पॉज़िटिव थिंकिंग मेक्स वन पॉज़िटिव

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असली पॉज़िटिव टिप है कि यह समझा जाये कि कैसे माइनस और माइनस को मिला देने से सब कुछ प्लस में बदल जाता है? इतना समझा नहीं कि पूरा जहां परफ़ेक्ट पॉज़िटिव क्लाउड की छत्र-छाया में आ जायेगा। Continue reading

एक प्याली चाय का वज़न

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मियाँ खबरों की किस सदी में जीते हो? मैं तो प्रणव दा की उस एक प्याली चाय का असली ‘वज़न’ पूछ रहा था जिसे पिला कर उन्होंने, क्या बीजेपी और क्या वाम-पंथी, सभी को एक साथ साध लिया था! Continue reading

धर्म-निरपेक्षता का आडम्बर

Sarokar

धर्म-निरपेक्षता का सोच अप्राकृतिक है क्योंकि यह अपने-अपने वैयक्‍तिक स्वार्थों को फलीभूत करने के सोच से उपजा आडम्बर है। दुर्भाग्य से, हम ऐसे गुरुजनों से वञ्‍चित होते जा रहे हैं जो समाज, समुदाय और सम्प्रदाय में भेद करने लायक शिक्षा दे सकें। Continue reading

सूट करती हैं, सूट नहीं करती हैं

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सारा दोष पोथी-पण्डितों का था। कन्फ़्यूज़्ड करके रख दिया था भगवान को। जन्माष्‍टमी एक दिन पहले हो या एक दिन बाद! बैठा दी उसने अपनी पंचायत। पहले तय किया जाये कि मेरा हैप्पी बर्थ डे आखिर कब है? Continue reading

कुछ-कुछ पच नहीं रहीं ये बातें

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बात कुछ हजम नहीं हो रही है। कोई संकेत कर रहा है कि केन्द्रीय मुख्य सूचना आयुक्‍त की रिटायर-मेण्ट की तारीख बिल्कुल नजदीक आ गयी है। तो, कोई समझाने की कोशिश कर रहा है कि इसे महज फ़्रस्टेशन मान कर भूल जाइये। Continue reading

पॉलिटिकल कोलाज पर शोध-प्रबन्ध

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इसे महज को-इन्सिडेन्स ही कहिए। हाँ, निहायत अपने किसी निजी ऐंगिल से, अगर आपको इसमें फ़ोर्थ पॉकेट दिख जाये तो आपकी इस महारत को सलाम! मैं तो बस, फुरसत में बैठा सीधा-सच्चा फ़र्स्ट पॉकेट शॉट खेल रहा हूँ। Continue reading

बहुतेरे आँगन, बहुतेरे नाम!

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वीवीआईपी बंगलों-कोठियों के आँगनों में ‘नाम’ होने के किस्से जब आम हो जाते हैं तो इन ‘नाम-चीन’ खसुल-खासों की चाँदी तो कटती ही है, कोठी मालिकों को भी अपनी-अपनी पौ बारह करने की गारण्टी मिलती है। Continue reading

हाली की नहीं, उसकी घरवाली की मर्जी

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सूबे की कैपिटल में माल-गुजार और हाली के बीच के रिश्ते तो यथावत्‌ हैं। हाँ, हाली और उसकी घरवाली के बीच के ईक्वेशन्स जरूर बदल गये हैं। बिल्कुल वैसे ही, जैसे विन्ध्याचल की वादियों में राजा-महाराजाओं के अटे पड़े किस्सों में सुनकर आया था। Continue reading