रखा है। विज्ञान की शोधों के प्रकाशन से जुड़ी प्रसिद्ध पत्रिका लेन्सैट ने गेटाहन एवं उनके सहयोगियों द्वारा अपनी शोध के हवाले से सन्‌ २००३ में लिखे शोध-पत्र का उल्लेख करते हुए जो जानकारी प्रकाशित की है उसका सार है कि नये प्रकार के (सुरक्षित) तिवड़े को खाने वालों को सुरक्षा की केवल कुछ ‘छोटी-मोटी’ शर्तों का पालन करना होगा। और, यह छोटी-मोटी शर्तें क्या हैं? सरल हिन्दी में इन शर्तों का सार यह है कि खाने से पहले तिवड़ा को भिगो कर इतनी देर रखना होगा जिससे उसमें खमीर उठने लगे। उसके बाद, इस खेसारी को एण्टी ऑक्सिडेण्ट वाले बीजों की ग्रेवी में मिलाने और सल्फर अमीनो एसिड वाले अनाजों के साथ मिल कर खाने से, उसको खाने से होने वाले पक्षाघात की सम्भावना ‘कम’ हो जाती है।

स्पष्ट है, खतरे की चेतावनी देने वाले क्लिष्ट तकनीकी और वैज्ञानिक कारण स्वयं वैज्ञानिक दस्तावेजों में ही पर्याप्त मात्रा में सुलभ हैं। फिर भी, तिवड़ा के किसी सुरक्षित प्रकार की खेती की वकालत में जुटी अन्तर्राष्ट्रीय बिरादरी दावा कर रही है कि प्रयोग-शालाओं में तैयार की जाने वाली नये प्रकार की खेसारी, दाने-दाने और पैसे-पैसे को मोहताज गरीब की, प्रोटीन की सारी आवश्यकताओं की पूर्ति तो करेगी ही करेगी, इसका खाया जाना स्वास्थ्य के मान-दण्डों पर सुरक्षित भी रहेगा!

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खेसारी से जुड़े ‘व्यवसाय’ की तह तक जाने पर, किसी भी संशय से परे, यह सचाई उजागर हो जाती है कि बीते अतीत का सारा खेल मिलावट के व्यवसाय का रहा है। हाँ, इस मिलावट के प्रकार अलग-अलग अवश्य रहे हैं। जहाँ ‘नग’ की तरह यह विषैला खाद्य हर सम्भव थाली में जगह बना रहा है वहीं इसको समर्थन देने वाली तथा-कथित विज्ञानियों की पूरी बिरादरी, तथ्यों और तर्कों में सुविधा-जनक मिलावट कर, ‘नगीनों’ की तरह ज्ञान-विज्ञान को कलंकित कर रही है।

इस सब के बीच महत्व-पूर्ण खबर यह भी है कि फुड सेफ्टी एण्ड स्टैण्डर्ड अथॉरिटी ऑफ इण्डिया (एफएसएसएआई) ने निर्णय लिया है कि वह अपने स्तर पर, स्वतन्त्र रूप से, पहले यह जाँचेगी कि खेसारी मानव-खाद्य के लिए सच में सुरक्षित है या नहीं? उसका कहना है कि अपने इस मूल्यांकन के बाद ही वह खेसारी की खेती पर से प्रतिबन्ध उठाने की इण्डियन काउन्सिल ऑफ एग्रिकल्चर रिसर्च (आईसीएआर) तथा आईसीएमआर की अनुसंशाओं को अपनी सहमति देगी।

जैसा कि हमारे देश में सदा से होता आया है, एफएसएसएआई पर प्रत्यक्ष-परोक्ष दबाव बढ़ाने का घृणित खेल भी आरम्भ हो गया है। वायदा बाजार के आसरे देश में दालों की क्रत्रिम रूप से फैलायी गयी कमी को खेसारी के सहारे दूर कर पाने का कुतर्क इस खेल का ऐसा आसान हथियार है जिससे औसत भारतीय बिना सोचे-विचारे तत्काल प्रभावित होगा। यह एक ऐसा हथियार है जिसका सहारा ले कर जन-मानस को खेसारी के पक्ष में आसानी से उद्वेलित किया जा सकेगा। और तब, जन-दबाव की आड़ ले, खेसारी पर प्रतिबन्ध को उठाने की विवशता दिखाना बहुत सरल हो जायेगा। वहीं दूसरी ओर, यह एक ऐसा हथियार भी है जिसे स्वास्थ्य-विज्ञान के ठोस तर्कों से काट पाना केवल इस कारण कठिन होगा क्योंकि छलावे वाले इस हथियार के साथ उसका कोई ठोस वैज्ञानिक तर्क कभी रखा ही नहीं जायेगा। कठिन इसलिए नहीं कि खेसारी को मानव-खाद्य के रूप में प्रयोग करने का विरोध करते वैज्ञानिक तर्कों में कोई धार नहीं है; बल्कि इसलिए कि आम आदमी तक न तो इन वैज्ञानिक तथ्यों की पहुँच सम्भव होगी और ना ही देश का औसत नागरिक इन तथ्यों को, उनकी वास्तविक गहराई में उतर कर, समझ पाने की योग्यता रखता है।

ऐसे में, एफएसएसएआई के सामने परीक्षा की वह कठिन घड़ी उपस्थित हो गयी है जब उसे अपनी निष्पक्ष स्वायत्ता प्रमाणित करने के गम्भीर दायित्व का निर्वाह करना है। बड़ा सवाल तो यह भी है कि क्या एफएसएसएआई ऐसा मंच है भी या नहीं जिसे एक सिद्ध-दोषी फसल के सुरक्षित होने अथवा नहीं होने का कोई प्रमाण-पत्र देने का नैतिक अथवा वैधानिक अधिकार प्राप्त है?

खेसारी न तो बोई जानी चाहिए, न काटी जानी चाहिए और ना ही बेची जानी चाहिए।

(०१ फरवरी २०१६)

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फिर से फन उठाता खेसारी का जहर http://www.jyotiprakash.me/2016/01/phir-se-phan-uthata-khesari-ka-jahar/ Tue, 26 Jan 2016 12:31:42 +0000 https://www.jyotiprakash.me/?p=2981

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Sarokar

आधी-अधूरी और अपुष्ट सूचनाएँ उपलब्ध करा खेसारी दाल की खेती को कानूनी मान्यता देने की खबर है। खबर के साथ सोचे-समझे कुतर्क फैलाये जा रहे हैं। खेसारी से जिनके व्यापारिक स्वार्थ जुड़े हैं उनके द्वारा भी, कुछ तथा-कथित कृषि-विज्ञानियों द्वारा भी और शासन-प्रशासन तन्त्र से जुड़े निहित स्वार्थी तत्वों द्वारा भी।

इण्डियन काउन्सिल ऑफ़ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) के हवाले से आई एक खबर ने प्रिण्ट तथा इलेक्ट्रोनिक मीडिया में बराबरी से हल-चल मचा दी है। खबर है कि आईसीएमआर ने, स्वास्थ्य विज्ञानियों के बीच भयंकर रूप से नुकसान-देह मानी जा चुकी, खेसारी दाल को स्वास्थ्य के लिए पक्की तौर पर सुरक्षित घोषित करते हुए उसकी खेती पर लगे प्रतिबन्ध को उठाने की सिफारिश की है।

दुर्भाग्य की बात है कि आईसीएमआर ने आधी-अधूरी और अपुष्ट वैज्ञानिक सूचनाएँ उपलब्ध करा कर देश के शासन-प्रशासन को बरगलाने का दुष्प्रयास किया है। और, निहित स्वार्थी घटकों ने उसके इस प्रयास का अपने पक्ष में यथा-सम्भव दोहन कर लेने की जुगतें भी भिड़ानी आरम्भ कर दी हैं। कोई अचरज नहीं कि इस सिफारिश के पीछे इन्हीं निहित-स्वार्थी पक्षों की बरसों से काम करती आ रही लॉबी ने अपनी भूमिका अदा की हो। यही नहीं, क्योंकि देश के राजनैतिक मुखिया भी इसमें अपनी भलाई देख रहे हैं, वे भी अपने-अपने निहित-स्वार्थी कुतर्कों को फैलाते पाये जाने लगे हैं।
Lathyrus sativus (Khesari dal) plant
इस सब के बीच महत्व-पूर्ण खबर यह भी है कि फुड सेफ्टी एण्ड स्टैण्डर्ड अथॉरिटी ऑफ इण्डिया (एफएसएसएआई) ने निर्णय लिया है कि वह अपने स्तर पर, स्वतन्त्र रूप से, पहले यह जाँचेगी कि खेसारी मानव-खाद्य के लिए सच में सुरक्षित है या नहीं? उसका कहना है कि अपने इस मूल्यांकन के बाद ही वह खेसारी की खेती पर से प्रतिबन्ध उठाने की इण्डियन काउन्सिल ऑफ एग्रिकल्चर रिसर्च (आईसीएआर) तथा आईसीएमआर की अनुसंशाओं को अपनी सहमति देगी।
Lathyrus sativus (Khesari dal)
जैसा कि हमारे देश में सदा से होता आया है, एफएसएसएआई पर प्रत्यक्ष-परोक्ष दबाव बढ़ाने का घ्रणित खेल भी आरम्भ हो गया है। वायदा बाजार के आसरे देश में दालों की क्रत्रिम रूप से फैलायी गयी कमी को खेसारी के सहारे दूर कर पाने का कुतर्क इस खेल का ऐसा आसान हथियार है जिससे औसत भारतीय बिना सोचे-विचारे तत्काल प्रभावित होगा। यह एक ऐसा हथियार है जिसका सहारा ले कर जन मानस को खेसारी के पक्ष में आसानी से उद्वेलित किया जा सकेगा। और तब, जन-दबाव की आड़ ले, खेसारी पर प्रतिबन्ध को उठाने की विवशता दिखाना बहुत सरल हो जायेगा। वहीं दूसरी ओर, यह एक ऐसा हथियार भी है जिसे स्वास्थ्य-विज्ञान के ठोस तर्कों से काट पाना केवल इस कारण कठिन होगा क्योंकि छलावे वाले इस हथियार के साथ उसका कोई ठोस वैज्ञानिक तर्क कभी रखा ही नहीं जायेगा। कठिन इसलिए नहीं कि खेसारी को मानव-खाद्य के रूप में प्रयोग करने का विरोध करते वैज्ञानिक तर्कों में कोई धार नहीं है; बल्कि इसलिए कि आम आदमी तक न तो इन वैज्ञानिक तथ्यों की पहुँच सम्भव होगी और ना ही देश का औसत नागरिक इन तथ्यों को, उनकी वास्तविक गहराई में उतर कर, समझ पाने की योग्यता रखता है।

इसी बीच लोक जन-शाक्ति पार्टी के अध्यक्ष और केन्द्रीय खाद्य तथा नागरिक आपूर्ति मन्त्री रामविलास पासवान ने यह वक्तव्य दे कर राज-नेताओं के झूठे चरित्र का गुब्बारा हवा में उछाल दिया है कि वे बीते पन्द्रह सालों से नियमित रूप से खेसारी दाल का सेवन करते आये हैं और उन्होंने पाया है कि मानव-खाद्य के रूप में खेसारी पूरी तरह से ‘सुरक्षित’ है।

रामविलास पासवान किस दुनिया में रहते हैं यह तो मैं नहीं जानता लेकिन मैं इतना अवश्य जानता हूँ कि देश का आम आदमी मूर्खों की दुनिया में बिल्कुल नहीं रहता है।

पासवान भूल रहे हैं कि, अतीत में, देश की संसद में वह स्वयं खेसारी की खेती को पूरी तरह से प्रतिबंधित करने की वकालत कर चुके हैं। वह भी, पूरे जोर-शोर से।

लेकिन, तब यह विरोध उन्होंने शायद इसलिए किया था क्योंकि तब वह महज सांसद के लिए आबण्टित सीट पर पाये जाते थे और उन दिनों खुद को दलितों और गरीबों का उभरता हुआ मसीहा साबित करने का प्राण-पण से प्रयास कर रहे थे। मुझे लगता है कि उनके बर्ताव में आज का यह बदलाव इसलिए आया है क्योंकि यह मान कर चल रहे हैं कि अब तो वह दलितों तथा दुखियारे गरीबों के स्थापित नेता बन चुके हैं। उनके चरित्र में यह बदलाव सम्भवत: इसलिए भी आया होगा कि खेसारी-समर्थक ताजे वक्तव्य वाले उनके चारित्रिक बदलाव से, सत्ता-सुख के सदा भरे रहने वाले सकोरे पर, उनकी पकड़ को भर-पूर मदद मिलेगी।

(२६ जनवरी २०१६)

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