अग्नि-परीक्षा-१ : परीक्षा में झुँकी न्याय की भारतीय अवधारणा

Sarokar

बलि की बेदी के खूँटे से साक्षात्‌ न्याय की भारतीय अवधारणा ही बाँध दी गयी है। बिना परिणामों की गहराई पर विचार किये ही न्याय की भारतीय अवधारणा को अग्नि-परीक्षा में झौंक दिया गया है। परम्परा से कहीं बहुत गहरा है न्याय की भारतीय अवधारणा का आसन्न संकट। Continue reading

लँगड़े झूठों पर खड़े खेसारी के ‘वैज्ञानिक’ सोच

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हमारा सोच नैतिकता-सामाजिकता के निम्नतर स्तर पर पहुँच गया है। कोई अचरज नहीं कि खेसारी-समर्थक ‘वैज्ञानिक’ लॉबी को गलतियाँ करने से कोई गुरेज नहीं है; गुरेज है तो केवल इस पर कि ऐसी गलतियाँ कतई नहीं की जायें जिनसे ‘अधिकतम’ आर्थिक कमाई मिलने में कोई कसर रह जाती हो। Continue reading

मतदाता का अधिकार : लोक-तन्त्र के अस्तित्‍व की गारण्टी

लोक-तन्त्र को अब, ‘मतदान के अधिकार’ की नहीं अपितु ‘मतदाता के अधिकार’ की स्थापना की दरकार है क्योंकि मतदाता का अधिकार बहुत व्यापक है जबकि मतदान का उसका अधिकार तो लोक-तन्त्र के इस यथार्थ और व्यापक अधिकार की प्राप्‍ति का एक साधन मात्र है। Continue reading