…और गजेन्द्र फन्दे पर झूल गया!

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गजेन्द्र के उस तथाकथित सुसाइड-नोट की विषय-वस्तु को, तार्किक रूप से, मृतक की निजी व्यथा का ईमान-दार कथन नहीं माना जा सकता है। इस नोट में यह कहीं नहीं लिखा गया है कि वह आत्म-हत्या कर रहा है। और इसी से, यह बड़ा स्पष्ट संकेत निकलता है कि उक्त विषय-वस्तु किसी अन्य ‘विचारक’ के उपजाऊ मष्तिष्क की हाई-ब्रिड फसल थी। Continue reading

यथार्थ-परक नजरिया पत्रकारिता को काल-जयी बनाता है

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चुनौती-भरी प्रति-स्पर्धा में सालों-साल अपनी साख को अक्षुण्ण बनाये रखना हर दैनिक के बूते की बात नहीं है। नियमित अन्तराल से प्रकाशित होने वाली समाचार-पत्रिकाओं के लिए तो यह और भी दुश्कर है। ऐसा कर पाने के लिए दृष्टि का केवल निर्मल होना नहीं बल्कि उसका गहरा होना भी आवश्यक है। Continue reading

‘आप’ का सबसे बड़ा सबक

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आन्दोलन में सामाजिक सोच चाहे जितना भी गहरा हो, इस सोच को राजनीति के साँचे में कतई नहीं ढाला जा सकता है। आन्दोलन राजनीति के भटकाव को नियन्त्रित करने वाली जन-धारा है। ऐसी आदर्श स्थिति में किसी जन-आन्दोलन का सत्ता में विलोप कैसे किया जा सकता है? भले ही वह उसी के कारण अस्तित्व में आयी हो। Continue reading

आदर्श ग्राम पर आदर्श सवाल : ३

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कुल मिला कर दो प्रकार के शोर गूँज रहे हैं। पहला औसत उथली समझ के व्यक्तियों के लिए है जबकि दूसरा तनिक ज्यादा बौद्धिक बहस-बाजों को समर्पित। किन्तु, विरोध के इन दोनों ही शोरों में एक दुर्भाग्य-जनक समानता है — दोनों ही कृषि-भूमि के अधिग्रहण के विरोधी नहीं हैं। सारा विरोध या तो वाजिब शर्तों के या फिर वाजिब दामों के निर्धारण पर सिमटा हुआ है। Continue reading

आदर्श ग्राम पर आदर्श सवाल : २

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केन्द्र की कागजी लफ़्फ़ाजी के प्रकाश में सवाल यह है कि विकल्पों के चुनाव का अधिकार क्या सच में गाँवों के हाथ में होगा? या, विकल्पों के निर्धारण के विकल्प पर शासन-प्रशासन के गिनती के पूर्वाग्रहित कर्ता-धर्ताओं का स्वत्वाधिकार होगा? गाँवों की जीवन शैली मूलत: कृषि-प्रधान है, आदर्श ग्राम योजना क्या इसे संरक्षित रख पायेगी? Continue reading

आदर्श ग्राम पर आदर्श सवाल : १

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सच में ही एक छोटे से आदर्श की स्थापना से उसके दोहराव की सम्भावना स्वत: ही उत्पन्न हो जाती है। इसलिए ‘प्लान मोदी’ की वास्तविक सफलता योजना के इस मूल्यांकन पर निर्भर होगी कि सांसद आदर्श ग्राम योजना में ‘ग्राम’ भी और ‘आदर्श’ भी कहाँ है? और अगर कहीं है तो, यथार्थ में, कितना है? योजना की समीक्षा इसी धुरी पर केन्द्रित होनी चाहिए। Continue reading

क्या भोपाल में सायनाइड बम का परीक्षण किया गया था?

Ateet Ka Jharokha

क्या संयन्त्र में भण्डारित रसायनों की भूमिका केवल घोषित उपयोग तक ही सीमित थी? या फिर षडयन्त्र-कारियों ने इन रसायनों के अपने स्वतन्त्र प्रभावों के अध्ययन की भी सम्भावना सोच रखी थी? और इसीलिए, टेक्सास स्थित अमरीकी सरकारी संस्थान ‘डिसीज कण्ट्रोल सेण्टर’ ने भोपाल टेलेक्स सन्देश भेज कर इलाज-विशेष का लम्बा-चौड़ा नुस्खा सुझाया था? Continue reading

किसके साथ, किसका विकास?

Atithi-Vichar

आईएसएम, धनबाद से पेट्रोलियम इंजीनियरिंग में एमटेक और छत्तीसगढ़ कृषक बिरादरी के संयोजक प्रदीप शर्मा ने अपना एक आलेख हमें भेजा है। विषय-वस्तु की सर्व-कालीन सम-सामयिकता के कारण ही, रविवार डॉट कॉम में प्रकाशित हो चुके इस आलेख को मैं (किंचित्‌ सम्पादन के साथ) यहाँ स्थान दे रहा हूँ। Continue reading